डॉ. नवीन आनंद
मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग में एक डिप्टी कलेक्टर को अपर संचालक के रूप में पदस्थ करने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश भर नहीं है, बल्कि इसे विभाग की विशेष पहचान, गरिमा और कार्य-परंपरा को चुनौती देने वाला कदम भी कहा जा सकता है। जनसंपर्क विभाग अपनी प्रकृति और मूलभूत उद्देश्यों में राजस्व विभाग से बिल्कुल भिन्न है।
यह वह विभाग नहीं है जहाँ तहसीलदार, पटवारी या राजस्व अधिकारियों की तरह भूमि, सीमांकन, नक्शानवीसी अथवा प्रशासनिक आदेशों का क्रियान्वयन होता हो।
जनसंपर्क विभाग की आत्मा ‘लेखन, विचार और संप्रेषण’ में बसती है।यह वह तंत्र है जहाँ अधिकारी सरकार की नीतियों को संवेदनशील और प्रभावी शब्दों में जनता तक पहुँचाते हैं,
शासन के मुखिया की प्राथमिकताओं को अर्थपूर्ण संवाद में बदलते हैं,और सबसे महत्वपूर्ण, सरकार के विरुद्ध बनने वाले नकारात्मक वातावरण को अपनी समझ, कुशलता और रचनात्मकता से संतुलित करते हैं।अगर कहें कि जनसंपर्क विभाग एक प्रकार से सरकार की छवि का सौंदर्य-शिल्पी है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहाँ के अधिकारी और कर्मचारी दिन-रात एक सौंदर्य-साधना में लगे रहते हैं—विचारों, शब्दों और संवादों के माध्यम से। यही वह विभाग है जहाँ पत्रकारों के बीच सरकार की बात सम्मानपूर्वक और तार्किक ढंग से रखने की ज़िम्मेदारी निभाई जाती है।
ऐसे विशिष्ट, वैचारिक और सृजनात्मक विभाग में प्रशासनिक कठोरता वाले राजस्व-कैडर के अधिकारी की प्रतिनियुक्ति स्वाभाविक रूप से असंगत प्रतीत होती है।
यह पहली बार नहीं है कि किसी डिप्टी कलेक्टर को राज्य की सूचना-व्यवस्था में लाने का विचार सामने आया हो। अतीत में भी कई बार ऐसे प्रस्ताव हवा में तैरते रहे, किंतु जनसंपर्क विभाग की मजबूत बौद्धिक परंपरा और आंतरिक इच्छाशक्ति ने हर बार उन्हें वास्तविक रूप लेने से रोका।जब-जब इस प्रकार का प्रयास हुआ, सूचना-तंत्र के अधिकृत अधिकारियों ने अपनी दृढ़ता और एकजुटता से यह स्पष्ट किया कि जनसंपर्क का संसार प्रशासनिक आदेशों की सीमा नहीं, बल्कि संवाद की शक्ति से चलता है। इसलिए हर बार ऐसे प्रस्ताव पेन डाउन और असहमति की सामूहिक ऊर्जा के आगे स्वतः ही निष्प्रभावी होते गए।
आज फिर वही प्रश्न खड़ा है—
क्या एक राजस्व अधिकारी जनसंपर्क विभाग की विशिष्ट कार्य-शैली, उसकी संवेदनशीलता, उसके सृजनात्मक चरित्र और उसकी वैचारिक जिम्मेदारियों को समझ पाएगा?और क्या यह कदम विभाग की स्वायत्तता एवं गरिमा को कमज़ोर नहीं करेगा?
ऐसे में स्वाभाविक ही विरोध की आवाज़ें उठना उचित है। यह विरोध किसी व्यक्ति-विशेष का नहीं, बल्कि उस सिद्धांत का है जिसने जनसंपर्क विभाग को सदैव एक विचार-प्रधान, संवाद-केंद्रित और रचनात्मक संस्था के रूप में स्थापित किया है।





