बिहार की राजनीति में सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार राजनीति में आने वाले हैं? चर्चा ने तब जोर पकड़ा जब हाल के दिनों में निशांत कुमार लगातार मीडिया से रूबरू होने लगे. यह चौंकाने वाला था, क्योंकि 6 महीने पहले ही निशांत कुमार ने मीडिया के सवाल पर कहा था कि उन्होंने अध्यात्म का रास्ता चुन लिया है, तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ जो वह राजनीति के सवालों का जवाब देने के लिए आगे आने लगे, मीडिया से रूबरू भी होने लगे और सियासत को साधने लगे? एक इंटरव्यू में तो उन्होंने खुले तौर पर अपने पिता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एनडीए का सीएम फेस घोषित करने की मांग भी खुले तौर पर कर दी.

जाहिर तौर पर ये सारी घटनाएं एक इशारा तो जरूर करती हैं कि वह राजनीति में आने को तत्पर हैं या नहीं, लेकिन कुछ तैयारी तो जरूर है. राजनीति के कई जानकार यह भी बताते हैं कि संभव है कि 15 अप्रैल के बाद वह जदयू ज्वाइन भी करें और आगामी विधानसभा चुनाव भी लड़ें. लेकिन, इस बात को लेकर अभी कयासबाजियां ही हैं, कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं. लेकिन राजनीति के विमर्श में जो बात आ गई है उसको लेकर तो निश्चित तौर पर सियासी सरगर्मी भी बढ़ गई है. अब निशांत कुमार राजनीति में आते हैं अथवा नहीं आते हैं, यह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के रुख पर निर्भर करेगा. परिवारवाद के घोर विरोधी रहे नीतीश कुमार क्या अपने पुत्र को राजनीति में आने देंगे? सवाल सियासी गलियारों में गूंज रहा है. इसी बीच कई वरिष्ठ पत्रकार इसको लेकर अपनी अलग राय रखते हैं. वह कुछ चंद ऐसे नेताओं का उदाहरण देते हैं जो राजनीतिक परिवारों से होते हुए भी परिवारवाद के आरोपों से दूर रहे. परिवार से राजनीतिक विरासत तो मिली, लेकिन उनपर परिवारवाद का ठप्पा नहीं लगा. इसमें एक बड़े नाम हैं जिनपर हम आगे चर्चा करते हैं.
पहला बड़ा नाम ओड़िशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का है. दरअसल, नवीन पटनायक की राजनीति में एंट्री तब हुई जब उनके पिता ने राजनीति छोड़ दी. वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि बीजू पटनायक के देहांत के बाद नवीन पटनायक ने राजनीति ज्वाइन की और सुचिता की राजनीति के नए मानदंड स्थापित किये. वह परिवार की विरासत से तो आए, लेकिन उन पर कभी भी परिवारवाद का ठप्पा नहीं लगा. यहां तक कि नवीन पटनायक राजनीतिज्ञ रहे, लेकिन अपने आगे के जनरेशन को उन्होंने राजनीति से दूर ही रखा. अब जब वह मुख्यमंत्री नहीं हैं तो उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाला उनके परिवार से फिलहाल कोई आगे नहीं आया है. ऐसे में लोग उनको उसी दृष्टि से सम्मान भी देते हैं.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार सक्रिय राजनीति में आ सकते हैं.
इसी प्रकार का एक दूसरा उदाहरण अजीत सिंह का है जिन्होंने पिता चरण सिंह के मृत्यु सैय्या पर होने के समय राजनीति ज्वाइन की थी. उन पर भी कभी परिवारवाद का ठप्पा नहीं लगा क्योंकि उने पिता राजनीति के नेपथ्य में चले गए थे. अजीत सिंह ने अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए धरातल पर संघर्ष किया. पिता की लेगेसी रही तो सही, लेकिन अपना वजूद भी बनाया. इसे साथ ही और भी नेता पुत्र हैं जो इसी तरह की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं जिनपर परिवारवाद का ठप्पा उस रूप में नहीं लगा जिस रूप में राहुल गांधी, तेजस्वी यादव या अखिलेश यादव जैसे नेताओं पर लगता है.
सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया और आरपीएन सिंह जैसे नेताओं का उदाहरण भी सामने है जो अपने पिता के नाम की वजह से आए, लेकिन परिवारवाद का आरोप इन पर उस रूप में नहीं लगा. वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि दरअसल, राजनीति ऐसा क्षेत्र है जहां जनता तय करती है, मतदाता तय करते हैं कि कोई नेता पुत्र या कोई इंडिविजुअल कितनी दूर तक जाएंगे. परिवार की वजह से एंट्री तो हो सकती है, लेकिन आप कितनी दूर तक जाएंगे इसका फैसला मतदाता करते हैं. अभी तो निशांत शुरुआती टेस्ट से भी नहीं गुजरे हैं. निशांत कुमार जदयू के प्राथमिक सदस्य भी हैं या नहीं हैं, यह पब्लिक डोमेन में नहीं है. वहीं, निशांत की राजनीति में अपनी कोई उपलब्धि नहीं है, यह बहुत बड़ा सच भी है.

बिहार के राजनीतिक गलियारे में चर्चा यही है कि क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बेटे निशांत कुमार को राजनीति में लाना चाहते हैं?
रवि उपाध्याय कहते हैं, निशांत कुमार 49 वर्ष के हैं और वह निशांत कुमार के साथ कोई नेगेटिव बात नहीं रही है. वहीं, दूसरी ओर जदयू के नेताओं की चिंता अलग है जो निशांत कुमार की ओर पार्टी के नेताओं को आकर्षित कर रही है.दूसरी ओर राजनीतिक के जानकार बताते हैं कि नीतीश कुमार की लोकप्रियता घट रही है, लेकिन इसके उलट एनडीए की लोकप्रियता बढ़ रही है. पिछले चुनाव 2020 चुनाव में भी दिखा था. अब नीतीश कुमार के स्वास्थ्य के कारण यह समस्या और भी ज्यादा हो गई है. जेडीयू के लोगों को लगता है कि नीतीश कुमार रिटायरमेंट की तरफ बढ़े तो पार्टी (जेडीयू) का क्या होगा. पार्टी बची रहे इसलिए नीतीश कुमार के बेटे जेडीयू इस मामले में क्रॉस रोड पर हैं.