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मनोरोग : काहे रिसियानी निंदिया रानी

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पुष्पा गुप्ता

 _नींद के डॉक्टर के भीतर दो विरोधी व्यक्तित्व आपस में द्वन्द्वरत हैं। एक है जो थॉमस एल्वा एडीसन को कोस रहा है और दूसरा है जो उनकी प्रशंसा करता नहीं अघा रहा।_
       थॉमस एल्वा एडीसन के क़िस्से हमने बचपन में ख़ूब पढ़े हैं। विज्ञान और वैज्ञानिकों को क़िस्सागोई के तरीक़े से पढ़ने-पढ़ाने में लोग बहुत आगे रहे हैं। क़िस्से-कहानी के माध्यम से अनुप्रेरण लेना अच्छी बात है , लेकिन महज़ इतने से ही न कोई वैज्ञानिक चेतना प्रस्फुटित होती है और न कोई विज्ञान-क्षेत्र में आगे बढ़ने में क़ामयाब ही होता है।
  _सो विज्ञान से किस्सेबाज़ी द्वारा इश्क़ लड़ाने में उतनी ही ज़िम्मेदारी होती है , जितनी प्रेम को फ़िल्मी अंदाज़ में जीने में। इल्म और फ़िल्म दोनों ही क्षेत्रों में कुछ ठोस करने के लिए कथाकारिता-कथाभाविता से आगे जाना पड़ता है।_
     एडीसन ने हमसे हमारी रातें छीनी। जिस दिन काँच के उस गोले में टंगस्टन का फिलामेंट जगमगा उठा , उस दिन रात्रि पर पहला बड़ा आक्रमण हुआ। प्रकाश का तब अर्थ अग्नि-शलाका नहीं रह गया।
 बिजली से जल उठे बल्ब ने हमारी दुनिया में प्रकाश का अभिप्राय ही बदल कर रख दिया। साथ ही सिकुड़ने को मजबूर हुई रात। और उस संकुचित होती नींद के साथ क्षीण पड़ने लगी हमारी नींद।

एडीसन की कृत्रिम जगमगाहट ने दिन का दायरा ऐसा फैलाया कि धीरे-धीरे रात और नींद के लगभग कोई दैनन्दिन मायने ही नहीं रह गये। लोगों ने महज़ रात और नींद को खोया ही नहीं , उन्होंने इनसे अनुराग रखना भी छोड़ दिया।
आज कम ही लोग आपको मिलेंगे जो कहेंगे कि मुझे रात का इंतज़ार रहता है अथवा मुझे अपनी नींद बड़ी प्यारी है। शहरों में तो ज्योति-प्रदूषण के कारण इतना उजाला छाया रहता है कि अन्धकार की कालिमा भी कृत्रिम दिन में बदल जाती है। और फिर न जाने कितने ही हैं , जो वर्कोहॉलिक विशेषण को अपने नाम के साथ किसी अभिजात-भाव के साथ चिपकाते हैं : आइ डोंट स्लीप मच , यू सी आय एम अ वर्कोहॉलिक ! रात-रात भर जागना कर नींद न लेना बहुत बड़ा स्टेटस-सिम्बल जो ठहरा !
एडीसन केवल इतने पर नहीं रुके। उन्होंने जो फ़ोनोग्राफ़ एवं मोशन-कैमरा बनाये , उनसे मनोरंजन की दुनिया में भी क्रान्ति ला दी। अब किसी को सामने लाइव देखने की बजाय हम दूर रहकर भी उसे पर्दे पर देख सकते थे।
एंटरटेनमेंट चाहने वालों द्वारा मनोरंजक घटनाओं को रिकॉर्ड करके उन्हें बाद में फ़्री समय में देखने का चलन चल पड़ा। और फ़्री टाइम कब ? रात में ही तो ? सो जगमगाहट के साथ मनोरंजन ज्यों-ज्यों बढ़ता गया , अपनी निद्रा को दमित-शमित करने के मानव-प्रयास भी नाना रूपों में बढ़ते गये।
पर यह सब सुन-पढ़कर इतना बुरा नहीं लगता। मनोरंजनी जगमगाहट भला हमेशा बुरी ही है ? लेकिन फिर यह भी जानिए कि बल्ब के आविष्कार के बीस साल-भर में ही फ़ैक्ट्रियों में काम करने वाले मज़दूरों का श्रमशील जीवन भी बदलने लगा। अब दिन की समाप्ति का अर्थ सूर्यास्त नहीं था , अब दिन सूरज ढलने के बाद भी जारी रह सकता था।
सो अगर सूर्य का दिन से सम्बन्ध विच्छेद हो गया , तब वह हमारे कार्य-क्रम के लिए भी एक समय बाद अप्रासंगिक हो गया। अब हमें काम करना था क्योंकि रात को भी दिन में चुका था।
‘यह महानगर चौबीस घण्टे जागता है’ जैसे जुमले लोग फख्र से बताते हैं। पर यह नहीं बताते कि इस महानगर के कारण बिजली की अन्धाधुन्ध और अनावश्यक खपत कितनी है और यह किन-किन छोटे नगरों और गाँवों के हक़ की बिजली मारता है।

इस महानगर के कितने लोग मनोरोगी हुए जा रहे हैं और उनका किस-किस ढंग तरह से शोषण बढ़ रहा है। उसका महानगरत्व बनाये रखने की क्या क़ीमत पर्यावरण को चुकानी पड़ रही है : कितने पक्षी , मछलियाँ और अन्य जीव प्रकाश-विष के कारण बीमार पड़ रहे हैं और दम तोड़ रहे हैं।
प्रकाश से भी प्रदूषण हो सकता है , यह ज्ञान हमें आश्चर्यचकित करता है। प्रकाश को हमने इतना पुनीत बना दिया है कि ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के आगे हर नयी जानकारी जैसे दम तोड़ देती है। लेकिन तमसो मा ज्योतिर्गमय तब प्रासंगिक था और है , जब तम बारह घण्टों तक व्यापता था।
तब हम सूर्य के उगने की प्रतीक्षा में असहाय भाव से रात काटते थे और उदीयमान् भगवान् भुवन-भास्कर को प्रणाम करते थे।
अब संसार का सर्वोच्च ऊर्जा-स्रोत होने के बावजूद हम सूर्य के साथ न जगना चाहते हैं और न कार्यरत होना। हम सूर्यकेन्द्री न रहे , हमने सूर्य से दिन का उसका क्रियान्वयन चुरा लिया।

यह चोरी हमें और हमारे सहचर जीवों को बहुत भारी पड़ रही है। रात को दिन बनाकर जीने वाले अपने सर्केडियन क्लॉक से खेल रहे हैं और जान भी नहीं पा रहे।
नतीजन शरीर के अन्दर जो परिवर्तन हो रहे हैं , वे दैहिक आधियों-व्याधियों को जन्म दे रहे हैं।सड़क-दुर्घटनाएँ-मनोरोग-डायबिटीज़-ब्लडप्रेशर-ऑटोइम्यून रोग-कैंसर जैसी ढेरों बीमारियाँ रात्रि-जागरण के कारण लोगों में बढ़ती जा रही हैं। देर रात तक जागने के कारण अनेक शोधों में स्तन-कैंसर व बड़ी आँत के कैंसर में वृद्धि देखी गयी है।
लेकिन नाइट-शिफ़्ट में मुनाफ़ा देखते अथवा नाइट-लाइफ़ में मनोरंजन भोगते समाज को सूरज और सर्केडियन क्लॉक का महत्त्व भला कहाँ समझ में आएगा ?

यही वजह है कि नींद के डॉक्टर के भीतर एक व्यक्तित्व एडीसन को असीस रहा है। एडीसन न होते , तो बल्ब-फ़ोनोग्राफ़-कैमरा न होते। ये सब न होते , तो रात और नींद का अस्तित्व बना रहता।
रात और नींद स्वस्थ रहते , तो स्लीप-स्पेशलिस्ट की विधा अस्तित्व में न आती। तब मित्र की निद्रा-विशेषज्ञता का क्या होता !
[चेतना विकास मिशन]

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