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*अटल जी को चुनाव हराने वाले राजा महेंद्र प्रताप सिंह* 

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राजा महेंद्र प्रताप सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले के मुरसान रियासत के राजा थे। जाट परिवार से निकले महेंद्र प्रताप लेखक और पत्रकार भी रहे। पहले विश्वयुद्ध के दौरान अफगानिस्तान जाकर उन्होंने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई। वह इस निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति थे। एक दिसंबर, 1915 को राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अफगानिस्तान में पहली निर्वासित सरकार की घोषणा की थी। यानि अंग्रेज़ों के शासन के दौरान स्वतंत्र भारतीय सरकार की घोषणा। जो काम उन्होंने किया वही सुभाष चंद्र बोस ने किया था। लेकिन राजा महेंद्र प्रताप सिंह घोषित तौर पर कांग्रेस में नहीं रहे। यूपी चुनाव के पूर्व  उनके नाम पर ही पीएम मोदी ने अलीगढ़ में एक विवि की आधारशिला रखी थी l किसान कानूनों के चलते जाट कृषकों का मोदी योगी से मोहभंग हो गया था l इस यूनिवर्सिटी की आधारशिला अपने जाट प्रभाव को फिर से वापिस प्राप्त करने की एक कवायद के रूप  में देखा गया था l  यह इसलिए सत्य है क्योंकि वृंदावन में यमुना तट पर बनी राजा साहब की समाधि पर आज तक कोई भाजपा नेता  पुष्प अर्पित करने नहीं गया l समाधि की स्थिति अत्यंत दयनीय है l

महेंद्र प्रताप सिंह पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ में उनके महात्मा गांधी से संपर्क का भी जिक्र है। बोस निर्वासित सरकार के गठन के बाद स्वदेश नहीं लौट सके, लेकिन महेंद्र प्रताप सिंह भारत भी लौटे। आजादी के बाद राजनीति में भी सक्रिय हुए। 32 साल तक देश से बाहर रहे राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने भारत को आजाद कराने की कोशिशों के लिए जर्मनी, रूस और जापान जैसे देशों से मदद मांगी पर कामयाब नहीं हुए। 1946 में जब वो भारत लौटे तो सबसे पहले वर्धा में महात्मा गांधी से मिलने गए। लेकिन कांग्रेस में शामिल नहीं हुए l

1957 में वह मथुरा से चुनाव लड़े और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने जीत हासिल की। चुनाव में जनसंघ के उम्मीदवार के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी भी यहां चुनाव मैदान में खड़े हुए थे। वाजपेयी इस चुनाव में चौथे नंबर पर आए थे। महेंद्र प्रताप सिंह कभी हिंदू-मुसलमान के पचड़े में नहीं पड़े। उन्हें आर्य पेशवा त्याग मूर्ति के तौर पर भी जाना जाता रहा। उन्होंने अफगानिस्तान में जो निर्वासित सरकार बनाई थी, उसमें वह राष्ट्रपति थे लेकिन प्रधानमंत्री उन्होंने मोहम्मद बरकतुल्लाह भोपाली ( जिनके नाम पर भोपाल विश्वविद्यालय  का नाम बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय किया गया ) को बनाया था। उनका रूझान वामपंथ की ओर दिखा। वे रूसी क्रांति से प्रभावित थे।

राजा महेंद्र प्रताप ने वृंदावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की थी। प्रेम विद्यालय मौजूदा समय में वृंदावन पॉलीटेकनिक संस्थान के तौर पर उम्दा संस्थान माना जाता है। 1932 में राजा महेंद्र प्रताप सिंह को शांति के नोबल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। 1962 में मथुरा लोकसभा से चुनाव हारने के बाद वे सार्वजनिक जीवन में बहुत सक्रिय नहीं रहे। उनका निधन 29 अप्रैल, 1979 को हुआ। उनके निधन पर तत्कालीन केंद्र सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया था

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