इस देश के ऊपर से नीचे तक की सभी जातियों में समान रूप से “जातिवादी वैक्टीरिया ” घुसे हुए हैं ! अभी पिछले दिनों जन्माष्टमी के दिन ही मध्यप्रदेश में एक दलित लड़की की पिटाई इसलिए कर दी गई, क्योंकि वह मालियों द्वारा आयोजित जन्माष्टमी के पंडाल के आसपास खड़ी थी ! पीटने वाले लोग माली जाति के हैं ! मतलब ये है कि मालियों के लिए दलित अछूत है ! इस घोर जातिवादी देश में वास्तविकता यह है कि दलित लड़की को कथित नीची जाति मानते हुए पीटने वाले कोई माली जाति की लड़की भी यादवों द्वारा आयोजित जन्माष्टमी पंडाल पर भटक कर पहुँच जाए तो यादव भी उसे अपने से नीचे जाति या अछूत मानकर उसको तबियत से पीट ही देंगे !
मैंने अपनी पूरी उम्र पिछड़ों में लगभग तीन दशक पूर्व एक इंसान तक नहीं देखा जिसको ये बुरा लगता हो कि हम ब्राह्मणों, ठाकुरों और बनियों से वे नीचे की पायदान पर हैं ! बल्कि बचपन से यही देखा है कि पंडितजी के पैर छूकर आशीर्वाद लेने की होड़ में हर कोई पिछड़े वर्ग का व्यक्ति एक दूसरे से आगे रहने की होड़ में लगा रहता है ! हम इसी में बहुत ख़ुश और आत्मविभोर हैं कि भारतीय समाज के कथित शीर्ष पर बैठे पाखंडियों ने हम सभी पिछड़ी, अनुसूचित और अनुसूचित, जन जातियों तथा आदिवासियों को अपने – अपने एक – एक एक्सक्लूसिव कथित भगवान प्रदान कर दिए हैं ! और फिर सबसे बड़ी चीज ये भी है कि हम यह सोचकर आत्मसंतुष्ट हो जाते हैं कि अगर ब्राह्मण-ठाकुर हमसे ऊपर है तो बहुत सी जातियां ऐसी भी हैं,जो हमसे निचले पायदान पर भी तो हैं ! अगर मैं अपने किसी रिश्तेदार को कह भर दूँ कि ‘भाई ! हमको अपने आप को हिंदू समाज में किसी से नीचे नहीं समझना चाहिए और हमें ऐसे समाज से बग़ावत कर देनी चाहिए जो हम को ब्राह्मण से कम लगाता है तो उलटा वह रिश्तेदार मुझे ही बहुत भला – बुरा कहने लगेगा और समझाने लगेगा कि भला ये कैसे संभव है कि हजारों-हजारों साल से हमारे पवित्र धर्मग्रंथों,वेदों,पुराणों में लागू मनुस्मृति के कानून को हम उलट दें !
दरअसल हिंदू धर्म और यहां के भारतीय जातिवादी समाज की ख़ूबी यही है कि यहां के हर जाति के सभी सदस्यों को ये बात ठीक से समझा दिया गया है कि जातिवादी अवरोही या आरोही क्रम में उसके ऊपर कौन है और उसके नीचे कौन है ? हमारे धर्म-ग्रंथों में,पौराणिक कहानियों में सभी पात्रों की जाति अमूमन सामने ही रहती है जिससे कि ये सामाजिक ज्ञान सबको रहता है कि विभिन्न तरह के कोटि भगवानों के बीच भी हमारी जाति का स्टेटस क्या है ? ये ज्ञान उदासी या हताशा का नहीं अपितु आत्मसंतोष और आत्मगौरव का प्रेरणा स्रोत है ! वो हिंदू ही क्या जिसे ये न मालूम हो किस जाति के बंदे को आसानी से धमकाया जा सकता है और किसके सामने हाथ जोड़कर सांष्टांग होकर उसके पैरों में लोट लेना है !
इस देश की राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों के थोडे़ से अंबेडकरवादियों को छोड़ कर मुझे आज तक कोई जाटव,वाल्मीकि,मल्लाह,पासी,खटिक, चमार,भंगी जाति का कोई व्यक्ति नहीं मिला जिसने अपना परिचय देते हुए कहा हो कि मैं दलित हूँ ! और कोई कथित उच्च जाति का ब्राह्मण भी नहीं देखा जो हंसते – हंसते अपनी बेटी की शादी अपनी जाति से नीचे वाली जाति के लड़के से कर दे !
आज से पैंतीस -चालीस साल पहले जब मेरी पीढ़ी के नौजवानों में अंतर्जातीय विवाह होने शुरू हुए तो मजबूरी में लिबरल कहे जाने वाले माँ -बाप भी सबसे पहले ये देखते थे हमारी लड़की कहीं हमसे नीचे की जाति के लड़के में तो नहीं जा रही है ? जिस लड़के की प्रेमिका थोड़ी बहुत भी ऊँची जाति की होती थी उस लड़के के माँ-बाप राहत की साँस लेकर शादी के लिए हामी भर देते थे ! मसलन अगर लड़का ब्राह्मण था और उसकी प्रेमिका लड़की बनिया हो तो लड़के के परिवार वालों की कच्ची मतलब बेइज्जती हो जाती थी ! कि लड़के ने अपने कुल से नीची जाति में शादी करके अपनी विरादरी की नाक कटवा दिया ! उधर लड़की के परिवार वाले मन ही मन इत्मीनान कर लेते थे कि चलो कम से हमारी लड़की हिन्दू धर्म के यादव या जाटव जैसे निचले पायदान वाली जाति से तो शादी नहीं कर रही है ! लड़का तो हिन्दुओं में सर्वश्रेष्ठ जाति का है !
जातिवादी तत्व हर समाज में हैं !
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भारत में अपनी फ़ेसबुक पर ‘जय भीम ‘लिख देने वाले ज्यादातर दलित अब यह सोचने लगे हैं कि बस अगले साल नीची जातियाँ बग़ावत करके भारत में फ़्रेंच रेवोल्यूशन का रीमेक बनाने वाली हैं ! जबकि असलियत ये है कि खटिक और दलित लोग भी पंडितजी को मोटा रोकड़ा देकर अगले रविवार को सत्यनारायण की कथा करवा रहे होते हैं और सोमवार को मालियों की जन्माष्टमी पंडाल के बाहर पिट रहे होते हैं !
कम से कम भारत में जातिवाद का निर्माण कुछ बहुत ही धूर्त चालाक और शातिर लोगों के एक गिरोह द्वारा अपने स्वार्थ,आजीवन और पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने लिए मुफ्त में जीविकोपार्जन के लिए किया गया एक बहुत ही चालाकी भरा कृत्य है ! चूंकि भारतीय समाज और दुनिया के अन्य हिस्सों में भी कथित धर्मों मसलन इस्लाम,ईसाई,यहूदी और हिन्दू धर्म के कथित शीर्ष पर बैठे कुछ अत्यंत शातिर और धूर्त तरह के गिरोहों ने दुनियाभर के सभी समाजों और देशों में देवी-देवताओं,पाप-पुण्य,जन्नत-दोजख,हैवेन-हेल,स्वर्ग-नरक,गाड,खुदा,ईश्वर,शाप,वरदान, पुनर्जन्म आदि का अविष्कार करके हर समाज और देशों में आमजनता को हजारों वर्गों,वर्णों और जातियों में बांट कर रख दिया है ! वैसे सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि दुनिया के किसी भी भूभाग से भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे ज्यादा जातिगत् विभाजन है !
जातिवाद का विरोध करनेवाले खुद जातिवादी तत्व हैं !
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भारत में जाति निर्माण कार्य में सबसे चतुराई और धूर्तता यह की गई है कि भारत के कई हजार जातियों के अवरोही या आरोही क्रम के निर्माण में यह बात बहुत करीने से स्थापित किया गया है कि कौन जाति सर्वश्रेष्ठ है,उससे नीचे कौन,फिर उससे नीचे कौन ? आदि -आदि, इसीलिए भारतीय जातिवादी समाज में आरोही या अवरोही क्रम में कथित ऊपरी पायदान पर वर्गीकृत जातियां अपने से निचली पायदान पर निर्धारित हजारों जातियों को देखकर आत्ममुग्धता और कथित खुद को उच्च जाति के होने के एक पूर्णतया मिथ्या और आभासी गर्व से फूल जातीं हैं और वे खुद ही जातिवाद की दृढ़ता को बनाए रखने में अपरोक्ष रूप से सहायक हो जातीं हैं,ये स्थिति पिछड़ी,अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों,आदिवासियों,अल्पसंख्यक मुसलमानों,ईसाईयों,सिक्खों आदि सभी पर समान रूप से लागू होती है !
जातिवाद के विरुद्ध प्रदर्शन करनेवाले एक -दूसरे की जाति पूछते हैं !
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इस देश की जातिवादी विडंबना की इंतिहा तब हो जाती है,जब इस देश में कथित उच्च जातिवादी गुंडों और उग्रवादियों द्वारा दलित जातियों की महिलाओं,लड़कियों के बर्बर बलात्कार और हत्या आदि जातिवादी उत्पीड़न के खिलाफ तथा जातिवाद,ब्राह्मणवाद,मनुवाद और छुआ-छूत के खिलाफ कर रहे प्रदर्शनों और आंदोलनों में भी वहां भाग ले रहे लोग एक-दूसरे का परिचय देते-लेते समय एक-दूसरे की जाति पूछने से नहीं चूकते ! इस विषम परिस्थिति में जब जातिगत वैमनस्यता से बुरी तरह पीड़ित जातियों के लोगों में इतनी जातिवादी भावना व्याप्त है,तो इस स्थिति में जातिवादी और धार्मिक वैमनस्यता से बुरी तरह पीड़ित इस देश से जातिवाद रूपी कैंसर कैसे समाप्त हो सकती है ! यह यक्षप्रश्न है ! इसके समाधान के लिए समाज के बहुत ही निष्पक्ष,बेखौफ, ईमानदार और प्रतिबद्ध लोगों द्वारा जाति के निर्माण की भेद-भाव करने और राज करने के कुटिल साजिश का भंडाफोड़ करके भारतीय समाज में व्याप्त जातिवादी वैमनस्यता के प्रतीक बैक्टीरिया के शमन के लिए गंभीरता और ईमानदारी से सद् प्रयास करने के लिए बहुत मेहनत करने ही होंगे !
प्रस्तुतकर्ता – राम लगन सिंह यादव द्वारा खंडित समाज का एकीकरण पटल, संपर्क – 94152 48175
संकलन एवम् संपादन -निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र, संपर्क – 9910629632





