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*विश्व पुस्तक दिवस के बहाने अतुल लागू की याद*  

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कीर्ति राणा

इंदौर।अकसर ऐसा ही होता है कोई चेहरा, कोई दृश्य, कोई गीत, कोई तारीख, कोई दिन विशेष  देखते-सुनते यादों की नदी कल कल बहने लगती है। आज विश्व पुस्तक दिवस पर ऐसा ही हुआ।किताबों की दुनिया पर सोचते हुए याद आ गई अतुल लागू की।

शहर में आम लोगों को किताब से जोड़ने की दिशा में अतुल लागू (कॉमरेड अनंत लागू के पुत्र) ने प्रगति पुस्तक भंडार के नाम से चिमनबाग चौराहे के समीप किताब दुकान शुरु की थी। पहले यहां मुख्य रूप से रूसी साहित्य ही उपलब्ध रहता था।शहर में नेशनल बुक ट्रस्ट आदि की पुस्तक प्रदर्शनियां तो पहले भी लगती थी लेकिन लागू ने इस मामले में सर्वाधिक रुचि ली। 

शहर में साहित्य प्रेमियों के लिए तब खजूरी बाजार में नवयुग साहित्य सदन (धूत परिवार), तुलसी साहित्य सदन (संचालक तुलसीराम) सर्वोदय साहित्य भंडार, किताबघर आदि प्रमुख दुकानें थीं, जैसे अब जंजीरवाला चौराहे पर रीहर्स डाइजेस्ट है। बक्षीगली में कुछ साल पहले तक जैनसन बुक (मनीष) का भी खूब नाम था लेकिन किताबों के बढ़ते दाम और अधिकाधिक कमीशन जैसे कारणों से जैसे नवयुग मार्केट से गायब हुआ वही हाल जैनसन का भी हो गया। किताबों वाली इस दुकान में ही रेडिमेड कपड़ों की दुकान फैल गई।सर्वोदय साहित्य भंडार मौके की जगह कृष्णपुरा मार्ग पर होते हुए भी सिर्फ गांधी-विनोबा साहित्य की उपलब्धता जैसे कारणों से बड़े पाठक समूह को ज्यादा आकर्षित नहीं कर सका। 

इन सब में अतुल लागू की पहचान इसलिए भी बनी कि उन्होंने 1978 से प्रतिवर्ष गांधीहाल में पुस्तक प्रदर्शनी लगाकर लोगों को साहित्य से जोड़ने की पहल की थी।जिस तरह दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाले पुस्तक मेले का हर साल इंतजार रहता है वैसे ही इंदौर के पाठक इस पुस्तक प्रदर्शनी का इंतजार करते थे-जहां हिंदी, अंग्रेजी के लेखकों के साथ ही नामचीन प्रकाशकों द्वारा साल भर में प्रकाशित पुस्तकें आसानी से उपलब्ध हो जाती थी। बच्चों के आकर्षण का केंद्र रहने वाली हिंदी-अंग्रेजी कार्टून वाली रंगीन किताबों के साथ ही बाल साहित्य, उपन्यास, व्यंग्य, कविता, शायरी, विज्ञान, धर्म, ज्योतिष आदि अनेक विषयों की किताबें यहां उपलब्ध रहती थीं।उनके सहायक दाऊलाल नीमा, भगवती प्रसाद पंडित देर रात तक प्रदर्शनी स्थल पर व्यवस्था संभालते थे।एक बार उन्होंने 56 दुकान क्षेत्र में भी प्रदर्शनी लगाने का प्रयोग किया था, वहां सहयोगी रहे लक्ष्मीकांत शर्मा चौकीदारी के लिए वहीं टेबलों पर टाट बिछाकर सोते थे। 

इस पुस्तक प्रदर्शनी के इंतजार की एक बड़ी वजह यह भी थी कि किताब खरीदी पर दस से बीस प्रतिशत आकर्षक छूट भी उस दौरान मिल जाती थी, साथ ही महंगी किताबों के पेपरबेक संस्करण भी उपलब्ध रहते थे। यही नहीं जो किताब वहां उपलब्ध नहीं रहती, पाठक से अतुल उस किताब का नाम नोट कर विश्वास दिला देते थे कि मंगवा कर दे दूंगा।कई बार तो वे खुद किताब की होम डिलिवरी करने पहुंच जाते थे।चिमनबाग वाली उनकी प्रगति पुस्तक भंडार रात 8 बजे बाद यार-दोस्तों का अड्डा बन जाती थी-वो खुद खातिरदारी को तो उत्सुक रहते ही, साथ ही यह परामर्श भी देते रहते थे कि यह या वो किताब जरूर पढ़ना कई बार तो दोस्तों को उनकी पसंद की किताबें निशुल्क भेंट कर देते थे।कुछ साल पहले अतुल भी चल बसे और पुस्तक प्रदर्शनी के उनके सिलसिले का भी अंत हो गया। 

ऐसा नहीं कि पुस्तक प्रदर्शनी अब नहीं लगती, अब तो बॉक्स वाले ऑफर के साथ पुस्तक प्रेमी एक बॉक्स में जितनी किताबें आ जाएं भर कर साथ ले जाते हैं। इस सब के बावजूद अतुल की सालाना प्रदर्शनी की बात ही कुछ और थी, दिन भर वो पुस्तक प्रेमियों की च्वाइस नोट करता और रात होते-होते जुट जाते थे यार-दोस्त। 

अतुल को मैं पक्का खावड़ा कहता था। एक बार खाने की प्लेट उसने थामी तो फिर कह नहीं सकते वो प्लेट का कब पीछा छोड़े। खाते हुए उसका पसीने-पसीने होते जाना मानो अहसास कराता था कि खाने के लिये वह कितनी मेहनत कर रहा है। 

देर रात भास्कर से लौटने के पहले विनय लाखे फोन कर के कहते यार हम खाना खाने आ रहे हैं। लाखे जी और मैं पहुंच जाते अतुल के घर , आधी रात में भाभी किचन में रोटियां सेंकती रहतीं इस बीच हम तीनों के दो-चार पैग हो जाते थे। कैरम का पक्का खिलाड़ी, प्रेस क्लब में कैरम खेलने बैठ जाए तो हारने से ज्यादा हराने का हुनर जानता था। उसकी कुछ ऐसे दोस्तों की मंडली थी जो कैरम से लेकर प्रगति पुस्तक भंडार बंद होने के बाद चिमनबाग की उस दुकान में रात की महफिल में भी साथ देते थे। एक अच्छा दोस्त, पीने-पिलाने, खाने-खिलाने का शौकीन और किताबों के जानकार अतुल ने इंदौर में उस दौरान ना जाने कितने लोगों को पढ़ने का, विवाह समारोह में किताबें भेंट करने का चस्का भी लगाया था। 

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