
सुसंस्कृति परिहार
यूं तो ये बात सच है जब सरकारें बदलती हैं तो वे कुछ नया करने की इच्छा रखती हैं और पूर्ववर्ती सरकार के कामों के अलावा कुछ नया कर अपनी नवीन पहचान बनाने की कोशिश करती है ताकि जनता उन कामों के ज़रिए उन्हें ना केवल याद रखें बल्कि पुनः:सत्ता वापसी में सहयोगी बने लेकिन ऐसी कोशिश कि पिछली सरकार के प्रगतिशील लोकतांत्रिक विचारों को कुचल दिया जाए उसके अवदान को समाप्त कर दिया जाए और सिर्फ अपनी डफ़ली अपना राग कायम हो यह भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश में पहली बार हो रहा है यह सोच तानाशाही मनोवृत्ति वालों की ही हो सकती है यह देश की अस्मिता के लिए खतरनाक और चिंताजनक है।
ये आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ यानि अमृत महोत्सव का काल है इसके उद्घघाटन अवसर पर माननीय प्रधानमंत्री जी के ये शब्द हमें स्मरण रखना चाहिए “हमारे वेदों का वाक्य है- मृत्योः मुक्षीय मामृतात्। अर्थात, हम दुःख, कष्ट, क्लेश और विनाश से निकलकर अमृत की तरफ बढ़ें, अमरता की ओर बढ़ें। यही संकल्प आज़ादी के इस अमृत महोत्सव का भी है। आज़ादी का अमृत महोत्सव यानी- आज़ादी की ऊर्जा का अमृत, आज़ादी का अमृत महोत्सव यानी – स्वाधीनता सेनानियों से प्रेरणाओं का अमृत। आज़ादी का अमृत महोत्सव यानी – नए विचारों का अमृत। नए संकल्पों का अमृत। आज़ादी का अमृत महोत्सव यानी – आत्मनिर्भरता का अमृत। और इसीलिए, ये महोत्सव राष्ट्र के जागरण का महोत्सव है। ये महोत्सव, सुराज्य के सपने को पूरा करने का महोत्सव है। ये महोत्सव, वैश्विक शांति का, विकास का महोत्सव है।” जी हां 75 चयनित लेखक आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर ऐसा इतिहास और संस्कृति सौंपने जा रहे हैं जिसमें दुख,कष्ट क्लेश और विनाश से निकलने की पूरी तैयारी मिलेगी सारे कंटक मुक्त भारत के निर्माण के विचार इसमें होंगे।तभी तो भारत एक प्रखर हिन्दू राष्ट्र के रूप में उभरेगा। इंतज़ार कीजिए बड़े सिलेबस का। अभी तो सी बी एस सी बोर्ड के नए सत्र के पाठ्यक्रम को ही इस नए विचार के अमृत बतौर ही समझ लें।
कक्षा 10वीं के पाठ्यक्रम से ‘लोकतांत्रिक राजनीति’ नामक पुस्तक में चौथा अध्याय ‘जाति, धर्म और लैंगिक मसले’ है। इसके तहत एक उप-शीर्षक ‘धर्म, संप्रदाय और राजनीति’ है जिसमें सांप्रदायिकता के बारे में बताया गया है। बच्चों को सांप्रदायिकता में राजनीति की भूमिका समझाने के लिए तीन कार्टून दिए गए हैं। पहले दो कार्टून में फैज की एक-एक शायरी भी लिखी है। वहीं, तीसरा कार्टून हमारे सहयोगी अखबार द टाइम्स ऑफ इंडिया (ToI Cartoon In CBSE Class 10 Textbook) है। इनमें फैज की शायरी वाले पहले दोनों कार्टून हटा दिए गए हैं।
इन तीन में से पहले दो कार्टून सिलेबस से हटा दिए गए।दरअसल इन तस्वीरों में दो पोस्टर और एक राजनीतिक कार्टून बने हैं.फैज की नज्मों के साथ बना इनमें से एक पोस्टर एनजीओ अनहद (एक्ट नाउ फॉर हार्मनी एंड डेमोक्रेसी) द्वारा जारी किया गया था.अनहद के सह संस्थापकों में सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी और हर्ष मंदर शामिल हैं।ये दोनों पोस्टर और कार्टून ही वो तस्वीरें हैं, जिन्हें पाठ्यक्रम से हटाया गया है. इनमें फैज की नज्में लिखी हुई थीं।
अग्रणी साहित्यिक वेब पोर्टल ‘रेख्ता’ के मुताबिक, जिस कविता से ये नज्में ली गई हैं, उनकी रचना फैज ने उस समय की थी, जब उन्हें लाहौर की एक जेल से जंजीरों में जकड़कर एक दंत चिकित्सक के कार्यालय में एक तांगे से ले जाया जा रहा था।दूसरा पोस्टर फैज की एक अन्य कविता के अंशों के साथ ‘वॉलेंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ द्वारा जारी किया गया था, जो खुद को 27 राज्यों के संघों के एक संघ के रूप में वर्णित करता है।रेख्ता के मुताबिक, फैज ने यह कविता 1974 में ढाका की अपनी यात्रा के बाद लिखी थी।
इधर, कक्षा 11वीं की इतिहास की पुस्तक से मध्य इस्लामी भूमि (Central Islamic Lands) का चैप्टर हटा दिया गया है। इस अध्याय में अफ्रीकी-एशियाई क्षेत्रों में इस्लामी साम्राज्य के उदय और वहां की अर्थव्यवस्था और समाज पर इसके प्रभाव के बारे में बताया गया था। इसके साथ ही, कक्षा 10वीं की खाद्य सुरक्षा नामक अध्याय से कृषि पर वैश्वीकरण के प्रभाव के हिस्से को हटा दिया गया है। इसी तरह, 12वीं की राजनीति शास्त्र पुस्तक से शीत युद्ध काल और गुटनिरपेक्ष आंदोलन का चैप्टर हटा दिया गया है।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ इतिहास या समाज विज्ञान जैसे विषयों के चैप्टर ही हटाए या बदले गए हैं। सीबीएसई ने नए सिलेबस में गणित के भी कई चैप्टर हटा दिए और उनकी जगह नए अध्याय जोड़े हैं। क्लास 11 के गणित की पुस्तक से तो चार-पांच अध्याय हटा दिए गए। सीबीएसई ने पिछले शैक्षणिक सत्र 2021-22 के लिए भी पाठ्यक्रमों में बदलाव किया था। तब बोर्ड ने 11वीं की राजनीति शास्त्र पुस्तक से संघवाद, नागरिकता, राष्ट्रवाद, धर्निरपेक्षता जैसे अध्याय हटा दिए थे, लेकिन विवाद होने पर इन्हें वापस जोड़ दिया गया था।
इसके अलावा पुस्तक से लोकतंत्र और विविधता पर अध्याय को भी हटाया गया है, जिसमें छात्रों को भारत सहित दुनियाभर में जाति की तर्ज पर सामाजिक विभाजन और असमानताओं की अवधारणाओं से वाकिफ कराया जाता था।साथ ही नेपाल और बोलीविया पर केंद्रित प्रसिद्ध संघर्ष और आंदोलन और लोकतांत्रिक राजनीति में सुधार को लेकर लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियों को भी हटाया गया है।
जो पाठ्यक्रम हटाया गया है वह इस बात को सिद्ध करता है कि ये भारत के नौजवान होते बच्चों को कुएं का मेंढक बनाने संकल्पिक है।साथ ही साथअन्य संस्कृतियों के घालमेल से परिपक्व हमारी संस्कृति का संकुचित दायराकर किशोरों के मन से मुगलकालीन संस्कृति का राम नाम सत्य कर देना चाहते हैं। लोकतंत्र से विपक्ष और विरोध के स्वर समाप्त हों इसलिए क्रांतिकारी कवि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के कविता पोस्टर हटाए गए हैं।उल्लेखनीय है कि साल 2020 में आईआईटी कानपुर में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों द्वारा फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म ‘हम देखेंगे’ को गाए जाने पर एक फैकल्टी मेंबर ने इसे ‘हिंदू विरोधी’ बताया था और इसकी दो पंक्तियों पर आपत्ति जताई थी । गुटनिरपेक्ष आंदोलन जिससे भारत देश की दुनिया में पहचान बनी उस पहचान को भी समाप्त करने की कोशिश पाठ्यक्रम में की गई हैै ताकि बच्चे देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की इस पहल को याद ना रख पाए जबकि रूस और यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत की भूमिका गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मुताबिक ही अभी चल रही है।
तमाम परिवर्तन से बात स्पष्ट होती जा रही है कि भारतीय संस्कृति और भारतीय इतिहास भाजपा के लिए कंटक नज़र आ रहे हैं यह साम्प्रदायिक सद्भाव और भाईचारे की इबारत लिखते हैं इसलिए ऐसे ज्ञान से मोक्ष पाने की ये कसरत है।अगर इसका मिलजुलकर विरोध नहीं होगा तो यह तय है कि जो 75 लेखक बड़ी सेलरी लेकर नव विचार लेकर आज़ादी के अमृत दिवस 15 अगस्त को लेकर आ रहे हैं वह भारत की बहुरंगी गंगा जमुनी संस्कृति का मरणोत्सव बनेगा।





