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कम बजट वाले स्कूलों की नींद उड़ा रहा हैं  आरटीई कानून

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अविनाश चंद्र
शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून 2009 की विसंगतियां एक बार फिर से कम बजट वाले स्कूलों की नींद उड़ा रही हैं। दरअसल आरटीई के प्रावधानों के आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में निजी स्कूलों के शिक्षकों को सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के समान वेतन, पीएफ, ग्रैच्युटी, मेडिकल आदि प्राप्त करने का अधिकारी बताया है। कोर्ट ने इन स्कूलों में शिक्षकों को निकालने से पहले उसी प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक बताया है जो सरकारी स्कूलों में अपनाई जाती हैं।

सबसे समान व्यवहार
शिक्षा का अधिकार कानून सभी प्रकार के स्कूलों को समान रूप से ‘ट्रीट’ करता है, जबकि भारतीय शिक्षा प्रणाली एकल विद्यालय, गली-मोहल्ले में चलने वाले बजट स्कूल, सामुदायिक स्कूल, धार्मिक अल्पसंख्यक स्कूल, गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूल, सहायता प्राप्त निजी स्कूल, अर्द्ध सरकारी स्कूल, ग्राम पंचायत के स्कूल, म्युनिसिपैलिटी स्कूल, राज्य सरकार के स्कूल, केंद्र सरकार के स्कूल, विशेष प्रतिभा स्कूल, आवासीय नवोदय स्कूल आदि में विभक्त है। इन सभी स्कूलों में कार्य-प्रणाली, पढ़ने वाले छात्रों की पृष्ठभूमि, परिवार की आर्थिक-सामाजिक स्थिति, यहां कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता, कार्य करने का इंसेंटिव, स्कूल संचालकों का मोटिवेशन आदि एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।

आरटीई ‘वन शर्ट फिट्स ऑल’ (एक कमीज के सब पर अटने) वाले सिद्धांत पर आधारित है। पर एक नाप की कमीज सब क्यों नहीं पहन सकते, आइए समझते हैं-

हायर एंड फायर
निजी और सरकारी स्कूलों के प्रदर्शन में अंतर का एक कारण निजी संस्थानों के पास मनमुताबिक हायर और फायर का अधिकार भी है। अब यदि सरकार कोर्ट के आदेश का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने लगे तो कितने स्कूलों की फीस बढ़ानी पड़ेगी, कितने शिक्षकों और कर्मचारियों की संख्या में कटौती करनी होगी, कितने स्कूल बंद होने को मजबूर होंगे इनकी बस कल्पना ही की जा सकती है।

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