भारत की जानी-मानी कलाकार और सोशल वर्कर रूबल नागी ने शिक्षा के क्षेत्र में इंटरनेशनल लेवल पर भारत का नाम रोशन किया है। रूबल नागी को वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित ‘ग्लोबल टीचर प्राइज’ से दुबई में सम्मानित किया गया है।इस अवार्ड के बाद रूबल नागी लगातार सुर्खियों में हैं। जानिए कौन है रूबल नागी और उन्होंने ऐसी क्या पहल की है कि जिसकी बदौलत उन्हें ग्लोबल टीचर प्राइज से सम्मानित किया गया है?

ग्लोबल टीचर प्राइज पाकर रूबल नागी रातोंरात बनीं करोड़पति दुबई में आयोजित World Government Summit के दौरान रूबल नागी की दो दशक लंबी सामाजिक यात्रा को दुनिया ने सराहा
। GEMS Education Global Teacher Prize जिसे शिक्षा जगत का “नोबेल पुरस्कार” कहा जाता है, इसके तहत रूबल नागी को $1 मिलियन यानी 9 करोड़ रुपये से अधिक की पुरस्कार राशि मिली है। 139 देशों को पछाड़ कर रूबक नागी ने जीता खिताब ग्लोबल टीचर प्राइज़ 2026 के लिए 139 देशों से 5,000 से अधिक नामांकन प्राप्त हुए थे, जिनमें से रूबल नागी का चयन किया गया।
उन्हें यह पुरस्कार दुबई के क्राउन प्रिंस शेख हमदान बिन मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम और वर्खी फाउंडेशन के फांडडर सनी वर्की द्वारा प्रदान किया गया। यह पुरस्कार वर्खी फाउंडेशन द्वारा UNESCO के सहयोग से दिया जाता है।

कौन हैं रूबल नागी? रूबल नागी मुंबई की रहने वाली एक प्रसिद्ध कलाकार, म्यूरलिस्ट और सोशल वर्क हैं। इनका जन्म जम्मू-कश्मीर में हुआ और उन्होंने लंदन के Slade School of Fine Art से आर्ट सब्जेक्ट की पढ़ाई की। शुरुआत में वह अपनी मूर्तिकला और भित्ति चित्रों के लिए पहचानी गईं। लेकिन बाद में रूबल ने कला को सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाते हुए “क्लासरूम” की पारंपरिक अवधारणा को पूरी तरह से नया रूप दिया।
इसी सोच के साथ उन्होंने Rouble Nagi Art Foundation (RNAF) की स्थापना की। ‘मिसाल मुंबई’ से झुग्गियों में आई नई रंगत यह सम्मान उन शिक्षण प्रयासों के लिए दिया गया, जिनके ज़रिए रूबल नागी ने देश की झुग्गियों और वंचित इलाकों में शिक्षा की एक नई इबारत लिखी। रूबल नागी की फाउंडेशन की प्रमुख पहल “मिसाल मुंबई” ने देशभर में शहरी झुग्गियों और ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदल दी। इस पहल के तहत हजारों जर्जर घरों को रंगों और मरम्मत के ज़रिए नया जीवन मिला, वहीं लाखों बच्चों को औपचारिक शिक्षा से जोड़ा गया।

अलग-अलग वंचित समुदायों और गांवों की झुग्गी बस्तियों में 800 से अधिक लर्निंग सेंटर्स संचालित कर रही रूबल को उनकी नवाचारी और ज़मीनी शिक्षा मॉडल के लिए दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों में चुना गया।
‘Living Walls of Learning’ जब दीवारें बन गईं स्कूल रौबल नागी को यह प्रतिष्ठित पुरस्कार उनके अनोखे और नवाचारी कॉन्सेप्ट “Living Walls of Learning” के लिए मिला। इस पहल के तहत झुग्गियों और हाशिए पर बसे इलाकों की टूटी-फूटी या खाली दीवारों को इंटरएक्टिव शैक्षणिक म्यूरल्स में बदला जाता है। ये दीवारें बच्चों के लिए स्थायी पाठ्यपुस्तक की तरह काम करती हैं, जिन पर अक्षर, अंक, विज्ञान, इतिहास, स्वच्छता, सामाजिक जिम्मेदारी और पर्यावरण से जुड़े विषय रचनात्मक ढंग से उकेरे जाते हैं।
क्या है ‘Living Walls of Learning’?
‘लिविंग वॉल्स ऑफ लर्निंग’ उन बच्चों तक शिक्षा पहुंचाती है, जिन्होंने कभी स्कूल का दरवाज़ा नहीं देखा। रंगों और चित्रों के ज़रिए सीखने की यह प्रक्रिया बच्चों में स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा करती है और उन्हें औपचारिक शिक्षा की ओर कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है। रौबल नागी का मानना है कि शिक्षा चार दीवारों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि वह वहीं पहुंचनी चाहिए जहाँ बच्चे मौजूद हैं। Also Read Sunetra Pawar Caste: महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी सीएम सुनेत्रा की जाति क्या है?
‘वहिनी’ का घराना भारत के लिए गौरव, दुनिया के लिए प्रेरणा रौबल नागी की यह उपलब्धि न केवल भारत के लिए गर्व का विषय है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल भी है कि कैसे कला, शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन एक साथ मिलकर समाज की दिशा बदल सकते हैं। उनका यह सफर साबित करता है कि अगर सोच अलग हो, तो एक दीवार भी स्कूल बन सकती है।






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