अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*रुपये की लुढ़कती साख और गोदी मीडिया की मरी हुईं जुबां….सवाल पूछने होंगे*

Share

हरेंद्र किलका

बिल्कुल शांति है। कहीं कोई शोर नहीं। न कोई बहस, न कोई चीखता-चिल्लाता ऐंकर। रुपया 88.07 पर पहुंच गया, लेकिन टीवी स्टूडियो में न थाली बज रही है, न मोमबत्ती जल रही है, और न ही कोई राष्ट्रभक्ति का सर्टिफिकेट बांट रहा है।

क्यों? क्योंकि जब सच बोलने से विज्ञापन बंद होने लगें, तो गोदी मीडिया चुप रहना ही बेहतर समझता है।

आजादी के सपनों से 2025 की हकीकत तक: यह कैसी तरक्की?

1947 में जब हमने आजादी का सूरज उगते देखा था, तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि 75 साल बाद हम अपनी ही आर्थिक नीतियों के कैदी बन जाएंगे। तब जवाहरलाल नेहरू ने योजना आयोग बनाया था, क्योंकि उनकी सोच थी कि आर्थिक विकास योजनाबद्ध होना चाहिए, जनता के लिए होना चाहिए। लेकिन 1991 में जब उदारीकरण आया, तो खेल बदल गया। “मुक्त बाजार” के नाम पर देश को कॉर्पोरेट लॉबी के हवाले कर दिया गया।

2025 तक आते-आते हालत यह है कि रुपया अपनी ही मिट्टी में मिल रहा है, लेकिन सरकार और मीडिया इसे देशभक्ति के चाशनी में लपेटकर परोस रहे हैं। अब यह मत पूछिए कि डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की यह दुर्गति किसकी देन है। जब सत्ता में बैठे लोग सिर्फ जुमलेबाजी में व्यस्त होंगे, जब नीतियां सिर्फ बड़े उद्योगपतियों के फायदे के लिए बनाई जाएंगी, और जब जनता को सच बताने वाले पत्रकारों को देशद्रोही ठहराया जाएगा, तो फिर रुपये की यह दुर्गति कोई आश्चर्य की बात नहीं।

गोदी मीडिया: जब सरकार फेल हो, तो जनता को दोष दो

रुपया गिर रहा है, लेकिन न्यूज़ चैनलों पर कोई चर्चा नहीं। वे अभी तक इस बहस में उलझे हैं कि लड़कियों को जींस पहननी चाहिए या नहीं, किसने किसे ‘जय श्री राम’ नहीं कहा, और किसकी देशभक्ति संदिग्ध है। सरकार को कटघरे में खड़ा करने की हिम्मत अब किसी ऐंकर में नहीं बची। उनके लिए “अर्थव्यवस्था का गिरना” कोई मुद्दा नहीं, लेकिन “फ़िल्म में क्या डायलॉग था” यह राष्ट्रवाद से जुड़ा सवाल है।

जब 2013 में रुपया 68 पर था, तो यही गोदी मीडिया “अर्थव्यवस्था की कब्र खुद चुकी है” जैसे प्रोग्राम चला रहा था। आज रुपया 88.07 पर है, लेकिन न कोई बहस, न कोई चिंता।

सरकारी नीतियां: चंद लोगों के फायदे के लिए जनता की बलि

रुपये की गिरावट सिर्फ एक नंबर नहीं है, बल्कि यह सरकार की नीतियों का आईना है। जब सरकारी बैंकों को लुटाकर चंद उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाया जाएगा, जब आत्मनिर्भर भारत के नाम पर विदेशी कंपनियों को बाज़ार में खुली छूट दी जाएगी, जब उत्पादन घटेगा, और नौकरियां खत्म होंगी, तब रुपये का गिरना तय है।

लेकिन चिंता मत करिए, सरकार के पास इसका भी जवाब है— “देश 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने वाला है।”

कौन बताए कि जब आपकी जेब में ही पैसे नहीं बचेंगे, तो 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से आम आदमी को क्या फायदा?

आजादी के 75 साल बाद: क्या यही सपना देखा था?

हमने आजादी इसलिए नहीं पाई थी कि कुछ पूंजीपति देश की संपत्तियों पर कब्जा करें और सरकार उनके हितों की चौकीदारी करे। हमें लोकतंत्र इसलिए नहीं मिला था कि मीडिया सत्ता के चरणों में लोट जाए और जनता को मूर्ख बनाने का धंधा करे। हमने यह स्वतंत्रता इसलिए नहीं पाई थी कि एक तरफ सरकारी घोषणाएं हों और दूसरी तरफ जमीनी हकीकत उससे बिल्कुल उलट हो।

आज रुपये की कीमत गिर रही है, लेकिन इससे पहले हमारी सोच, हमारी आवाज़ और हमारा सिस्टम गिर चुका है।

अब भी चुप रहोगे?

यह वक्त चुप रहने का नहीं है। हमें सवाल पूछने होंगे—

जब रुपया गिर रहा था, तब सरकार क्या कर रही थी?

जब महंगाई बढ़ रही थी, तब आर्थिक विशेषज्ञ कहां थे?

जब जनता की नौकरियां जा रही थीं, तब आत्मनिर्भर भारत के नारे का क्या हुआ?

जब मीडिया सरकार का बचाव कर रहा था, तब लोकतंत्र कहां था?

अगर हमने अब भी सवाल नहीं किए, तो अगली बार जब रुपया 100 पार करेगा, तब भी यही गोदी मीडिया आपको बताएगा कि देश “विश्वगुरु” बनने वाला है।

अब फैसला आपका है— आप चुपचाप सब देखते रहेंगे, या फिर सरकार से जवाब मांगेंगे?

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें