अग्नि आलोक
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संसार वृक्ष/आत्म वृक्ष का स्वरूप

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दीक्षा के समय शक्तिपात - अग्नि आलोक

डॉ. विकास मानव

अविनाशी आत्मा आधारित इस ‘संसार वृक्ष’ (आत्म वृक्ष) का वर्णन करते हुए कठोपनिषद् में श्रुतिमंत्र है :
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ॥ एतद् वै तत् ॥
(२.३.१)

पदच्छेद और शब्दार्थ :
ऊर्ध्वमूल: = ऊपर की ओर मूल; (तथा) अवाक्शाख: = अकथनीय शाखाओं वाला; एष: = यह; अश्वत्थः = अश्वत्थ (आत्मवृक्ष-संसारवृक्ष); सनातनः = सनातन है; तत् = वह आत्मा (अंगुष्ठमात्र पुरुष); एव = ही; शुक्रम् = शुभ्रस्वरूप है; तत् = वह; ब्रह्म = ब्रह्म है; तत् = उसको; एव = ही; अमृतम् = अमृतपुरुष (हिरण्यगर्भ); उच्यते = कहते हैं; । तस्मिन् = उसमें; लोकाः श्रिताः सर्वे = समस्त लोक आश्रय पाये हुए हैं; तत् उ = उस को; न अत्येति = अतिक्रमण कर नहीं सकता; कश्चन = कोई भी; एतत् वै तत् = ; निश्चय, यही है वह (आत्मा, जिसके बारे में तुमने पूछा है) । ॥१॥
अर्थ :
ऊपर की ओर मूल अर्थात् ऊर्ध्वलोक में अपनी उत्पत्ति का आधार तथा अकथनीय शाखाओं वाला यह अश्वत्थ (आत्मवृक्ष-संसारवृक्ष) सनातन है । वह आत्मा (अंगुष्ठमात्र पुरुष) ही शुभ्रस्वरूप है । वह ब्रह्म है । उसको ही अमृतपुरुष (हिरण्यगर्भ) कहते हैं । उसमें समस्त लोक आश्रय पाये हुए हैं । उसको कोई भी अतिक्रमण कर नहीं सकता । निश्चय, यही है वह (आत्मा जिसके बारेमें तुमने पूछा है) ।” ॥१॥
भावार्थ एवं व्याख्या :
पूर्व श्रुतिमंत्र क्रमांक २.२.१४ में आये विवरण अनुसार कुमार नचिकेता ने इस अधोलोक में जिसे मृर्त्यलोक रूपमें जाना गया है तथा जिसे कर्मलोक कहा गया है, यहाँ मनुष्यजीवन की शाश्वत सुख और शान्तिमय जीवनचर्या को धारण करने हेतु देहस्थ अंगुष्ठमात्र पुरुष को प्राप्त करने का मार्ग जान लेना चाहा है। उसने यह भी पूछा है कि- यह अणुरूप, अजन्मा, अवक्र, चेतनस्वरूप, महान् आत्मा प्रकाशित होता है या नहीं अर्थात् यह इस सांसारिक पुरुष द्वारा जानने में आता है अथवा नहीं ? कुमार नचिकेता की इस विषयानुकूल जिज्ञासा को पूर्ण करने हेतु यमदेव द्वारा दिया गया प्रत्युत्तर इस ‘तृतीय वल्ली’ में आया है। अथ यह ‘तृतीय वल्ली’ इस जगतरूप को उजागर करने और सब प्राणियों (मनुष्यों) के देहरूप में स्थित ब्रह्मस्वरूप आत्मा को प्राप्त करने का मार्ग प्रकट करनेवाली है।
विषय को आरम्भ करते हुए पूर्व श्रुतिमंत्र २.२.१५ में यमदेव का कथन है कि इस देहस्थ स्वयंप्रकाश आत्मा के प्रकाशित पर यह सब प्रकाशित होता है । अब कथन कि निरन्तरता तथा सकल नश्वर जगतरूप और देहस्थ अनश्वर आत्मा की पृथकता को अपनाकर यह आत्म-रहस्य प्रकट किया गया है कि- “यह आत्मा ऊपर की ओर मूल तथा अकथनीय शाखाओं वाला सनातन अश्वत्थ वृक्ष है।
देहस्थ अवस्था में वह आत्मा जगतरूप को अपनाकर भी शुभ्रस्वरूप ही है । वह ब्रह्म है । उसको ही अमृतपुरुष (हिरण्यगर्भ पुरुष) कहते हैं । उसमें सब-के-सब लोक आश्रित हैं । कोई भी उस पुरुषरूप आत्मा का देहस्थ अंगुष्ठमात्र पुरुष का) अतिक्रमण कर नहीं सकता । निश्चय, यही है वह आत्मा, जिसके बारे में तुमने पूछा है ।”

यह श्रुतिमंत्र पूर्व में आये श्रुतिमंत्र क्रमांक २.२.८ से मिलता-जुलता है। पूर्वमंत्र में सब प्राणियों (मनुष्यों) के शरीर में स्थित अंगुष्ठमात्र पुरुष को सोये हुओ में जागने वाला- ‘सुप्तेषु जागर्ति’ और नाना कामना करनेवाले पुरुषों को, उनके द्वारा की गयी कामना के अनुसार निर्मिमाण (विनिर्माण) करनेवाला अर्थात् नाना भोग-योनियों में डालने या जन्म प्रदान करनेवाला कथन किया गया है तथा अब सब देहरूप में स्थित अव्यय आत्मा को ऊर्ध्वमूल और अकथनीय शाखाओं से युक्त कहा जाकर सकल जगत् को ‘अश्वत्थ वृक्ष’ रूपमें अर्थात् अचलावस्था में स्थित हो जाना कहा गया है और इसे ‘सनातन’ होना प्रकट किया है तथा शेष कथन परस्पर एकरूपता को धारण करता है।
इस प्रकार यह श्रुतिमंत्र विचार हेतु कुल चार नवीन बिन्दु प्रकट करता है :
प्रथम- यह सर्वगत देहस्थ आत्मा ऊर्ध्वमूल है; द्वितीय- इसका यह ऊर्ध्वमूल प्रकटरूप अकथनीय है; तृतीय- यह आत्मा अश्वत्थ वृक्षरूप है तथा चतुर्थ- यह आत्मा सनातन है । शेष कथन पर पूर्व में विचार किया गया है । अतः अब हम इन उपरोक्त चारों ही बिंदु पर संक्षेप में विचार करते हैं ।
प्रथम- यहाँ इस प्राणीलोक (मनुष्यलोक) को ऊर्ध्वमूल कहा गया है।
इस ऊर्ध्वमूल अवस्था को श्रुतिकथन- ‘त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ।’ (ऋग्वेद १०.९०.४) अर्थात्- “वह पुरुष तीनपाद् ऊर्ध्व स्वयंप्रकाश अवस्था को अपनाकर स्थित हो गया है तथा शेष एकपाद् अवस्था में जीवजगत् रूपमें पुनः होने वाला बना हुआ है ।” की सहायता से सुगमतापूर्वक जाना जा सकता है।

स्पष्ट है कि इस प्राणीलोक (मनुष्यलोक) का अस्तित्व द्युलोक स्थित स्वयंप्रकाश त्रिपादूर्ध्व पुरुष पर टिका हुआ है । यह प्राणीलोक (मनुष्यलोक) उस पूर्णपुरुष का उससे जुड़ा हुआ उसका एक चौथाई भाग है। अतः इसे पृथक् जाना जा सकता नहीं । इसे पृथक् कहा जा सकता नहीं । इस धरा पर सब प्राणियों (मनुष्यों) के अस्तित्व (जीवन) को उस महान् आत्मा (परमात्मा) से पृथक् कहा और जाना जा सकता नहीं।
द्वितीय :
यहाँ इस ऊर्ध्वमूल अवस्था और इसके प्रकटरूप को अर्थात् इस सकल जगतरूप को अकथनीय (अवाक्शाख:) कहा गया है । इस अकथनीय अवस्था को ही श्रुति द्वारा तैत्तिरीय उपनिषद् में – “अविनाशी आत्मा को प्राप्त नहीं’ करके वाणी का मन के साथ वापस लौट आना कथन किया गया है ।”
‘यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह ।’ (तैत्ति.उप. २.४.१ व २.९.१) किन्तु अविनाशी सनातन आत्मवृक्ष (संसार वृक्ष) की इस ऊर्ध्वमूल अकथनीय शाखाओं वाली अवस्था को गुरुत्मान् वासुदेव श्रीकृष्ण द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता में-
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद सवेदवित् ॥ (१५.१)
अर्थात्- “ऊपर की ओर मूल तथा नीचे की ओर शाखाओं को धारण करनेवाले इस आत्मवृक्ष (संसारवृक्ष) को अविनाशी कहते हैं । छन्द अर्थात् वेद-ऋचाएँ जिसके पर्ण हैं; उन छन्द रूपी पर्णों को (अर्थात् वेद-ऋचाओं के ‘पराविद्या’ आधारित निहितार्थ को) जो कोई पुरुष जानता है, वह पुरुष वेदविज्ञ है।”
कहा जाकर उपदेश किया गया है। इस प्रकार श्रुति द्वारा प्रकट की गयी अकथनीय शाखाओं वाली ‘अवाक्शाख:’ अवस्था को स्मृतिग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता में – नीचे की ओर जाने वाली शाखाओं को धारण करनेवाला अश्वत्थ वृक्ष- ‘अध:शाखमश्वत्थं’ कहा जाकर उपदेश किया गया है।
अश्वत्थरूपी सनातन आत्मवृक्ष (संसारवृक्ष) की इस ऊर्ध्वमूल और अधोशाख अवस्था को ‘वट वृक्ष’ की सहायता से सुगमतापूर्वक जाना जा सकता है । ‘पीपल वृक्ष’ के अतिरिक्त यह ‘वट वृक्ष’ भी लोकमें ‘सनातन अश्वत्थ वृक्ष’ रूपमें जाना गया है । यह ‘वट वृक्ष’ अपनी ऊर्ध्वमुख अवस्था में नीचे की ओर जाने वाली शाखाओं द्वारा भोगवृत्ति को धारण करते हुए भू-सतह को प्राप्त कर पुनः एक नवीन वटवृक्ष रूप को धारण करनेवाला हो जाता है, जिसे देखकर इसके उद्भव और अन्त की कल्पना (जीवन-यात्रा के आरम्भ और समापन तिथी) की नहीं जा सकती।
इस प्रकार यह ‘वटवृक्ष’ नश्वर अवस्था को अपनाकर भी अविनाशी-अव्यय अवस्था को धारण करनेवाला बना हुआ है, जिसे गीतोक्त कथन-
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धनानि मनुष्यलोके ॥
न रूपमस्य तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
(१५.२-३)
अर्थात् – “उस आत्मवृक्ष (संसारवृक्ष) की विषय-भोगरूप अंकुरण को धारण करने और त्रिगुणों द्वारा वृद्धि को प्राप्त होने वाली शाखाएँ ऊर्ध्वलोक तथा इस अधोलोक में सर्वत्र फैली हुई हैं; वे इस मनुष्यलोक में कर्मबन्धन को अपनाने वाली हैं ।
इस आत्मवृक्ष (संसारवृक्ष) का स्वरूप जैसा शास्त्रों में कहा गया है, वैसा यहाँ पाया नहीं जाता; इसका न कोई आदि है और न कोई इसका अन्त ही है।

  श्वेताश्वतर उपनिषद् में आया श्रुतिकथन कि- “वह परम पुरुष अकेला ही (वट) वृक्ष की भाँति निश्चलभाव से द्योतमान् अवस्था में स्थित है; उससे यह सकल जगत् परिपूर्ण है”- ‘वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्।’ (श्वेता.उप. ३.९) भी इस आत्म-रहस्य को जान लेने में हमारी सहायता करता है।
  _स्पष्ट है कि वह ‘अंगुष्ठमात्र पुरुष’ अपनी त्रिपादूर्ध्व तथा एकपाद अधोलोक अवस्था में ‘वटवृक्ष’ रूपको धारण करनेवाला बना हुआ है । सब प्राणियों (मनुष्यों) के देहरूप में स्थित वह अंगुष्ठमात्र वामनपुरुष ही इस अधोलोक में नश्वरता को अपनाकर भी अविनाशी-अव्यय और सनातन अवस्था को धारण करके अचल-स्थिर अवस्था में स्थित हो गया है._
      चूंकि यह आत्मा विश्वरूप को अपनाकर नश्वर देहरूप और अनश्वर जीवात्मा अवस्था में ‘अन्नरसमय पुरुष’ रूपमें स्थित हो गया है- ‘स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः ।’ (तैत्ति.उप. २.१.१) तथा समस्त प्राणी समुदाय (मानव समुदाय) रूपमें पंचकोश – अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनन्दमयकोश अवस्था आधारित जीवन-यात्रा को धारण करनेवाला है । (तैत्ति.उप. ब्रह्मानन्दवल्ली) तथा श्रुति कथनानुसार अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द को ही अविनाशी ब्रह्म का प्रकटरूप होना जाना गया है।
 (तैत्ति.उप. भृगुवल्ली) अतः सगुणब्रह्म श्रीराम द्वारा भार्या देवीसीता और अनुज लक्ष्मण के साथ पंचवटी में निवास करना ब्रह्मस्वरूप आत्मा द्वारा सर्वरूप में इस पंचकोशमय जीवन-यात्रा को अपनाना प्रकट करता है, तथा महर्षि वाल्मिकि का कथन कि-   

कञ्चित् कालं स धर्मात्मा सीतया लक्ष्मणेन च ।
अन्वास्यमानो न्यवसत् स्वर्गलोके यथामरः ॥

(३.१५.३१)
अर्थात्- “उन धर्मात्मा श्रीराम द्वारा भार्या देवी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ, मरणधर्मा मनुष्य द्वारा स्वर्गलोक में निवास करने की भाँति किञ्चित् काल के लिये (पंचवटी में) निवास किया ।”

इस मर्त्यलोक में मनुष्यमात्र की पंचकोशमय शाश्वत सुखमय और शान्त जीवनचर्या की अकथनीय अवस्था को प्रकट करता है और जान लेने में सहायक हो गया है । यह इस धरा पर ‘अहोरात्र’ आधारित मानवमात्र की जीवन-यात्रा को बोधमय अवस्था में प्रकट करनेवाला प्रकट होता है।
तृतीय-
यहाँ इस श्रुतिमंत्र में अव्यय सनातन आत्मा का वर्णन करते हुए ‘अश्वत्थ’ संज्ञा पद अपनाया गया है । यह ‘अश्वत्थ’ नाम-सम्बोधन प्रतिबोधात्मक है । इस ‘अश्वत्थ’ शब्द को सामान्य रूपमें ‘पीपल के वृक्ष’ का सूचक जाना जाता है । किन्तु यह ‘अश्वत्थ’ शब्द यहाँ ‘वट वृक्ष’ और ‘पीपल वृक्ष’ के उभयरूप को सूचित करनेवाला हो गया है।
कोई भी वृक्ष अपने उत्पन्न होने की प्रक्रिया में बीजरूप को अपनाता है तथा जन्म, जरा और मरण आधारित गुण-धर्म के साथ-साथ जड़, तना, शाखा, पर्ण, पुष्प और फल आधारित छः अंगों को धारण करता है । अतः यह अश्वत्थ वृक्ष अपने उभय रूपमें नश्वर और अनश्वर जगतरूप को प्रकट करनेवाला हो गया है । अश्वत्थ वृक्ष आधारित ‘पीपल वृक्ष’ रूपमें यह ‘असंग अक्षरपुरुष’ को ‘बीज’ आधारित अनेकरूप अवस्था में तथा ‘वट वृक्ष’ रूपमें यह बीज आधारित कामनायुक्त अवस्था में क्षरपुरुष की सतत् जन्म-प्रक्रिया को जान लेने में हमारी सहायता करता है।
पीपलवृक्ष के सब पर्ण एकरूप अवस्था को धारण करते हुए भी एकरूप होते नहीं हैं । सब पर्ण अपने बाह्य रूपमें आकार-प्रकार की भिन्नता के साथ-साथ ही अपनी आन्तरिक शंकु संरचना की परस्पर भिन्नता को धारण करते हैं । सब पर्ण नवजात अवस्था में रक्तिम् पारदर्शी लालिमा को धारण करने वाले और कालान्तर आधारित वनस्पति जगत् की हरीतिमा और पीतवर्ण आधारित जरा के साथ-साथ ही पतन रूपमें मृत्यु को अपनाने वाले होते हैं; जिसके आधारपर श्रुतिकथन- ‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च।’
(कठ.उप. २.२.९) ‘एकं रूपं बहुधा यः करोति ।’ (कठ.उप. २.२.१२) अर्थात् “नाना रूपमें स्थित हो जाना और उनके बाहर भी स्थित बने रहना” और “अपने एक ही रूप को बहुत प्रकार का कर लेना” तथा श्वेताश्वतर उपनिषद् में आये श्रुतिकथन-
एको वशी निष्क्रियाणां बहुना-मेकं बीजं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥
(६.१२)
अर्थात्- “जो अकेला ही सबको अपने वश में रखने वाला परमात्मा बहुत-से निष्क्रिय जीवों के एक ही बीज को अनेकरूप कर देता है, अपने अन्तःअकरण में स्थित उस पुरुष (वामनदेव) को मतिमान् पुरुष सबमें स्थित देखते हैं उन्हें ही शाश्वत सुख प्राप्त होता है, अन्य दूसरों को नहीं ।”
इस धरा पर मानवमात्र की रूप-रंग और आकार-प्रकार की विविधता और विचारक्रम की भिन्नता एवं जीवन-यात्रा के सतत् क्रम का बोध प्राप्त किया जा सकता है।
अथ यह अश्वत्थ वृक्ष प्रतिबोधात्मक आधार पर – ‘पीपल वृक्ष’ रूपमें मनुष्यों से भरे हुए अखिल नश्वर संसार का तथा ‘वट वृक्ष’ रूपमें आत्मवृक्ष के अकथनीय अधोशाख आधारित सनातन स्वरूप का परिचय मन की भावभूमि में प्राप्त करने में सहायक हो गया है । यह अश्वत्थ वृक्ष अपने इस उभयरूप में क्षरपुरुष और अक्षर पुरुष के प्रकट वृक्षरूप का परिचय प्रदान करनेवाला हो गया है, जिसके आधार पर उस परमेश्वर को ‘वन नाम’ कहे जाने- ‘तद्वनं नाम’ (केन.उप. ४.६) और इस गहन-गूढ़ वनरूप में स्थित होने- ‘गह्वरेष्ठं’ (कठ.उप. १.२.१२) का बोध सहज और सुगमता पूर्वक प्राप्त किया जा सकता है।
अतः पौराणिक कथाओं में आये विवरण अनुसार आदिदेव भगवान शिव द्वारा वटवृक्ष को अपनाकर इस वटवृक्ष के नीचे सपरिवार निवास करना और इसके नीचे बैठकर अखण्ड समाधि अवस्था को धारण करना – तथा भगवान विष्णु द्वारा बालरूप को अपनाकर वटवृक्ष के पर्ण पर किलोल करना सकल जगत् की अर्थात् सम्पूर्ण मानवसमुदाय की ‘कामनामय अनश्वर अवस्था’ को असंग रूपमें अपनाना और अबोध ‘साम्पराय:’ (कठ.उप. १.२.६) रूपमें धारण करना प्रकट करता है।
चतुर्थ-
यहाँ इस श्रुतिमन्त्र में अव्यय आत्मा को ‘सनातन’ कहा गया है । वेदवाणी में श्रुतिकथन आया है कि यह पुरुष (अपने भोक्ता-पक्षी रूपमें) सबसे पहले जन्म को प्राप्त हुआ है- सुपर्णो जातः प्रथमः । (अथर्ववेद १.२४.१) तथा ‘सनातन’ शब्द की परिभाषा करते हुए कथन किया गया है कि- ‘सनातनमेनमहुरुताद्या स्यात् पुनर्णव।’ (अथर्ववेद १०.८.२३) अर्थात् – “सनातन इस पुरुष (ब्रह्मस्वरूप आत्मा) को कहते हैं, जो आदि में (आरम्भ में) उत्पन्न होकर आज भी नवीनता को लिये हुए है।”
इस प्रकार यह आत्मा अपने क्षर और अक्षर पुरुषरूपमें शाश्वत अश्वत्थ वृक्षरूप अवस्था को धारण करनेवाला है।

अपने इस कथन को जारी रखते हुए अब आगे यमदेव का कथन है :
[ कठोपनिषद् पर की जा रही अग्नि टीका का एक अंश ] (अंगुष्ठमात्र पुरुष); एव = ही; शुक्रम् = शुभ्रस्वरूप है; तत् = वह; ब्रह्म = ब्रह्म है; तत् = उसको; एव = ही; अमृतम् = अमृतपुरुष (हिरण्यगर्भ); उच्यते = कहते हैं; । तस्मिन् = उसमें; लोकाः श्रिताः सर्वे = समस्त लोक आश्रय पाये हुए हैं; तत् उ = उस को; न अत्येति = अतिक्रमण कर नहीं सकता; कश्चन = कोई भी; एतत् वै तत् = ; निश्चय, यही है वह (आत्मा, जिसके बारे में तुमने पूछा है) । ॥१॥
अर्थात् – “ऊपर की ओर मूल अर्थात् ऊर्ध्वलोक में अपनी उत्पत्ति का आधार तथा अकथनीय शाखाओं वाला यह अश्वत्थ (आत्मवृक्ष-संसारवृक्ष) सनातन है। वह आत्मा (अंगुष्ठमात्र पुरुष) ही शुभ्रस्वरूप है । वह ब्रह्म है । उसको ही अमृतपुरुष (हिरण्यगर्भ) कहते हैं। उसमें समस्त लोक आश्रय पाये हुए हैं। उसको कोई भी अतिक्रमण कर नहीं सकता । निश्चय, यही है वह (आत्मा जिसके बारेमें तुमने पूछा है) ।” ॥१॥
भावार्थ एवं व्याख्या
पूर्व श्रुतिमंत्र क्रमांक २.२.१४ में आये विवरण अनुसार कुमार नचिकेता ने इस अधोलोक में जिसे मृर्त्यलोक रूपमें जाना गया है तथा जिसे कर्मलोक कहा गया है, यहाँ मनुष्यजीवन की शाश्वत सुख और शान्तिमय जीवनचर्या को धारण करने हेतु देहस्थ अंगुष्ठमात्र पुरुष को प्राप्त करने का मार्ग जान लेना चाहा है । उसने यह भी पूछा है कि- यह अणुरूप, अजन्मा, अवक्र, चेतनस्वरूप, महान् आत्मा प्रकाशित होता है या नहीं अर्थात् यह इस सांसारिक पुरुष द्वारा जानने में आता है अथवा नहीं ? कुमार नचिकेता की इस विषयानुकूल जिज्ञासा को पूर्ण करने हेतु यमदेव द्वारा दिया गया प्रत्युत्तर इस ‘तृतीय वल्ली’ में आया है।
अथ यह ‘तृतीय वल्ली’ इस जगतरूप को उजागर करने और सब प्राणियों (मनुष्यों) के देहरूप में स्थित ब्रह्मस्वरूप आत्मा को प्राप्त करने का मार्ग प्रकट करनेवाली है । विषय को आरम्भ करते हुए पूर्व श्रुतिमंत्र २.२.१५ में यमदेव का कथन है कि इस देहस्थ स्वयंप्रकाश आत्मा के प्रकाशित पर यह सब प्रकाशित होता है । अब कथन कि निरन्तरता तथा सकल नश्वर जगतरूप और देहस्थ अनश्वर आत्मा की पृथकता को अपनाकर यह आत्म-रहस्य प्रकट किया गया है कि- “यह आत्मा ऊपर की ओर मूल तथा अकथनीय शाखाओं वाला सनातन अश्वत्थ वृक्ष है।
देहस्थ अवस्था में वह आत्मा जगतरूप को अपनाकर भी शुभ्रस्वरूप ही है । वह ब्रह्म है । उसको ही अमृतपुरुष (हिरण्यगर्भ पुरुष) कहते हैं । उसमें सब-के-सब लोक आश्रित हैं । कोई भी उस पुरुषरूप आत्मा का देहस्थ अंगुष्ठमात्र पुरुष का) अतिक्रमण कर नहीं सकता । निश्चय, यही है वह आत्मा, जिसके बारे में तुमने पूछा है।”
यह श्रुतिमंत्र पूर्व में आये श्रुतिमंत्र क्रमांक २.२.८ से मिलता-जुलता है । पूर्वमंत्र में सब प्राणियों (मनुष्यों) के शरीर में स्थित अंगुष्ठमात्र पुरुष को सोये हुओ में जागने वाला- ‘सुप्तेषु जागर्ति’ और नाना कामना करनेवाले पुरुषों को, उनके द्वारा की गयी कामना के अनुसार निर्मिमाण (विनिर्माण) करनेवाला अर्थात् नाना भोग-योनियों में डालने या जन्म प्रदान करनेवाला कथन किया गया है तथा अब सब देहरूप में स्थित अव्यय आत्मा को ऊर्ध्वमूल और अकथनीय शाखाओं से युक्त कहा जाकर सकल जगत् को ‘अश्वत्थ वृक्ष’ रूपमें अर्थात् अचलावस्था में स्थित हो जाना कहा गया है और इसे ‘सनातन’ होना प्रकट किया है तथा शेष कथन परस्पर एकरूपता को धारण करता है।
इस प्रकार यह श्रुतिमंत्र विचार हेतु कुल चार नवीन बिन्दु प्रकट करता है कि-
प्रथम- यह सर्वगत देहस्थ आत्मा ऊर्ध्वमूल है; द्वितीय- इसका यह ऊर्ध्वमूल प्रकटरूप अकथनीय है; तृतीय- यह आत्मा अश्वत्थ वृक्षरूप है तथा चतुर्थ- यह आत्मा सनातन है । शेष कथन पर पूर्व में विचार किया गया है । अतः अब हम इन उपरोक्त चारों ही बिंदु पर संक्षेप में विचार करते हैं ।
प्रथम- यहाँ इस प्राणीलोक (मनुष्यलोक) को ऊर्ध्वमूल कहा गया है।
इस ऊर्ध्वमूल अवस्था को श्रुतिकथन- ‘त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ।’ (ऋग्वेद १०.९०.४) अर्थात्- “वह पुरुष तीनपाद् ऊर्ध्व स्वयंप्रकाश अवस्था को अपनाकर स्थित हो गया है तथा शेष एकपाद् अवस्था में जीवजगत् रूपमें पुनः होने वाला बना हुआ है ।” की सहायता से सुगमतापूर्वक जाना जा सकता है।
स्पष्ट है कि इस प्राणीलोक (मनुष्यलोक) का अस्तित्व द्युलोक स्थित स्वयंप्रकाश त्रिपादूर्ध्व पुरुष पर टिका हुआ है । यह प्राणीलोक (मनुष्यलोक) उस पूर्णपुरुष का उससे जुड़ा हुआ उसका एक चौथाई भाग है। अतः इसे पृथक् जाना जा सकता नहीं। इसे पृथक् कहा जा सकता नहीं। इस धरा पर सब प्राणियों (मनुष्यों) के अस्तित्व (जीवन) को उस महान् आत्मा (परमात्मा) से पृथक् कहा और जाना जा सकता नहीं।
द्वितीय-
यहाँ इस ऊर्ध्वमूल अवस्था और इसके प्रकटरूप को अर्थात् इस सकल जगतरूप को अकथनीय (अवाक्शाख:) कहा गया है । इस अकथनीय अवस्था को ही श्रुति द्वारा तैत्तिरीय उपनिषद् में – “अविनाशी आत्मा को प्राप्त नहीं’ करके वाणी का मन के साथ वापस लौट आना कथन किया गया है ।”- ‘यतो वाचो निवर्तन्ते।
अप्राप्य मनसा सह ।’ (तैत्ति.उप. २.४.१ व २.९.१) किन्तु अविनाशी सनातन आत्मवृक्ष (संसार वृक्ष) की इस ऊर्ध्वमूल अकथनीय शाखाओं वाली अवस्था को गुरुत्मान् वासुदेव श्रीकृष्ण द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता में-
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद सवेदवित् ॥
(१५.१)
अर्थात्- “ऊपर की ओर मूल तथा नीचे की ओर शाखाओं को धारण करनेवाले इस आत्मवृक्ष (संसारवृक्ष) को अविनाशी कहते हैं । छन्द अर्थात् वेद-ऋचाएँ जिसके पर्ण हैं; उन छन्द रूपी पर्णों को (अर्थात् वेद-ऋचाओं के ‘पराविद्या’ आधारित निहितार्थ को) जो कोई पुरुष जानता है, वह पुरुष वेदविज्ञ है।”

कहा जाकर उपदेश किया गया है । इस प्रकार श्रुति द्वारा प्रकट की गयी अकथनीय शाखाओं वाली ‘अवाक्शाख:’ अवस्था को स्मृतिग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता में – नीचे की ओर जाने वाली शाखाओं को धारण करनेवाला अश्वत्थ वृक्ष- ‘अध:शाखमश्वत्थं’ कहा जाकर उपदेश किया गया है।
अश्वत्थरूपी सनातन आत्मवृक्ष (संसारवृक्ष) की इस ऊर्ध्वमूल और अधोशाख अवस्था को ‘वट वृक्ष’ की सहायता से सुगमतापूर्वक जाना जा सकता है । ‘पीपल वृक्ष’ के अतिरिक्त यह ‘वट वृक्ष’ भी लोकमें ‘सनातन अश्वत्थ वृक्ष’ रूपमें जाना गया है । यह ‘वट वृक्ष’ अपनी ऊर्ध्वमुख अवस्था में नीचे की ओर जाने वाली शाखाओं द्वारा भोगवृत्ति को धारण करते हुए भू-सतह को प्राप्त कर पुनः एक नवीन वटवृक्ष रूप को धारण करनेवाला हो जाता है, जिसे देखकर इसके उद्भव और अन्त की कल्पना (जीवन-यात्रा के आरम्भ और समापन तिथी) की नहीं जा सकती।
इस प्रकार यह ‘वटवृक्ष’ नश्वर अवस्था को अपनाकर भी अविनाशी-अव्यय अवस्था को धारण करनेवाला बना हुआ है, जिसे गीतोक्त कथन-
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धनानि मनुष्यलोके ॥
न रूपमस्य तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
(१५.२-३)

अर्थात् – “उस आत्मवृक्ष (संसारवृक्ष) की विषय-भोगरूप अंकुरण को धारण करने और त्रिगुणों द्वारा वृद्धि को प्राप्त होने वाली शाखाएँ ऊर्ध्वलोक तथा इस अधोलोक में सर्वत्र फैली हुई हैं; वे इस मनुष्यलोक में कर्मबन्धन को अपनाने वाली हैं।
इस आत्मवृक्ष (संसारवृक्ष) का स्वरूप जैसा शास्त्रों में कहा गया है, वैसा यहाँ पाया नहीं जाता; इसका न कोई आदि है और न कोई इसका अन्त ही है।” की सहायता से सुगमतापूर्वक भलीभाँति जाना जा सकता है। श्वेताश्वतर उपनिषद् में आया श्रुतिकथन कि- “वह परम पुरुष अकेला ही (वट) वृक्ष की भाँति निश्चलभाव से द्योतमान् अवस्था में स्थित है; उससे यह सकल जगत् परिपूर्ण है”- ‘वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्।’ (श्वेता.उप. ३.९) भी इस आत्म-रहस्य को जान लेने में हमारी सहायता करता है।
स्पष्ट है कि वह ‘अंगुष्ठमात्र पुरुष’ अपनी त्रिपादूर्ध्व तथा एकपाद अधोलोक अवस्था में ‘वटवृक्ष’ रूपको धारण करनेवाला बना हुआ है । सब प्राणियों (मनुष्यों) के देहरूप में स्थित वह अंगुष्ठमात्र वामनपुरुष ही इस अधोलोक में नश्वरता को अपनाकर भी अविनाशी-अव्यय और सनातन अवस्था को धारण करके अचल-स्थिर अवस्था में स्थित हो गया है।
चूंकि यह आत्मा विश्वरूप को अपनाकर नश्वर देहरूप और अनश्वर जीवात्मा अवस्था में ‘अन्नरसमय पुरुष’ रूपमें स्थित हो गया है- ‘स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः।’
(तैत्ति.उप. २.१.१) तथा समस्त प्राणी समुदाय (मानव समुदाय) रूपमें पंचकोश – अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनन्दमयकोश अवस्था आधारित जीवन-यात्रा को धारण करनेवाला है। (तैत्ति.उप. ब्रह्मानन्दवल्ली) तथा श्रुति कथनानुसार अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द को ही अविनाशी ब्रह्म का प्रकटरूप होना जाना गया है । (तैत्ति.उप. भृगुवल्ली) अतः सगुणब्रह्म श्रीराम द्वारा भार्या देवीसीता और अनुज लक्ष्मण के साथ पंचवटी में निवास करना ब्रह्मस्वरूप आत्मा द्वारा सर्वरूप में इस पंचकोशमय जीवन-यात्रा को अपनाना प्रकट करता है, तथा महर्षि वाल्मिकि का कथन कि-
कञ्चित् कालं स धर्मात्मा सीतया लक्ष्मणेन च ।
अन्वास्यमानो न्यवसत् स्वर्गलोके यथामरः ॥

(३.१५.३१)
अर्थात्- “उन धर्मात्मा श्रीराम द्वारा भार्या देवी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ, मरणधर्मा मनुष्य द्वारा स्वर्गलोक में निवास करने की भाँति किञ्चित् काल के लिये (पंचवटी में) निवास किया।”
इस मर्त्यलोक में मनुष्यमात्र की पंचकोशमय शाश्वत सुखमय और शान्त जीवनचर्या की अकथनीय अवस्था को प्रकट करता है और जान लेने में सहायक हो गया है । यह इस धरा पर ‘अहोरात्र’ आधारित मानवमात्र की जीवन-यात्रा को बोधमय अवस्था में प्रकट करनेवाला प्रकट होता है।
तृतीय-
यहाँ इस श्रुतिमंत्र में अव्यय सनातन आत्मा का वर्णन करते हुए ‘अश्वत्थ’ संज्ञा पद अपनाया गया है । यह ‘अश्वत्थ’ नाम-सम्बोधन प्रतिबोधात्मक है । इस ‘अश्वत्थ’ शब्द को सामान्य रूपमें ‘पीपल के वृक्ष’ का सूचक जाना जाता है । किन्तु यह ‘अश्वत्थ’ शब्द यहाँ ‘वट वृक्ष’ और ‘पीपल वृक्ष’ के उभयरूप को सूचित करनेवाला हो गया है । कोई भी वृक्ष अपने उत्पन्न होने की प्रक्रिया में बीजरूप को अपनाता है तथा जन्म, जरा और मरण आधारित गुण-धर्म के साथ-साथ जड़, तना, शाखा, पर्ण, पुष्प और फल आधारित छः अंगों को धारण करता है।
अतः यह अश्वत्थ वृक्ष अपने उभय रूपमें नश्वर और अनश्वर जगतरूप को प्रकट करनेवाला हो गया है।
अश्वत्थ वृक्ष आधारित ‘पीपल वृक्ष’ रूपमें यह ‘असंग अक्षरपुरुष’ को ‘बीज’ आधारित अनेकरूप अवस्था में तथा ‘वट वृक्ष’ रूपमें यह बीज आधारित कामनायुक्त अवस्था में क्षरपुरुष की सतत् जन्म-प्रक्रिया को जान लेने में हमारी सहायता करता है। पीपलवृक्ष के सब पर्ण एकरूप अवस्था को धारण करते हुए भी एकरूप होते नहीं हैं।
सब पर्ण अपने बाह्य रूपमें आकार-प्रकार की भिन्नता के साथ-साथ ही अपनी आन्तरिक शंकु संरचना की परस्पर भिन्नता को धारण करते हैं । सब पर्ण नवजात अवस्था में रक्तिम् पारदर्शी लालिमा को धारण करने वाले और कालान्तर आधारित वनस्पति जगत् की हरीतिमा और पीतवर्ण आधारित जरा के साथ-साथ ही पतन रूपमें मृत्यु को अपनाने वाले होते हैं; जिसके आधारपर श्रुतिकथन- ‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च।’ (कठ.उप. २.२.९) ‘एकं रूपं बहुधा यः करोति।’ (कठ.उप. २.२.१२) अर्थात् “नाना रूपमें स्थित हो जाना और उनके बाहर भी स्थित बने रहना” और “अपने एक ही रूप को बहुत प्रकार का कर लेना” तथा श्वेताश्वतर उपनिषद् में आये श्रुतिकथन-
एको वशी निष्क्रियाणां बहुना-मेकं बीजं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥

(.उप. ६.१२)
अर्थात्- “जो अकेला ही सबको अपने वश में रखने वाला परमात्मा बहुत-से निष्क्रिय जीवों के एक ही बीज को अनेकरूप कर देता है, अपने अन्तःअकरण में स्थित उस पुरुष (वामनदेव) को मतिमान् पुरुष सबमें स्थित देखते हैं उन्हें ही शाश्वत सुख प्राप्त होता है, अन्य दूसरों को नहीं: में समाहित जीवन-सन्देश को सुगमतापूर्वक जाना जा सकता है।
इस धरा पर मानवमात्र की रूप-रंग और आकार-प्रकार की विविधता और विचारक्रम की भिन्नता एवं जीवन-यात्रा के सतत् क्रम का बोध प्राप्त किया जा सकता है । अथ यह अश्वत्थ वृक्ष प्रतिबोधात्मक आधार पर – ‘पीपल वृक्ष’ रूपमें मनुष्यों से भरे हुए अखिल नश्वर संसार का तथा ‘वट वृक्ष’ रूपमें आत्मवृक्ष के अकथनीय अधोशाख आधारित सनातन स्वरूप का परिचय मन की भावभूमि में प्राप्त करने में सहायक हो गया है । यह अश्वत्थ वृक्ष अपने इस उभयरूप में क्षरपुरुष और अक्षर पुरुष के प्रकट वृक्षरूप का परिचय प्रदान करनेवाला हो गया है, जिसके आधार पर उस परमेश्वर को ‘वन नाम’ कहे जाने- ‘तद्वनं नाम’ (केन.उप. ४.६) और इस गहन-गूढ़ वनरूप में स्थित होने- ‘गह्वरेष्ठं’ (कठ.उप. १.२.१२) का बोध सहज और सुगमता पूर्वक प्राप्त किया जा सकता है।
अतः पौराणिक कथाओं में आये विवरण अनुसार आदिदेव भगवान शिव द्वारा वटवृक्ष को अपनाकर इस वटवृक्ष के नीचे सपरिवार निवास करना और इसके नीचे बैठकर अखण्ड समाधि अवस्था को धारण करना – तथा भगवान विष्णु द्वारा बालरूप को अपनाकर वटवृक्ष के पर्ण पर किलोल करना सकल जगत् की अर्थात् सम्पूर्ण मानवसमुदाय की ‘कामनामय अनश्वर अवस्था’ को असंग रूपमें अपनाना और अबोध ‘साम्पराय:’ (कठ.उप. १.२.६) रूपमें धारण करना प्रकट करता है।
चतुर्थ-
यहाँ इस श्रुतिमन्त्र में अव्यय आत्मा को ‘सनातन’ कहा गया है । वेदवाणी में श्रुतिकथन आया है कि यह पुरुष (अपने भोक्ता-पक्षी रूपमें) सबसे पहले जन्म को प्राप्त हुआ है- सुपर्णो जातः प्रथमः । (अथर्ववेद १.२४.१) तथा ‘सनातन’ शब्द की परिभाषा करते हुए कथन किया गया है कि- ‘सनातनमेनमहुरुताद्या स्यात् पुनर्णव।’ (अथर्ववेद १०.८.२३) अर्थात् – “सनातन इस पुरुष (ब्रह्मस्वरूप आत्मा) को कहते हैं, जो आदि में (आरम्भ में) उत्पन्न होकर आज भी नवीनता को लिये हुए है ।”
इस प्रकार यह आत्मा अपने क्षर और अक्षर पुरुषरूपमें शाश्वत अश्वत्थ वृक्षरूप अवस्था को धारण करनेवाला है।
(लेखक चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं.)

Ramswaroop Mantri

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