अमीनेश मुखर्जी
23 अप्रैल 1992 को अपने जन्मदिन से ठीक नौ दिन पहले सत्यजीत रे की दिल के दौरे से मौत हो गई. वो कई दिन से बीमार थे. इस खबर के फैलते ही शहर खामोश हो गया. कोई रोना-धोना कुछ नहीं बस सन्नाटा.
मशहूर लेखक अमिताभ घोष लिखते हैं कि शहर में लोग प्लकार्ड हाथ में लिए रे के घर की तरफ जा रहे थे. बिना कुछ कहे खामोशी से. ऐसा लग रहा था, जैसे पूरे शहर को पता हो कि उन्होंने क्या खो दिया है.
तेज गर्मी थी मगर लाखों लोग कोलकाता की सड़कों गलियों में खामोश खड़े थे. ज्यादातर के हाथ में तख्तियां थीं जिनपर लिखे का मतलब बनता था ‘राजा चला गया है, अब सिंहासन खाली ही रहेगा.’
नेशनल अवार्ड विजेता अभिनेता सौमित्र चैटर्जी उस समय कोलकाता में मंच पर एक नाटक कर रहे थे. सत्यजीत रे के मरने की खबर आई. सौमित्र बिना कोई शब्द बोले स्टेज छोड़कर चले गए.
किसी ने कोई सफाई नहीं दी पब्लिक भी खामोश रही. सामने बैठे लोग भी समझते थे. और भी कई जगहों पर स्टेज, सिनेमा, थिएटर की परफॉर्मेंस चल रही थीं. सब बीच में रोक दी गईं.
अगले दिन कोलकाता की आनंदबाजार पत्रिका में एक भी विज्ञापन नहीं छपा था. ये तरीका था मीडिया संस्थान का अपने चहेते फिल्ममेकर को श्रद्धांजलि देने का.
सत्यजीत की फिल्म में अपू का किरदार निभाने वाले सुभीर रॉय सत्यजीत बाबू को आखिरी बार देखने नर्सिंग होम पहुंचे. कुछ साल के बच्चे से 44 साल के अधेड़ में बदल चुके अपू को किसी ने नहीं पहचाना.
सुभीर रे के घर के बाहर जाकर लाइन में लग गए. बाबू को आखिरी बार देखना सबसे जरूरी था. बताते हैं कि रे के मकान से लेकर मुख्य सड़क तक जो गली जाती थी वो हफ्ते भर तक लोगों के लाए फूलों से भरी रही.
रे के शरीर को 10 घंटे तक जनता के आखिरी दर्शन के लिए रखा गया था. लोग आते और जाते रहे. जब गेट बंद हुआ तब भी करीब 40,000 लोग दरवाजे के बाहर खड़े थे. अपनी मौत के बारे में सत्यजीत रे कहते थे कि वो इसकी परवाह नहीं करते.
उन्हें जब ऑस्कर मिला तो वे बिस्तर से उठने की स्थिति में नहीं थे. ट्रॉफी लेने के बाद अपने डॉक्टर से बोले, पता नहीं था कि ये इतना भारी होता है. उन्हें भारत रत्न भी मिला. रे ने सिर्फ इतनी प्रतिक्रिया दी, ‘अवॉर्ड्स का सीजन चल रहा है.’
रे अपने मरने पर किसी भी तरह के अंतिम संस्कार को मना कर गए थे. उनकी पत्नी और बेटे ने उन्हें अंतिम प्रणाम किया, 14 बंदूकों की सलामी दी गई और इसके बाद बिजली से चलने वाली भट्टी का दरवाजा बंद हो गया.
पीछे शहर खामोश खड़ा था, हाथ में तख्तियां लिए हुए, ‘महाराजा तोमाके सलाम’
अमीनेश मुखर्जी





