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*श्राद्ध : तर्पण का वैज्ञानिक विश्लेषण*

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          ~ कुमार चैतन्य

सूर्य की किरणें परा वैगनी किरणो (Ultraviolet Rays) का अक्षुण (Ever Lasting) स्रोत है। 

यदि हम मेंड़लीफ के आधुनिक आवर्त सारणी (Periodic Table) पर ध्यान दें तो पता चलेगा कि क्लोरीन, ब्रोमीन आदि गैसों वाली पंक्ती में मात्र पांच ही किरणें आती है जो अपनी परमाणविक (Atomic) विशेषता के कारण सबसे पृथक है। 

इस कालम में कोई छठी गैस या तत्त्व 

समायोजित नहीं हो सकी है, जब की हाईड्रोजन, आक्सीजन आदि भी गैसे है। 

     इन प्रत्येक गैसों का मूल रूप से जब  हाईड्रोजन पराक्साइड अर्थात पानी के सतही (Surface) परावर्तन (Reflection) के बाद काला तिल या माड़ी (Starch) से संयोग प्राप्त कर जीव द्रव्य (Ribo Nucleic Acid या Dee Ribonuclic Acid) के संपर्क में परावैगनी किरणों के साथ आती है तो कोशिकाओं का धूसर द्रव्य (Grey Matter) एवं ऊर्जा ग्रहणी (Mitochondria) दोनों की रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions) रीढ़ रज्जू (Spinal Chord) की नवो कशेरुकाओं के वाहक द्रव्य (Cerebral Liquid) को सान्द्र (Concentrated) बना देती है। परिणाम स्वरुप रक्त रोग (Blood Disease), तंत्रिका तंत्र की खामियां (Defects of central Nerves System) तथा अन्य Nuro Problems स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं।

इसीलिए कहते है कि पितरों के तिल आदि के साथ तर्पण करने से वंश तथा परिवार की अभिवृद्धि तथा रोजगार व्यवसाय आदि में भरपूर विकास होता है। 

     कुंडली में बताये गए पितृदोष का भी शमन हो जाता है। अतः पितृपक्ष में अपने पितरो का तर्पण अवश्य करें. इससे भौतिक, दैहिक एवं दैविक तीनो तापों एवं कष्टो का शमन होता है।

जन सामान्य में एक भ्रान्ति फैली हुई है कि यदि कोई अपने पिता का छोटा या मझला बेटा है तो वह तर्पण नहीं कर सकता है। यह अधिकार केवल बड़े पुत्र को ही है। यह कोरी भ्रान्ति है। आप स्वयं सोचें यदि बड़ा या मझला पुत्र नालायक अनुशासनहीन, अनाचारी या नास्तिक हो गया तो पितृदोष का निवारण कोई भी जो परिवार का सदस्य होगा तब तो नहीं करेगा ? 

     ध्यान रहे, जो भी तर्पण करेगा वह अपने भले के लिए करेगा। इससे बड़े या छोटे को कुछ नहीं लेना देना है. तर्पण एक विशुद्ध विज्ञान की प्रायोगिक प्रक्रिया (Pure Practical Science) है जिसे आयुर्वेद की रासायनिक अभिक्रिया के द्वारा प्रामाणिकता प्राप्त है।

Ramswaroop Mantri

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