सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक ऐसा मामला पहुंचा, जिसकी गूंज कानूनी गलियारों से लेकर देश की राजनीति के केंद्र तक सुनाई देने वाली है. मामला पसमांदा मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी के भीतर अलग से आरक्षण देने का है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई भी की है और केंद्र सरकार से कड़े सवाल भी पूछे हैं. सुनवाई सर्वोच्च अदालत में हो रही, लेकिन पसमांदा मुसलमानों को आरक्षण देने की इस बहस ने राजनीतिक सरगर्मी भी बढ़ा दी है, क्योंकि यह वही वर्ग है जिसमें सेंधमारी करने और इन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश बीजेपी पिछले कई सालों से लगातार कर रही है. आखिर ये इतना इंपॉर्टेंट मुद्दा क्यों है?पसमांदा मुसलमान राजनीति में एक बड़ा मुद्दा रहे हैं. बीजेपी दावा करती है कि विपक्षी दल इनका वोट तो लेते हैं, लेकिन इनके बारे में कभी बात नहीं करते. अब इन्हें आरक्षण देने का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है और सीजेआई की बेंच सुन रही है. अगर पसमांदा को आरक्षण देने का फैसला होता है तो सियासी बवाल मचना तय है.
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
याचिकाकर्ता मोहम्मद वसीम सैफी ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई है कि रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पसमांदा मुसलमानों के लिए ओबीसी कोटे के तहत 10 प्रतिशत का अलग आरक्षण तय किया जाए. वकील अंजना प्रकाश ने दलील दी कि यह वर्ग बेहद गरीब है. हालांकि, CJI सूर्य कांत की बेंच ने बिना ठोस डेटा के कोई भी आदेश देने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता की तैयारी पर सवाल उठाए. सीजेआई ने पूछा, डेटा कहां है? यह कैसे साबित होगा कि केवल पसमांदा ही मुसलमानों में एकमात्र पिछड़ा वर्ग हैं? CJI ने सीधे तौर पर पूछा, अन्य गरीब मुस्लिमों की कीमत पर आप सिर्फ पसमांदाओं को ही क्यों बढ़ावा देना चाहते हैं… कितने कुल मुस्लिम पिछड़े हैं, इस पर आपका होमवर्क कहां है? ओबीसी सिर्फ सामाजिक स्थिति नहीं, आर्थिक पहलू भी है.
आंध्र प्रदेश के 4% आरक्षण मामले से जोड़ने की मांग
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सुनवाई के दौरान वकील अंजना प्रकाश ने अनुरोध किया कि इस जनहित याचिका को आंध्र प्रदेश के मुसलमानों के आरक्षण से जुड़े एक अन्य लंबित मामले के साथ जोड़ दिया जाए. दरअसल, 2005 में आंध्र प्रदेश सरकार ने पिछड़े मुसलमानों को 4% आरक्षण दिया था, जिसे हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया था. यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के पास लंबित है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना आंकड़ों के कोटे पर बात नहीं होगी. कोर्ट के सवालों के जवाब में वरिष्ठ वकील अंजना प्रकाश ने कहा कि वह एक विस्तृत नोट दाखिल करेंगी. कोर्ट ने उन्हें तैयारी के लिए समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद तय की है.
कौन हैं पसमांदा और राजनीति के लिए क्यों हैं अहम?
- पसमांदा एक फारसी शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘पीछे छूट गए लोग’. भारत में मुस्लिम समाज मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बंटा है: अशराफ (सवर्ण या उच्च जाति), अजलाफ (पिछड़े) और अरजाल (दलित). इनमें अजलाफ और अरजाल को मिलाकर ‘पसमांदा’ कहा जाता है.
- यह मुस्लिम आबादी में एक बड़ा हिस्सा हैं. जानकारों के मुताबिक, भारत की कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा पसमांदा हैं.
- दशकों तक माना जाता था कि मुस्लिम वोट बैंक एकजुट होकर वोट करता है. लेकिन अब राजनीतिक दलों को समझ आ गया है कि बहुसंख्यक होने के बावजूद पसमांदा समुदाय राजनीतिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर हैं.
बीजेपी वर्षों से कर रही पसमांदा समुदाय को साधने की कोशिश
बीजेपी ने इस सियासी हकीकत को बखूबी समझा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठकों में कार्यकर्ताओं से पसमांदा और बोहरा मुसलमानों तक पहुंचने को कह चुके हैं. बीजेपी की रणनीति विपक्षी दलों के एकमुश्त मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की है.
पार्टी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उज्ज्वला योजना, पीएम आवास और मुफ्त राशन जैसी गरीब कल्याण योजनाओं का सबसे ज्यादा फायदा पसमांदा मुसलमानों को मिला है. ऐसे में अगर पसमांदा मुसलमानों को अलग से ओबीसी आरक्षण मिलता है, तो यह देश की सियासत, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में बड़ा उलटफेर कर सकता है.






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