*इंदौर का असली स्वाद कहाँ गुम हो गया*
–अभिषेक मिश्रा–
_इंदौर, जिसे देश की स्वाद नगरी कहा जाता है, जहाँ गलियों में उठती गरमागरम कचौरी की खुशबू, पोहे-जलेबी की सोंधी महक और रात में सराफा का जगमगाता नज़ारा कभी एक जीवंत अनुभव हुआ करता था। लेकिन आज यह शहर एक अजीब दौर से गुजर रहा है। बोर्ड बड़े हो गए हैं, दुकानों पर LED की चमक बढ़ गई है, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर वीडियो वायरल हो रहे हैं, मगर प्लेट में परोसा जाने वाला असली स्वाद धीरे-धीरे नकलीपन और दिखावे में कहीं खो गया है।_
_पहले किसी दुकान की पहचान मुँह से मुँह तक होने वाली तारीफ़ से बनती थी। अब पहचान का पैमाना बदल गया है..कौन सबसे आकर्षक वीडियो बनवा रहा है, किसने बड़े इन्फ्लुएंसर को बुलाया, और किसकी LED लाइट्स सबसे चमकीली हैं। छप्पन दुकान और सराफा के कई स्टॉल आज इसी दिखावे पर टिके हैं। किसी दुकान पर भीड़ देखकर लगता है कि यहाँ कुछ खास मिल रहा होगा, लेकिन अक्सर भीड़ का कारण होता है रील्स की वायरलिटी, न कि व्यंजन का असली स्वाद। लोग अब वहाँ सिर्फ खाने नहीं, बल्कि मोबाइल में तस्वीरें खींचने और “मैं वहाँ गया था” कहने के लिए भी जाते हैं। यानी स्वाद की जगह अब FOMO (Fear of Missing Out) ने ले ली है।_
मिलावट का कड़वा सच
_इंदौर के खानपान पर मिलावट का ज़हर लगातार बढ़ रहा है। त्योहारों के मौसम में तो नकली खाद्य सामग्री की बरामदगी अब साधारण खबर बन गई है। इसका मतलब यह है कि आम दिनों में ये मिलावटी सामान बिना रोक-टोक बिक रहा है। बड़े-बड़े बोर्ड पर “100% शुद्धता” लिखने वाले कई दुकानदारों की असलियत, स्वास्थ्य विभाग की छापेमारी में बार-बार उजागर हो चुकी है। विडंबना यह है कि ऐसे मामलों के सामने आने के बाद भी इन दुकानों पर भीड़ में कोई कमी नहीं होती। लोगों के भरोसे की थाली में आजकल ब्रांड का नाम ही सबसे बड़ा मसाला बन गया है।_
विरासत बनाम कॉर्पोरेट चमक
_इंदौर का असली स्वाद कभी छोटे-छोटे मोहल्लों और पुरानी रेसिपी वाली दुकानों से आता था। जहाँ खाने में सिर्फ मसाले नहीं, बल्कि दिल और लगाव भी घुला होता था। लेकिन अब ये छोटी दुकानें, कॉर्पोरेट फूड चेन और हाई-फाई ब्रांड्स के सामने टिक नहीं पा रहीं। बड़ी कंपनियाँ मार्केटिंग पर लाखों रुपए खर्च करती हैं, जबकि पुरानी दुकानें सिर्फ गुणवत्ता और भरोसे के सहारे चलती हैं। नतीजा यह कि कई असली दुकानदार धीरे-धीरे अपना ठेला समेटने को मजबूर हो रहे हैं। और इसके साथ ही शहर की खानपान विरासत भी मिटती जा रही है।_
स्वाद से ज्यादा भरोसा जरूरी
_इंदौर का स्वाद सिर्फ खाने का सुख नहीं है, यह शहर की आत्मा और संस्कृति का हिस्सा है। अगर यह स्वाद नकली घी, मिलावटी मावा और सोशल मीडिया की ब्रांडिंग में दब गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ इसे सिर्फ कहानियों में ही जान पाएंगी। इसलिए जरूरी है कि, ग्राहक गुणवत्ता की माँग करें, दुकानदार ईमानदारी से स्वाद परोसें और प्रशासन भेदभाव रहित कार्रवाई करे। तभी इंदौर का असली स्वाद फिर से दुनिया की जीभ पर वह मिट्टी की खुशबू और असलीपन छोड़ पाएगा, जिसके लिए यह शहर हमेशा जाना और पहचाना जाता रहा है।




