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*लघुकथा: कर्म, घमंड और इशारा*

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   विवेक मेहता

वे मंदिर में भगवान राम की मूर्ति के सामने नतमस्तक हुए और बोले, “तेरी माया तो अपरंपार है प्रभु! दिखा दिया न तूने, जो जैसा करता है, वैसा भरता है। पहले उन्होंने तुम्हें छोटा बच्चा बताकर और खुद को महान व बड़ा जताते हुए कहा कि ‘राम को हम लाए हैं!’ अरे, तुम्हें कौन ला सकता है? इस संसार में तो सबको तुम ही लाए हो प्रभु। आपके चेहरे की यह मुस्कान बता रही है कि आपने उनका घमंड नहीं रहने दिया। बेचारे सरकार बनाने के जुगाड़ में लग गए, मगर आपका इशारा फिर भी नहीं समझे।

फिर प्रभु, उन्होंने तुम्हारी ही अमानत में खयानत की—न जाने कब से कर रहे होंगे! जब पाप का घड़ा भर गया तो चोरी सामने आ ही गई। लेकिन उन्होंने सत्ता के दंभ में लीपा-पोती कर दी। सोचा, जैसे जनता को बहला लेते हैं, वैसे ही प्रभु को भी समझा देंगे। मगर प्रभु, आप तो सर्वव्यापी हैं, सर्वज्ञात हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं… ऐसे ही थोड़ी छोड़ देंगे! आप जब खुद राज चलाते थे, तब एक धोबी की शंकाओं और आरोपों तक पर ध्यान देते थे। और ये? आपके नाम पर ‘राम-राज्य’ चलाने का दावा तो करते हैं, पर घमंड में चूर रहते हैं! आपने फिर से इन्हें झटका दिया है प्रभु। अब ये समझेंगे या नहीं, यह तो आप ही जानें…”

…और वे फिर से मूर्ति के आगे नतमस्तक हो गए।

तभी पीछे टीवी से आवाज़ आई—“युवाओं के दबाव में शिक्षा मंत्री ने दिया इस्तीफा!”

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प्रगति नगर नीमच मप्र 

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