-तेजपाल सिंह ‘तेज’
आज का डिजिटल युग सूचनाओं की अधिकता का युग है, परंतु विडंबना यह है कि यह अधिकता सत्य को स्पष्ट करने के बजाय उसे धुँधला कर रही है। आधे-अधूरे तथ्य, चयनित उद्धरण और भावनात्मक उभार—इन सबके बीच ठहरकर, शांति से सुनने और सोचने का स्थान लगभग समाप्त हो चुका है। ऐसे समय में कुछ प्रयास ऐसे भी हैं जो शोर के विरुद्ध संवाद की एक शांत जगह बनाने की कोशिश करते हैं।
इसी संदर्भ में “Should आर एस एस Be Banned?” शीर्षक से प्रस्तुत बातचीत—जिसमें कुनाल कामरा ( Kunal Kamra ) और शम्सुल इस्लाम (Shamsul Islam) शामिल हैं—एक ऐतिहासिक और वैचारिक बहस को सामने लाती है। यह चर्चा मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस ) की सौ वर्षों की यात्रा, उसके वैचारिक स्रोतों और सामाजिक प्रभावों की आलोचनात्मक जांच के लिए है।
आर एस एस के सौ वर्ष : एक ऐतिहासिक प्रश्न:
आर एस एस लगभग सौ वर्ष का हो चुका है। किसी भी संगठन का इतने लंबे समय तक बने रहना अपने-आप में प्रश्न खड़ा करता है—क्या यह उसकी सामाजिक स्वीकार्यता का प्रमाण है या फिर ऐतिहासिक परिस्थितियों की देन? यह संगठन जिस काल में उभरा, वह औपनिवेशिक भारत का समय था, जब राष्ट्र, पहचान और समुदाय की परिभाषाएँ संघर्ष के दौर से गुजर रही थीं। आर एस एस के उद्देश्य और उसके गठन के पीछे के विचारों को समझने के लिए उसके अपने दस्तावेजों, वक्तव्यों और प्रकाशनों को देखना आवश्यक है—न कि केवल समर्थकों या विरोधियों के आरोपों को।
संस्थापक विचार और प्रारंभिक वैचारिकी :
आर एस एस के संस्थापक के. बी. हेडगेवार (K. B. Hedgewar) का राजनीतिक और वैचारिक सफर जटिल रहा। वे एक समय कांग्रेस से जुड़े रहे, खिलाफत आंदोलन के दौर में सक्रिय थे, और बाद में हिंदू–मुस्लिम एकता की राजनीति से असहमति के कारण अलग राह पर चले। आर एस एस की स्थापना के पीछे यह धारणा दिखाई देती है कि भारत को एक हिंदू राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए। यही बिंदु आगे चलकर संगठन की वैचारिक रीढ़ बना।
‘आंतरिक शत्रु’ की अवधारणा:
आर एस एस के दूसरे प्रमुख विचारक M. S. Golwalkar की पुस्तक Bunch of Thoughts में “आंतरिक खतरे” की अवधारणा सामने आती है। इसमें मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को राष्ट्र के लिए खतरे के रूप में चिन्हित किया गया। यह दृष्टिकोण केवल राजनीतिक असहमति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक विभाजन को वैचारिक आधार प्रदान करता है। आलोचकों के अनुसार, यह विचारधारा नागरिकता को समान अधिकारों की बजाय सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान से जोड़ती है।
हिंदुत्व और नागरिकता की परिभाषा:
1923 में विनायक दामोदर सावरकर Vinayak Damodar Savarkar द्वारा प्रतिपादित हिंदुत्व की अवधारणा में “पितृभूमि” और “पुण्यभूमि” को नागरिकता की कसौटी बनाया गया। इस तर्क के अनुसार, जो समुदाय अपनी पवित्र भूमि भारत के बाहर मानते हैं, वे सांस्कृतिक रूप से ‘विदेशी’ ठहरते हैं। यही विचार आगे चलकर अल्पसंख्यकों की देशभक्ति पर संदेह का आधार बनता है।
संविधान बनाम मनुस्मृति :
स्वतंत्र भारत के संविधान को जब 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया, तब आर एस एस से जुड़े प्रकाशनों में उसकी आलोचना की गई। इसके विपरीत, मनुस्मृति जैसे ग्रंथों को भारतीय समाज का आधार” बताने की प्रवृत्ति सामने आई। यह टकराव केवल ग्रंथों का नहीं, बल्कि दो दृष्टियों का है—एक ओर समान नागरिक अधिकार, दूसरी ओर जन्म आधारित सामाजिक व्यवस्था। यहीं पर बी आर अम्बेडकर (B. R. Ambedkar) का संघर्ष निर्णायक बनता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जाति-आधारित व्यवस्था लोकतंत्र और मानवाधिकारों के विपरीत है।
जाति, स्त्री और सामाजिक नियंत्रण :
आर एस एस से जुड़ी वैचारिक परंपरा में जाति और स्त्री की भूमिका को लेकर गंभीर प्रश्न उठते हैं। मनुस्मृति और उससे प्रेरित साहित्य में शूद्रों और महिलाओं के लिए अधीनता को “धर्म” के रूप में प्रस्तुत किया गया। आलोचकों का तर्क है कि जब ऐसे ग्रंथों को सांस्कृतिक आदर्श के रूप में बढ़ावा मिलता है, तो समानता, स्वतंत्रता और गरिमा जैसे आधुनिक संवैधानिक मूल्य कमजोर पड़ते हैं।
स्वतंत्रता संग्राम और आर एस एस
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आर एस एस की भूमिका पर भी बहस होती रही है। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से संगठन की दूरी को लेकर ऐतिहासिक तथ्य उपलब्ध हैं। इसके विपरीत, Mahatma Gandhi के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन समावेशी राष्ट्रवाद की बात करता था—जहाँ धर्म नहीं, बल्कि नागरिक समानता केंद्र में थी।
राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र की कल्पना:
14 अगस्त 1947 को प्रकाशित आर एस एस से जुड़े एक संपादकीय में तिरंगे की आलोचना की गई। यह घटना राष्ट्र-कल्पना के अंतर को उजागर करती है—एक ओर आधुनिक, बहुलतावादी भारत; दूसरी ओर सांस्कृतिक एकरूपता पर आधारित राष्ट्र।
सारांशत: आर एस एस पर होने वाली बहस केवल एक संगठन तक सीमित नहीं है। यह बहस उस प्रश्न से जुड़ी है कि भारत किस प्रकार का राष्ट्र बनना चाहता है—क्या वह संविधान द्वारा सुनिश्चित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का राष्ट्र होगा? या फिर वह ऐसा राष्ट्र बनेगा जहाँ नागरिकता, अधिकार और सम्मान जन्म, धर्म और जाति से तय होंगे? इस विमर्श का उद्देश्य किसी को चुप कराना या प्रतिबंध की माँग करना नहीं, बल्कि दस्तावेज़ों, इतिहास और विचारों के आधार पर प्रश्न पूछना है। लोकतंत्र की शक्ति प्रश्नों में है—और जब तक ये प्रश्न खुले रहेंगे, तब तक लोकतंत्र की साँसें भी चलती रहेंगी। (https://youtu.be/vk72_d4tfF0?si=pJAt-oSJ2sS-UAvv)





