डॉ. नेहा, दिल्ली
वर्षों पूर्व इंडिया इंटरनेशनल सेन्टर ,दिल्ली में एक राष्ट्रीय सेमिनार हुआ था। वहां मैं भी थी। विषय भी था। अनेक विचारक भी थे।
मैं श्रोता थी। इसलिए मुँह बंद कर बैठी हुई थी. सभी विचारक विश्व के ‘कन्फ्यूज़्ड मन’ पर अपने-अपने विचार रख रहे थे।
मैंने देखा कि ज्यादातर कह रहे थे कि अमुक विचारधारा पर चलकर ही विश्व मन की मानसिक-यात्रा विकसित हो सकती है! विचारक किसी विचारक की कही बातों को ही बार-बार RPT कर रहे थे। जोर-जोर से बोल रहे थे. लगातार बेशुमार बोल रहे थे.
उन विचारकों की भीड़ में एक सिद्ध पुरुष भी बैठे हुए थे : डॉ मानवश्री। वे भी सब कुछ चुपचाप सुन रहे थे. अपनी बारी का इंतजार भी कर रहे थे|। उन्हें बोलने के लिए अभी तआमंत्रित नहीं किया गया था।
वे लगातार अपनी नाक को छू-छूकर विचारकों की भीड़ से होने वाली अपनी असहजता को प्रकट कर रहे थे। उन्हें भारत में बहुत कम लोग जानते थे, क्योंकि उन्होंने अपने जन्म को ‘विज्ञापन’ नहीं माना था. उन्हें सबसे अंत में केवल दो शब्द बोलने के लिए आमंत्रित किया गया.
जैसे ही उनका नाम पुकारा गया।वे उठ खड़े हुए और बोले-
“आप सभी पिछले 2 घण्टे से विचारकों की कही बातें ही बोल रहे है। पर मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि आप अपनी बात कब रखेंगे? हमारे महान पूर्वज विचारकों ने जो कहा था ,वो बिल्कुल ठीक कहा था पर आप भी तो कुछ बोलो. आपको भी तो अपने पूर्वजों की तरह मौलिक विचार प्रकट करने चाहिए. आप भी तो कुछ कहो ? पिछले दो घटों से मैं केवल पूर्वजों को सुन रहा हूँ. आपको कब सुनूंगा?
इस पर वहां सन्नाटा छा गया। फिर धीरे से उन सन्नाटों में आवाजों की सरसराहट सुनाई दी। अब मकड़ी के जालों से भरी आवाजें सुनाई देने लगी थी।
वे विचारक कहने लगे-
“आप ये कैसे कह सकते हैं कि हम बोल नहीं रहे हैं. पिछले दो घटों से हम अपने महान पूर्वजों पर ही तो बोल रहे हैं.”
इसपर सिद्ध पुरुष फिर एक बार बोले-
“पर मैं आपको सुनना चाहता हूं. पिछले दो घण्टों से आप में से कोई भी अपनी बात नहीं बोला है. आप खुद क्यों नहीं बोलते. मैं आपको सुनने आया हूँ.”
मैंने देखा। वे आत्मपुरुष चकित होकर सबको देख रहे थे। मैंने यह भी देखा कि मनुष्य का अपाहिज मन किस तरह अतीत की कब्र में कैदी बना हुआ है.
वे सिद्ध पुरुष तुरन्त स्टेज छोड़कर नीचे उतर गये और तेज कदमों से चलते हुए हॉल से बाहर निकल गये.
मैं कौतूहल-वश उठी. उनके पीछे-पीछे लगभग दौड़ने लगी।अचानक उन्होंने पीछे मुड़कर मुझे देखा. वे रुक गये. बोले-
“मेरा पीछा क्यों कर रही हो?”
“जी मैं पीछा नहीं कर रही हूँ. आपके साथ-साथ चलना चाहती हूं.”
मेरी आँखें भीग गयी थी!
“मतलब?” सिद्धपुरुष अब सचमुच अपने भीतर रुक गए थे.
“जी, मैं भी बोलना चाहती हूँ. खुद को पाना, जीना चाहती हूँ.” भर आयी आंखों से मैं बोली थी।
उन्होंने कसकर मुझे सीने से लगा लिया। फिर मेरे सिर पर हाथ रखकर बोले-
“अपना बोलना, अपना जीना सीखो. खुद में खुदा तक मिलता है। कायनात का पत्ता-पत्ता ताजे शब्द, मौलिक सांसें लेना चाहता है। अगर पास्ट के बासी फूलों से जीवन का श्रृंगार होता तो कृष्ण, बुद्ध, महावीर सभी को अपना अनुभव नहीं पैदा करना पड़ता. तुम्हारा नाम क्या है?”
“नेहा, डॉ. नेहा.”
” नेहा, मनुष्य को कान पकड़कर कर नहीं बल्कि कान खोलकर सुनना चाहिए. सुनाने वाले का अपना कुछ नहीं है तो उसे कचरा समझ लेना चाहिए. अपना कुछ नहीं है, बंजर हो तो मेरी ऊर्जा से उर्वर बनकर पैदा करना. लेकिन तुम बंजर नहीं हो, मेरे समान हो. मुझे खुद में उतारकर देखोगी तो यह सच दिख जाएगा. मेरा आशीर्वाद हमेशा अब तुम्हारे साथ रहेगा.”
“… तो क्या सेक्स !”
” नहीं. स्त्री ‘प्रकृति’ है. स्त्री-योनि ईश्वर निर्मित जीवंत मंदिर है. इसे ‘भग’ कहते हैं. इसे धारण करने वाली भग’वती होती है. भग को साधकर समर्थ पुरुष भगवान तक को पा लेता है.
स्त्री बदचलन बनकर योनि-मंदिर को बर्वाद क्यों करती हैं? तृप्त होने के लिए या धन के लिए. कम्प्लीट तृप्ति हमारा मिशन देता है और स्त्री की आर्थिक मज़बूरी भी खत्म करता है.
मैं दुराचारी नहीं हुँ. स्वदेशी-विदेशी गर्ल्स-फीमेल्स रोज मेरी सेवा ले रही हैं. चाहूं तो हर रात नहीं, हर घंटे एक गर्ल मेरे बेड पर मिले.”
“और अगर मैं खुद चाहूं तो.. मीन्स मैं खुद आपकी सेक्स ऊर्जा….”
“फिजिकल सेक्स से जो भी मिल सकता है, मैक्सिमम : उससे भी ज्यादा लो. ऐम आम है, गुठली नहीं ना? हाँ, अगर तुमको नहीं मिला सबकुछ ; तो फिजिकल भी पॉसिबल. मेरा ऐम तुम्हारी पूर्णता है, इसलिए.”
आत्म-पुरुष अपने वजूद पर कभी शर्मिंदा नहीं होते. जो खुद के वजूद पर शर्मिंदा नहीं होते, वो दूसरों के वजूद को भी कभी शर्मिंदा नहीं करते.
एक पुरानी कहावत है कि जब किसी से मिलकर आपको लगे कि वो व्यक्ति तो आपसे बड़ा है और आप बहुत छोटे हैं तो ऐसे व्यक्ति का साथ तुरन्त छोड़ देना चाहिए. जब आपको किसी से मिलकर यह लगे कि आप भी बड़े हैं और अच्छे इंसान हैं तो उस व्यक्ति का साथ मरते दम तक नहीं छोड़ना.
ऐसा तभी होता है ,जब शब्द की शव-यात्रा में हमारा ‘शब्द-पुरुष’ शामिल नहीं होता. अंतिम संस्कार देह का होता है,आत्मा का नहीं.|महा-रहस्यों से भरे इस विराट अस्तित्व का वास्तविक मनुष्य कभी भी अंतिम संस्कार नहीं कर सकता.
क्योंकि, शब्द ही अंतरिक्ष की महा-कोशिका है. हम सभी अस्तित्व के अंतरिक्ष में इस महा-शब्द का अगले नवीन संस्करण हैं.

