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*ग्वालियर में भी बनाया जाता था कभी-नमक*

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         राम विद्रोही 

यह जानकर हैरानी हो सकती है कि ग्वालियर में एक दौर ऐसा भी था जब यहां के लोग नमक भी बनाया करते थे। रियासती दौर में देसी या विदेशी किसी का भी शासन ग्वालियर पर रहा हो पर ग्वालियर से दस-बारह किलो मीटर दूर कस्बा आंतरी का हमेशा ही रूतवा रहा है। सिंधिया शासन काल तक आंतरी जिला हुआ करता था। आंतरी में जिला कार्यालय भवन जिसे पहले सूबा कहा जाता था आज भी वहां मौजूद है। आजकल इस भवन में सरकारी दफ्तर हैं।

ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार के समय सन 1835 ई. में कर्नल स्लीमन ने ग्वालियर का भ्रमण किया था। इस यात्रा का वर्णन उसने अपनी पुस्तक-रेम्बल्स एण्ड रिक्लेशंस में किया है। इसमें स्लीमन लिखता है कि ग्वालियर शहर से कुछ ही दूर स्थित आंतरी नगर की मिट्टी में नमक की पर्याप्त मात्रा मिलती है। अधिक नमक युक्त भूमि आंतरी नगर से कुछ दूरी पर खोदी जाती है जिसे चाहर दीवारी के बाहर बने हुए गड्ढों में भरा जाता है इसके पश्चात उसमें बारी बारी से पानी भरा जाता है। वह पानी मिट्टी में से बह कर नीचे एक नाली में से होता हुआ कुछ दूरी पर बनाए गए गड्ढों में जमा होता है। वहां से उसे बाल्टियों के द्वारा बाहर निकाला जाता है और सूर्य की धूप में तब तक रखा जाता है जब तक उसका पानी सूख नहीं जाता। पानी सूख जाने के बाद उसमें नमक शेष रह जाता है।

ग्वालियर के बहुत से घरेलु उद्योग विपरीत परिस्थितियों के कारण लुप्त होते चले गए। आंतरी कस्बा नमक के अलावा भी और कई घरेलु उद्योगों के लिए भी प्रसिद्ध रहा है। एक समय यहां हाथ से कागज भी बनाया जाता था। जिसे सिंधिया सरकार खरीदती थी। हाथ से कागज बनाने के कुछ अवशेष अभी भी आंतरी कस्बे में मौजूद हैं। सिंधिया रियासत काल में ही मुरार के पास कागज बनाने का कारखाना लगाया गया। जो पुतलीघर के नाम से प्रसिद्ध था। आजकल यह मर्सीहोम के नाम से जाना जाता। यह कारखाना भी अधिक दिनों तक नहीं चल सका क्यों कि विदेशों से कागज आने लगा था। सिंधिया सरकार द्वारा हेंडमेड कागज खरीदना बंद कर देने से यहां हाथ से कागज बनाने का उद्योग भी बंद हो गया क्यों कि इस कागज का सरकार के अलावा खरीदार कोई और नहीं था। कागज का उद्योग बंद होने से आंतरी के लोगों के सामने आर्थिक संकट तो जरूर आ गया पर यहां के पुरूषार्थी समाज ने जीवन यापन के दूसरे साधन खोजना शुरू कर दिए। कुछ समय बाद ही आंतरी के लोगों ने पान की खेती शरू की और कुछ ही दिनों में यहां पान की खेती खूब पनपने लगी। देश भर में आंतरी का पान मशहूर हो गया। इसे देख कर आंतरी के पास ही विलौआ गांव में भी पान की खेती शरू की गई और ग्वालियर का पान आंतरी-विलौआ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। धीरे धीरे पान खाने का चलन कम होने और मौसम चक्र में परिवर्तन के कारण पान की खेती भी कम होती चली गई।

पान की खेती के साथ ही आंतरी में खराद मशीनों से बैल गाडी के लकडी के पहिए बनाए जाने लगे। इस की मांग बढती जाने के कारण जल्दी ही आंतरी का यह घरेलु उद्योग देश भर में प्रसिद्ध हो गया। घर-घर में खराद की मशनें लगी हुई थीं। कुछ सालों में ही आंतरी बैलगाडी के पहिओं की राष्ट्रीय मंडी बन गया। पान की तरह बैल गाडी के पहिए भी देश में दूर दूर तक जाते थे। चार दशक पहले तक आंतरी में बडे स्तर पर बैलगाडी के पहिए बनाए जाते रहे हैं। समय तेजी से बदला, माल ढुलाई में बैल गाडी और रेहडी का इस्तेमाल होना कम होता चला गया। इसमें एक बडी भूमिका ट्रेक्टर ट्राली और आटो वाहनों की भी रही है। शहरी आबादी के विस्तार ने भी इसका उपयोग कम करना शुरू कर दिया। दूसरे रेहडी और बैलगाडियों में लकडी के पहियों की जगह ट्रक, ट्रेक्टर और अन्य वाहनों के टायरों ने ले लिया। इससे आंतरी का यह घरेलु उद्योग भी दम तोड गया। यहां आंशिक रूप में अभी भी पान की खेती होती है। शहरी विस्तार और सुविधाओं में विस्तार के कारण आंतरी की पहचान अब किसी भी घरेलु उद्योग के नाम पर नहीं बची है।

लेकिन आंतरी की एक और ऐतिहासिक पहचान है जो हमेशा बनी रहेगी। मुगल काल में दक्षिण पथ आंतरी, हरसी, नरवर और चंदेरी होते हुए जाता था। जिला होने के कारण उस समय आंतरी बहुत महत्वपूर्ण स्थान माना जाता था। मुगल सम्राट अकबर का इतिहासकार अबुल फजल ग्वालियर सरकार का सूबेदार हुआ करता था। दक्षिण विजय से लौटते हुए अबुफजल ने रात्रि में विश्राम आंतरी में किया था। उसी समय वीर सिंह बुंदेला ने मुगल शहजादे सलीम के कहने पर आंतरी में अबुफजल की हत्या करके उसका सिर सलीम के पास लेकर गया था। शहजादा सलीम उससमय इलाहाबाद सरकार का सूबेदार हुआ करता था। आंतरी में अबुल फजल की मजार आज भी सही हालत में बनी हुई है।

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