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सोनपुर का पशु मेला ….समय बदला तो मेले की तस्वीर भी बदल गयी

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राहुल

सोनपुर, बिहार। बिहार का सोनपुर मेला एक दौर पर पूरे एशिया में प्रसिद्ध था। देश क्या उससे बाहर के लोग इस मेले में हिस्सा लेने के लिए आते थे। लेकिन समय बदला तो मेले की तस्वीर भी बदल गयी। अब न पशुओं की वैसी जरूरत रही और न ही उसके चाहने वाले। लेकिन ऐसा नहीं है कि इसमें भागीदारी कम हो गयी है। वह आज भी अपने शबाब पर है। लेकिन समय के साथ इस मेले की पहचान बदल गयी है। अब यह पशुओं नहीं बल्कि नर्तकियों और सरकारी पंडालों के लिए जाना जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो पशुओं की जगह लोगों के लिए अब यह ‘मनोरंजन का मेला’ साबित हो रहा है।

सुपौल के मैथिली लेखक प्रवीण झा इसको कुछ इस तरह से पेश करते हैं, “सोनपुर मेला जो कभी एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला हुआ करता था, पहचान के तौर पर अब यह नर्तकियों और सरकारी पंडालों का मेला बन कर रह चुका है। हां पशुओं के नाम पर देश के सबसे बड़े घोड़ों का बाजार ज़रूर यहां लगता है। पहले भी इस मेले में आने वाले दूर-दराज के दर्शकों के लिए रात में मनोरंजन के लिए गीत और संगीत का कार्यक्रम होता था। अब इसका स्थान थियेटर ने ले लिया है और अब तो थियेटर इस मेले की पहचान हो गई है। वहीं कई राज्यों के घोड़ों के व्यापारी वहां मिले। खरीदार भी अलग-अलग राज्यों से आए थे। यहां हर नस्ल के घोड़े आसानी से और कम कीमत में उपलब्ध हैं। बाकी सरकारी पंडाल और नौटंकी ही एशिया के सबसे बड़े पशु मेले की पहचान रह गई है।”

sonpur

विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला इन दिनों पूरे शबाब पर है। एशिया का सबसे बड़ा सोनपुर पशु मेले में प्रतिदिन हजारों लोग पहुंच रहे हैं। एक तरफ जहां कार्यक्रमों की धूम है तो दूसरी तरफ व्यवसायी अपने सामान बेचने में व्यस्त हैं। इन सबके बीच यहां पशु मेला कितना बचा है? इस सवाल का जवाब आपको यहां लगे सरकारी पंडाल और थिएटर देख कर पता चल सकता है। 

लड़के आते हैं किसान नहीं

“पशु मेला यह शब्द किसानों को खींचता है युवाओं को नहीं। लेकिन पूरे मेले में आपको चलने की जगह नहीं मिलेगी। लेकिन यह भीड़ युवाओं की है। गाय, घोड़ा, भैंस बकरी के अलावा 5-7 थिएटर और सरकारी पंडालों से भरी पड़ी जगह मिलेगी। जहां कई खाने की चीजें मिल रही हैं। झूला मेले की खूबसूरती को चार चांद लगा रहा है।” सोनपुर के स्थानीय निवासी 37 वर्षीय सत्यम कुमार बताते हैं।

घोड़ों की मेले में भागीदारी और उसकी दूसरे मेलों से तुलना करने पर एक नई तस्वीर उभरती है। यह अपने किस्म के विरोधाभास को पैदा करता है।  पटना से मेला देखने आए युवा पत्रकार पल्लव इसको कुछ यूं जाहिर करते हैं, ”दूसरे मेलों में व्यवस्था बेहतर होती है और आयोजन खूब होते हैं। सोनपुर में न के बराबर आयोजन होते हैं। घोड़ों के लिहाज से। घोड़ों का सबसे अच्छा मेला महाराष्ट्र में संगाखेड़ा का माना जाता है। मगर वहां भी इतने घोड़े नहीं आते जितने सोनपुर में आते हैं।”

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नये दौर ने इस मेले को लेकर नई समस्याएं भी पैदा की हैं। जिसमें कहीं कानून सामने आता है तो कहीं सभ्यता और विकास का दौर रोड़ा बन जाता है। वेब पोर्टल पत्रकार विमलेंदु का कहना है कि “सरकार ने कई तरह के पशु -पक्षियों की खरीद बिक्री पर रोक लगा दी है। इसलिए अब हाथी नहीं आते…घोड़े भी अब लगभग शौकीन लोगों के लिए रह गये हैं। अतिक्रमण के बाद भी मेला क्षेत्र लगभग 88 एकड़ में फैला है। सरकार इसकी नीलामी करती है।”

सांस्कृतिक आयोजन के नाम पर भौंड़ा प्रदर्शन

“सोनपुर मेला एक बड़ा सांस्कृतिक आयोजन भी रहा है। जमींदारी के दौर में थियेटर, नाच मंडली, बाई जी की महफिल, अमीर खुसरो के सुफियाना कौव्वालियों और कबीरा खड़ा बज़ार में की तर्ज पर खजड़ी से लेकर कबीरपंथी भी मौजूद रहते थे। यह जादुई आकर्षण मेले को दिन-रात गुलजार रखता था। भिखारी ठाकुर के हसीन लौंडों की लुभावनी अदाएं होतीं। कम आय और कथित निचली जाति वालों का सांस्कृतिक आयोजन भी होता था। 

उस आयोजन में जमींदारी प्रथा और उससे उत्पन्न पलायन के साथ स्त्री-उत्पीड़न को अंगुली दिखाना भी शामिल था। अब इसका रूप थिएटर ने ले लिया है। लोगों का अब टेस्ट बदल गया है। थियेटर कातिल जवानी का कारोबार बन कर रह गया है। इस अंतर को इस बात से समझा जा सकता है कि तब, गवनहारियों के शो देखने के लिए छप्पनछुरी, चुलबुली बाई, सोनचिरैया जैसे नामकरण कर उनका प्रचार किया जाता था। अब हॉट डांसरों का नाम सन्नी लियोन, कैटरीना कैफ हो चला है।” स्थानीय पत्रकार अजय कुमार बताते हैं।

संकट मेले को हर तरीके से घेरता जा रहा है। वह जमीन के हिसाब से क्षेत्र के कम होने का मामला हो या फिर पशुओं की जरूरत। मेले में वह संकट खुल कर देखा जा सकता है। अजय कुमार आगे बताते है, “तोप-बंदूक नहीं थे। तब सैन्य-अभियानों की आन-बान-शान हाथी-घोड़ा हुआ करते थे। हाथी-घोड़े की रौनक सोनपुर मेले की धुरी हुआ करती थी। घोड़ों के लिए सोनपुर मेला एशिया भर में प्रसिद्ध था। अब घोड़ों-हाथियों की वैसी उपयोगिता नहीं रह गयी है तो अब उस मेले का क्या हाल है। दूर-दूर से व्यापारी यहां आते नहीं हैं। मेला मैदान भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। उसका स्थानीय लोगों के द्वारा अतिक्रमण किया जा रहा है। जो जगह बची हुई है वहां पर सरकारी पंडाल लगाया जा रहा है। सरकारी प्रदर्शनी पशु-प्रदर्शनी पर हावी है।” 

हरिहर क्षेत्र का सोनपुर मेला

सोनपुर के स्थानीय निवासी बल्लव राय इसको कुछ और ज्यादा खोल कर रखते हैं, ”पहले यहां हाथियों की ख़रीद-फ़रोख़्त की बात भी कही जाती थी। अब बालाओं और लड़कियों की की जाती है। दोनों ही गैरकानूनी है। यूं तो पंछियों का व्यापार भारत में गैर कानूनी है। लेकिन सोनपुर मेले में यह धड़ल्ले से चलता हुआ देखा जा सकता है। सोनपुर मेले में घोड़ों की मांग हमेशा रहती है। 10 से अधिक क़िस्म के बाजे बिकते नजर आएंगे। यही हरिहर क्षेत्र का सोनपुर मेला की तस्वीर है।”

Ramswaroop Mantri

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