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कहानी : गुलछर्रे

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      ~> पूजा ‘पूजा’

“माँ!  मैं यहाँ गुलछर्रे उड़ाने के लिए  नहीं छोड़ के गया था.”

जितिन आग बबूला हो कर बोला.

     लगभग माँ की उम्र के ही एक पुरुष को अपनी माँ के बाल बनाते देख जितिन के गुस्से की सीमा पार हो गई.

     ~”गुलछर्रे? यह क्या कह रहे हो जितिन?” उसकी माँ आश्चर्य से बोलीं.

आज पाँच वर्षों बाद अपने बेटे को देख कर भी लीला जी खुश नहीं हो पा रहीं थीं. आखिर उस ने बात ही ऐसी कह दी थी.

  ~”इतने साल बीत गए, तुम ने कभी मेरी सुध ली.” 

  बहुत दुखी’ मन से वह बोलीं :

“चार या छः महीने में एक फ़ोन कर लिया बस. कभी सोचा मैं कैसी हूँ यहाँ?”

  ~”सोचना क्या? मैं आपको सबसे अच्छे वृद्ध आश्रम में रख कर गया था. अच्छी खासी रकम भर रहा हूँ इसके लिए.”

  जितिन सफाई देता हुआ आगे बोला : “यह सब बहस मत करिए माँ. तहसील जाना है. आप तैयार हो जाओ. मैं मैनेजर से मिल कर आता हूँ.”

“वर्मा जी यहाँ यह सब क्या चल रहा है? आप तो कहा करते थे बहुत ध्यान रखा जाता है. तभी आश्रम की जगह कुटुंब शब्द प्रयोग किया गया है.”    

   जितिन ने सवाल करते हुए मैनेजर के ऑफिस में प्रवेश किया.

   ~”आइए आइए जितिन जी! कब आये अमरीका से, और हम से क्या कमी रह गई जो इतनी शिकायत.”

  ~”वह आदमी कौन है माँ के साथ?”

~”अरे वह रामलाल जी हैं. बिचारे वक़्त के मारे हैं. सात वर्ष पहले उन का इकलौता बेटा दोनों पति पत्नी को यहाँ छोड़ कर आस्ट्रेलिया चला गया था.”    

    मैनेजर आगे बोला : “अभी तीन वर्ष पहले उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया. बेटा आ भी नही सका. उसके कुछ दिनों बाद रामलाल जी अजीब बर्ताव करने लगे. कभी अतीत में चले जाते हैं, कभी बच्चा बन जाते हैं. डॉ कह रहे उनको जो बीमारी हुई है, उसको एल्जाइमर कहते हैं. आप तो अमरीका रहते नाम सुना ही होगा इस बीमारी का? अगर आप लीला जी को लेने आये हैं तो अच्छी बात है, लेकिन हमें दुख होगा. वह तो सब की बहुत मदद करती हैं. खुश रह कर खुशी भी बिखेरती हैं.”

~”दो दिन में मेरी वापसी है. प्रोपर्टी बेचनी है. माँ को तहसील ले जाना है. हमेशा के लिए लेने नहीं आया हूँ उनको.”

यह कह जितिन माँ के पास जा के बोला : “चलिए माँ देर हो रही.”

~”जितिन तुम वकील को यहाँ बुलवा लो. मेरे पास जो कुछ है मैं वह इस कुटुंब के ट्रस्ट में ट्रांसफर कर दूँगी.”

 लीला जी आगे बोली :  “अब से तुम को मेरे लिए कोई रकम भी नहीं भरनी पड़ेगी.”

    अपना फैसला सुनाकर लीला जी बच्चे बने रामलाल से अपनी चोटी बनवाने लगीं.

लीला जी की आँखे नम हैं लेकिन चेहरे पर गर्व का तेज है.

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