पुष्पा गुप्ता —–_
राजपूताने के एक महाराजा की बेटी की शादी थी, बाक़ी सब तो इंतज़ाम हो गया किंतु अव्वल दर्जे की शराब का नहीं। उन्होंने अपने दीवान से कहा किसी अच्छी शराब खींचने वाले का प्रबंध करो।
_बनारस से एक व्यक्ति गया। महाराजा दंग! भला एक आदमी कई हज़ार लोगों के वास्ते शराब बना लेगा? उन्होंने मंत्री से पूछा तो उसने कहा कि आप चिंता न करें महाराज सब कुछ निर्विघ्न निपटेगा।_
बारात आने के एक दिन पहले महाराज अपनी उस मधुशाला पहुँचे और उस व्यक्ति से पूछा, "बन गई शराब?"
वह बोला, “हाँ हुज़ूर।”
महाराज ने कहा कि दिखाओ कितनी बनी है।
उस कलार ने एक बोतल लाकर दे दी। महाराज ने कहा, “हज़ारों लोगों के लिए इंतज़ाम होना है और तुम एक बोतल दिखा रहे हो?”
उसने फिर कहा, “हुज़ूर चिंता न करें।”
किंतु महाराज को भरोसा नहीं था।उन्होंने अपने दीवान को बुलाकर सख़्ती से कहा, कि मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि ये आदमी इंतज़ाम नहीं कर सकता। अब बताओ क्या होगा। दीवान ने उन्हें शांत रहने को कहा मगर महाराजा भड़के हुए थे। तब कलार बोला, महाराज अगर कोई कमी रह जाए तो आप मेरा सिर क़लम कर देना।
महाराजा का ग़ुस्सा शांत हुआ और वे वापस चले गए। बारात आई और रुकी तथा चली भी गई। किसी भी मेहमान ने शराब की कमी होने की कोई शिकायत नहीं की। महाराज ने उस कलार को बुलाया पूछा, “क्या ईनाम लोगे?”
उसने कहा, कि “महाराज उस बोतल में जो शराब बची है, उसे अपने घर ले जाना चाहता हूँ। मेरी कई पीढ़ियाँ इसे पीती रहेंगी।”
इसके दो संदेश हैं। शराब कितनी मात्रा में ली जाए यह एक कुशल कलार ही समझता है। और दो वह कौशल अब लुप्त हो चला है। सरकार को शराब पर से नियंत्रण हटा लेना चाहिए। और इस तरह के तमाम कौशल स्वतंत्र होने दो। अंग्रेजों के आने के पहले शराब, भाँग, अफ़ीम आदि सब खुले थे।
तब न कोई ज़हरीली शराब पीकर मरता था न अफ़ीम से। और न कोई बेवड़ा होता था। ये सब तो सरकारी मानस पुत्र हैं। अति में हर चीज़ बुरी है नशा भी और दूध भी। अगर मात्रा में लिया जाए तो विष भी अमृत बन जाता है।
©चेतना विकास मिशन.

