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*कहानी : सच्चा प्यार*

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            डॉ. विकास मानव

      रेलवे स्टेशन पर ठंडी हवा चल रही थी। मौसम नम था और सुनीता शर्मा की आँखों में गम. प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर बैठी इस बूढ़ी महिला की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। उसके पास थी बस एक फटी-सी चादर, एक थैला और कुछ अधूरी उम्मीदें।

     विधवा सुनीता जितनी शिक्षित थी, उससे कहीं ज़्यादा भावनाशील थी। 

   अभिषेक उसका इकलौता बेटा था. पति की मौत के बाद हर तरह की कठिनाई झेलते हुए, ट्यूशन पढ़ाकर, साड़ी सिलकर, मज़दूरी करके, अपना स्वास्थ्य गिरवी रखकर उसने उसे इंजीनियर बनाया था।

  उस दिन वह एक लड़की रीमा से अपने जुड़ाव को सच्चा प्यार बताकर बोला, “माँ मैं उसी के साथ रहूंगा. अभी वह तुमको अपने साथ नहीं रखना चाहती है. उसको आजादी से इंजॉय करना है.”

  माँ बोली, “बेटा अभी! तू नासमझ तो नहीं है. ऐसी लड़की तो तुम्हारी अकेली माँ तक से अलग रहना चाहती है, उसके लिए तू मुझे छोड़ने की बात कर रहा है. वो कल किसी और को लेकर तुम्हारे साथ ऐसा करेगी तो?”

    अभिषेक बोला, “क्या माँ, अपने स्वार्थ के लिए अब तुम मुझे उसके खिलाफ भड़काने लगी. वो ऐसी-वैसी लड़की नहीं है. उसके माता-पिता हमारे रिश्ते को स्वीकार नहीं सकते, इसलिए वह उन्हें तक छोड़ रही है. हम सच्चा प्यार करते हैं. सच्चे प्यार के लिए कुछ-भी, सबकुछ छोड़ा जा सकता है. सच्चे प्यार को किसी के लिए भी नहीं छोड़ा जाना चाहिए.  सच्चा प्यार भगवान का रूप होता है. तुम नहीं समझोगी.”

  -“एक बात बताओ बेटे, संतान पैदा होती है तो कैसी रहती है? उसे पालने-पोसने, बड़ा करने, काबिल बनाने में माँ-बाप कितना कुछ करते हैं. अपना सबकुछ दांव पर लगा देते हैं. तो क्या संतान के प्रति माता-पिता का प्यार झूठा होता है?सोचकर देख,  इससे अधिक सच्चा प्यार और किसी का हो सकता है क्या? “

   -“माँ तुमको बस अपना स्वार्थ दिखता है. मुझसे तुम्हारा प्यार सच्चा तब सावित होता, जब तुम मेरी खुशी में खुश होती. जब मुझे मेरे अच्छे वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद देती.”

   अभिषेक, सुनीता को स्टेशन पर छोड़ गया था। जाते- जाते बोला था, “माँ, तुम गाँव चली जाओ. वहाँ शांति मिलेगी। मुझे और रीमा को तुम्हारा या किसी भी का डिस्टर्वेंस नहीं चाहिए. हमें आज़ादी चाहिए. हम नई ज़िंदगी, ‘अपनी जिंदगी’ शुरू कर रहे हैं।”

     सुनीता को कुछ नहीं सूझा। उसने बेटे की आँखों में जो बेरुखी देखी, वह उस दर्द से कहीं अधिक थी जो ज़िंदगी भर की गरीबी में भी न थी।

     उसे याद आया, अभिषेक जब दो साल का था, तो रातभर बुखार में तपता रहा, और वह पानी की बूंद-बूंद तलाशती फूटी चप्पलों में अस्पताल भागी थी। उसने खुद भूखे रहकर अभिषेक की फीस भरी थी। जब उसे मेहनत-मज़दूरी के पैसे मिलते तो, वह उसे बेटे के लिए ही लगा देती थी. अपने लिए कुछ नहीं रख पाती थी। अपनी किसी बीमारी के इलाज के लिए उसके पास पैसे नहीं बचते थे.

पर आज?

    अभिषेक के शब्द “माँ, तुम हमें स्पेस नहीं देना चाहती, तुम स्वार्थी हो” ने जैसे उसकी आत्मा को छलनी कर दिया। उसने ये तो कभी नहीं कहा था कि “तू ही मेरी ज़िंदगी की आख़िरी उम्मीद है।” उसे बेटे की खुशी, उसकी सफलता से अधिक कुछ भी नहीं चाहिए होता था.

    सुनीता स्टेशन के एक बेंच पर बैठी रही। तभी एक हाथ ने उसके कंधे पर दस्तक दी।

“अम्मा, आप यहाँ?”

   वह अमित था. उसका पुराना छात्र।

“क्या हुआ आपको? कोई साथ नहीं?”

   सुनीता ने कुछ नहीं कहा, पर उसकी आँखों ने बहुत कुछ कह दिया। अमित उसे अपने घर ले गया। उसकी पत्नी ने माँ कहकर गले लगाया। बच्चों ने दादी कहकर चरण छुए।

    सुनीता के मन में पहली बार एक अजीब-सी शांति उतरी.

सच्चा प्यार सिर्फ रक्त-संबंध नहीं होता. यहां यह बात सच सावित हो रही थी. लेकिन उसके भीतर सवाल उठा था : क्या अभिषेक से उसका प्यार सच्चा नहीं था? माँ का और पिता का जो प्यार होता है, वह तो कभी भी झूठा नहीं हो सकता। फिर माता-पिता का प्यार सच्चा क्यों नहीं समझा जाता?

   कुछ साल बाद सड़क दुर्घटना में अभिषेक बुरी तरह घायल हो गया. सिर में भी काफ़ी चोट थी. चौथे दिन उसे थोड़ा होश आया. उसके पास रीमा नहीं, उसका सहकर्मी मित्र सौरभ था. डॉक्टर ने कहा : “सौरभ, संभालना इनको. इनकी हालत बेहद नाज़ुक है, लम्बी केयर की जरूरत होगी. इनके किसी परिजन ने अभी तक यहां विजिट नहीं किया है. इसलिए कह रहा हूँ।”

     उस रात उसे माँ याद आई। उसका माथा चूमती वो झुर्रीदार उंगलियाँ, वो करवट बदलती रातें, वो ममता जो बिना शर्त थी, बेसुमार थी, अपार थी।

   उसने कई बार कॉल किया, पर माँ का नंबर अब बंद था।

   आज उसे समझ आया था कि, सच्चा प्यार कोई रीमा के फोटोज़, उसकी अदाओं में नहीं था, वो माँ की थाली में छुपा था, वो उनकी चुप्पी में समाया था।

पर अब देर हो चुकी थी।

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