आज अपने जीवन के बहात्तर साल पूरे होने पर मुक्तचिंतन.
साथियों फेसबुक पर शुरू से ही, मेरे जन्मदिन की तारिख 1 जून 1952 लिखि गई है. और ज्यादा तर लोग उसी दिन मुझे शुभकामनाएं देते आए हैं. लेकिन यह एक जून हमारे क्लास में आधे बच्चों का जन्म दिन मास्टरजी की कलम से लिखा गया है.
क्योंकि पहले ज्यादा तर मां-बाप अपने बच्चों को स्कूल लेजाने के समय, अपने बच्चों के जन्मदिन ठीक से याद नहीं रखने की वजह से सब कुछ मास्टरजी के हवाले करते थे. और उस समय किसी सर्टिफिकेट या आधार कार्ड का इस्तेमाल शुरू नहीं हुआ था. तो मास्टरमोशाय के कलम से जो भी तारिख लिखि जाती थी वहीं सभी बच्चों का जन्म दिन माना जाता है. और अमूमन मास्टरजी स्कूल शूरू होने के दिन की ही तारिख बच्चों के जन्मदिन की जगह लिख देते थे बाद में मॅट्रिक से लेकर स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट पर भी वही तारीख चली आती है.
असलियत में माँ ही किसी भी बच्चे के जन्म के बारे में सही जानकारी दे सकती है. मेरी माँ जो अब इस दुनिया में नहीं रही. लेकिन वह इस दुनिया से जाने के पहले, हमारे पास कलकत्ता के निवास में कुछ दिन रहीं थीं (1995-96 ) तो उस समय क्रिसमस का उत्सव था. और कलकत्ता का मशहूर सेंट कैथेड्रल चर्च, हमारे फोर्ट विल्यम के घर से, चलकर जाने के फासले पर था. तो हम सभी पैदल ही 25 दिसंबर की रात को खाने के बाद टहलते हुए व्हिक्टोरिया मेमोरियल से होते-होते, रस्ते के परली तरफ के, बिडला तारा मंडल के बगल के, सेंट कैथेड्रल चर्च में रात को बारह के पहले पहुंचे थे. और वहाँ पर की सजावट, और झुले में एक बालक की मूर्ति को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन के जैसे ही. झुलाते हुए, देखकर मां ने पुछा की “यह क्या है ?” तो मैंने कहा कि “आजसे दो हजार वर्ष पहले येशू ख्रिस्त का आज की तारीख को रात, मतलब 25 दिसंबर को जन्म हुआ था. “
“तो माँ ने कहा कि तू भी, तो आज ही के दिन, और रात को इसी समय, पैदा हुआ था.” यह सुन कर मै हक्का-बक्का हो गया तो वह हमारे खान्देश की अहिराणी बोलीभाषा मे बोली की (तूना जन्म ना दिन नाताळनी सुट्टी व्हती आणी मन बाळंतपण रातमा बारा वाजता झाले आहे!) “तुम्हारे जन्मदिन के दिन नाताळ की छुट्टी का पहला दिन था .और मुझे आधी रात के समय पेटमे वेदनाओं की जबरदस्त लहरे आने के बाद तुम्हारा जन्म हुआ है.”तो मैंने कहा कि “स्कूल में दाखिला में तो मेरा जन्म दिन एक जून 1952 लिखा है. ” तो वह बोली की तू बहुत ही छोटा, और शरारती था. तो डेढ साल पहले ही तेरे पिताजी तुझे हाथ पकडकर सिधे स्कूल ले गए और उन्होंने मास्टरजी को कहा कि ” यह बहुत शैतानी करता है, इसे आप स्कूल में दाखिला कर लिजिए. ” तो मास्टरजी ने अपने हिसाब से स्कूल में एडजस्ट करने के लिए अन्य बच्चों की तरह, मेरी भी जन्मतिथि एक जून 1952 लिख दी.हालांकि मै मेरे क्लास में सब से छोटा लडका था. यह बात मुझे मां ने कहा, तब याद आया, कि सब लडके – लडकियां मुझसे बडे-बडे क्यो थे ? मेरे उस पहले स्कूल का नाम था ‘जीवन शिक्षण शाळा, मालपूर, तालुका साक्री, जिला धुळे. ‘
जिसमें मैं मेरी क्लास में सब से छोटा होने की वजह से, लगभग हर शिक्षक का बहुत ही लाडला बन गया था. इस कारण मुझे मेरी हैसियत से अधिक लाड – प्यार और सम्मान की वजह से,स्वतंत्रता दिवस, 26 जनवरी, गांधी जयंती हो या तिलक, फुले, डॉ. बाबा साहब, कर्मवीर भाऊराव पाटील, शिरीष कुमार, साने गुरुजी, आचार्य विनोबा, जवाहर लाल नेहरू, बयालीस के हिरो जयप्रकाश – लोहिया तथा पटवर्धन बंधू तथा सयाजी महाराज, बाबू गेनू, अहिल्या बाई होलकर, सरदार पटेल, भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु, नाना पाटिल, और अन्य मशहूर लोगों पर स्कूल के कार्यक्रम में, टेबल पर खड़ा करते हुए बोलने के लिए प्रोत्साहित करते थे. और सुबह की प्रार्थना के बाद संपूर्ण एसेंब्लि को उस दिन के अखबारों की खबरें या कोई कहानी सुनाने के लिए कहते थे.
क्योंकि यह सब पढने का चस्का मुझे अक्षरज्ञान से परिचय हुआ तभी से शुरू हुआ था. जो अभि भी सिलसिला जारी है. 7 वी फायनल की परीक्षा के बाद शायद 1964-65 में, हमारे गाँव में आठवीं कक्षा के लिए पढ़ने की सुविधा नहीं होने की वजह से, हमारे बगल के तालुका शिंदखेडा मे, मेरी छोटी बुआ के पास, आगे की पढ़ाई के लिए भेज दिया गया.
और शिंदखेडा के ‘न्यू इंग्लिश स्कूल’ मे दाखिला किया गया, और उस स्कूल में बी. बी. पाटील नामके भूगोल विषय के एक बहुत ही प्यारे शिक्षक थे. जिन्होंने मुझे ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की शाखा में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. और मै रोज श्याम शाखा में जाने लगा. तो मेरे कुछ मुस्लिम मित्रों ने भी उस शाखा में आने की इच्छा जताई. तो मैंने शाखा चालक को कहा, तो उसने वरिष्ठ अधिकारी को पुछकर बताता हूँ. ऐसा कहा, लेकिन काफी समय हो गया, और मुस्लिम मित्र मुझे रोज पुछते थे. तो मैंने शाखा चालक को फिर से पुछा, तो उसने कहा कि, अभी दशहरा आ रहा है. तो वह संघ के स्थापना दिवस है. और इस बार अपने यहाँ, उसके लिए मुख्य अतिथि, खान्देश के संघ प्रमुख श्री. नाना ढोबळ आ रहे हैं. उनसे पूछकर बताया जायेगा.
तो दशहरे के दिन नाना ढोबळ आए. और उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शक्ति बढ़ाने के लिए बहुत ही जोशीला भाषण दिया. और उनके भाषण के बाद सवाल – जवाब का कार्यक्रम था. तो मैने सबसे पहले हाथ उठाया, और उन्हें पुछा, की “आपने अपने भाषण में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शक्ति बढ़ाने के लिए बहुत ही अच्छा भाषण दिया है. तो मैं गत कुछ दिनों से कुछ नए स्वयंसेवक लाने की कोशिश कर रहा हूँ. लेकिन मुझे स्थानीय पदाधिकारी इजाजत नहीं दे रहे हैं. तो आपको मेरा विनम्र निवेदन है, कि उन्हें संघ की शाखा में आने दिया जाए. “
तो उसी समय मंच पर बैठे स्थानीय पदाधिकारी ने उनके कानों में कुछ कहा. तो उन्होंने मुझे, निचे बैठने के लिए कहा. तो मैंने मेरे सवाल के जवाब का क्या उत्तर है ? यह पुछा. तो उन्होंने कहा कि संघ के अनुशासन में वरिष्ठों ने कहा तो मानना चाहिए.” तो मैंने कहा कि ” यह सवाल जवाब का समय चल रहा है. और आप को मेरे सवाल का जवाब देना होगा, तभी मै बैठूंगा. ” तो वह आगबबूला होकर बोले,” कि तुम संघ के अनुशासन का भंग कर रहे हों, इस सभा से बाहर निकल जाओ. “तो मैंने उनके मुंह पर ही जवाब दिया कि” मैं सिर्फ इस सभागार से ही नही, ऐसे संगठन से ही चला जाता हूँ कि जहाँ पर सवालो के जवाब नही दिया जाता हो. “
इस तरह से मेरा संघ के साथ संबंध चंद दिनों के भीतर ही खत्म हुआ. फिर मुझे किसिने बताया कि यहाँ पर हरिजन छात्रावास में भी एक शाखा चलती है. लेकिन इसके झंडे का रंग तिरंगा है. और उसमें यंत्र का चक्र, और कुदाल – फावडा है. मै श्याम के समय हरिजन छात्रावास के आंगन में गया , तो देखा कि, वहाँ पर लडके लडकियां तथा सभी जाति धर्म के लड़के शामिल थे. शाखा चालक श्री. प्रभाकर पाटील थे. तो उन्होंने मुझे देखते ही पुछा की “तुम संघ की शाखा में जाते हो ना ?” मैन कहा कि “जाता था. लेकिन उन्होंने मुझे निकाल दिया है. ” तो उन्होंने पूछा कि “क्यों निकाल दिया ?” तो मैंने कहा कि “मुस्लिम मित्रों को शाखा में शामिल करने को लेकर, मेरा झगड़ा हो गया है. और इस कारण उन्होंने मुस्लिम मित्रों को तो लिया ही नहीं, उल्टा मुझे ही संघ से निकाल दिया. “शायद मै आठवी कक्षा में था तो (12-13) साल की उम्र रही होगी. तो उन्होंने कहा कि “तुम अपने मुस्लिम मित्रों को भी इस शाखा में लेकर आओ. यहां पर सभी धर्मों के और जाति तथा लडके – लडकियां तक आती है. ” इस तरह से मेरा राष्ट्र सेवा दल के साथ नाता शुरू हुआ. (1965-66) जो आज 60 सालों के पश्चात भी कायम है.
भारत जैसे बहु सांस्कृतिक देश में किसी भी एक संस्कृति या धर्म को थोपना, हमारे देश की डेमोग्राफी को देखते हुए, अव्यवहारिक, और देश की एकता और अखंडता को लेकर, खतरा पैदा करने की बात है. यहां पर सभी की संस्कृति तथा भाषा, खानपान, वेशभूषा का सम्मान करते हुए, एक दूसरे के साथ प्रेम और मिलजुलकर रहकर ही, हमारे देश में शांति सद्भावना कायम रह सकती है. किसी भी एक धर्म या जाति तथा भाषा, खानपान तथा वेशभूषा को एक दूसरे पर थोपना मतलब हमारे देश की एकता और अखंडता के साथ खिलवाड़ करना होगा.
इस तरह आजसे तिस – पैतिस साल पहले, कलकत्ता के सेंट कैथेड्राल में रात के बारह बजे के बाद, मुझे मां से पहली बार मेरे जन्मदिन की बात पता चली, तो मेरे शरीर पर रोमांच खड़े हो गए. और मुझे मन – ही – मन में आया कि, येशू ख्रिस्त और मेरा जन्मदिन और समय भी लगभग एक है.
लेकिन यह बात मैंने बहुत समय तक किसी को बताई नही. क्योंकि मुझे थोडा सा शक था, इसलिए जब मां कलकत्ता में, बहुत होमसिक हो गई तो उसे छोडने के लिए धुलिया जिला साक्रि तहसील के मालपूर नाम के मेरे जन्म गांव गया. और सबसे पहले ग्रामपंचायत का जन्म-मृत्यु का रजिस्ट्रेशन का रेकॉर्ड देखने को गया. तो उन्होंने कहा कि “कुछ अंतराल के बाद हमें यह रेकॉर्ड तहसीलदार के कार्यालय में जमा करना पड़ता है. तो आप साक्री में तहसीलदार के ऑफिस में जाकर पता किजिए. “
तो मैं हमारे तालुका साक्री के तहसिल ऑफिस चला गया. तो साक्री के राष्ट्र सेवा दल के, हमारे विधायक मित्र नानासाहेब ठाकरे खुद मुझे तहसीलदार से परिचित कराने के लिए मेरे साथ चलकर आज थे. तो वह तहसिलदार को बोले,” कि डॉक्टर खैरनार हमारे राष्ट्र सेवा दल के सदस्यों में से एक है. तो इन्हें जो भी मदद चाहिए किजिए. तो तहसीलदार ने मेरे लिए रेकॉर्ड रुम जो धुलभरी, और कई दिनों के पश्चात खोली गई थी. और रेकॉर्ड इनचार्ज को हिदायतें देते हुए कहा कि इनका जन्म का रेकॉर्ड आज किसी भी हालत में ढूंढ दिजिए. क्योंकि इन्हें कल कलकत्ता वापस जाना हैं.
तो मैंने और मेरे एक बालवंत पुंडलिक भामरे नामके बचपन के मित्र, और वह रेकॉर्ड अफसर ने उन धुलभरी फाईलों को पांच – छह घंटे उलट – पलट करने के बाद देखा कि, 1950, 51, 52, 54, 55, 56, 57, 58, 59, 60 मतलब साठ के दशक के शुरुआती दौर में, मालपूर गांव की दस साल की जन्म-मृत्यु के रेकॉर्ड में मेरा जन्म का उल्लेख कही नही निकला. और बराबर 1953 का रेकॉर्ड गायब था.
तो मैं इतनी जद्दोजहद के बाद मां की बात सही है. इस नतीजे पर पहुंचा. और “तू येसू के दिन नाताळ मे पैदा हुआ !” यह उसकी बात मैंने अपने मन में ठान ली. की एक मां इतनी प्रसव पीड़ा से मुझे घर के घर में ही जन्म देते हुए, भला गलती कैसे कर सकती है ? इस तरह मैं भी अब इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि मेरे स्कूल लिविंग सर्टिफ़िकेट पर भलेही एक जून 1952 लिखा है, लेकिन अपनी जन्मदात्री मां के कहने पर देर से ही सही लेकिन मेरे जन्मदिन की तारीख और समय का पता तो चला जो 25 दिसंबर 1953 है.
तो साथियों आपकी शुभकामनाएं अबतक इकहत्तर सालों से, एक जून को मिलती रही है. लेकिन बहत्तर वे जन्मदिन पर मैंने ठान लिया है. कि अब मेरा जन्मदिन 25 दिसंबर 1953 है. यह पिछले कुछ दिनों से मनमें बार – बार उधेडबुन में आता- जाता रहा है. आज खुलकर बता रहा हूँ.
क्योंकि वैसे भी मै देख रहा हूँ, कि बहुत सारे मराठी भाषी मित्रों के जन्मदिन एक जून को देखते रहता था. और मुझे मेरा जन्मदिन कभी भी एक जून लगा नही था. अनमने भाव से चुपचाप शुभकामनाएं स्विकार कर लेता था. आज पहली बार खुलकर स्विकार कर रहा हूँ, कि मैं आज अपने जीवन के बहत्तर साल की यात्रा पूरी कर के 73 वे वर्ष की तरफ मुखातिब हो रहा हूँ. पता नहीं आगे की जिंदगी कितनी है ? क्योंकि काफी हम उम्र मित्र एकेक विदा हो रहै है. और मुझे भी आजसे 8 साल पहले तीन स्टेंट लगे हैं. भागलपुर दंगे के बाद से बीपी और शुगर की बिमारी साथ-साथ चल रही है.
सबसे ज्यादा मित्र 2023 में और कोरोना के समय में छोडकर चले गए हैं. लेकिन मैंने होश सम्हाला तबसे, जाति-धर्म निरपेक्ष तथा समतामूलक समाज, जिसमें लिंगभेद के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा, ऐसे समाज की निर्मिति के लिए चल रहा, प्रयास जारी रहेगा. और इस मार्ग में आनेवाली बाधाओं को, हमारे देश के संविधान के अनुसार दूर करने की कसम खाता हूँ.
और वर्तमान समय में कम अधिक प्रमाण मे विश्व के काफी जगहों पर भी सरकारोने अपनी टूच्ची राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए, सभी तरह के अल्पसंख्यक समुदायों को बुरी तरह से भय की ग्रंथि का शिकार बनाकर रखा है. उन्हें भयग्रस्त मनस्थिति से निकालने की, मै अपनी संविधानिक और नैतिक जिम्मेदारी मानता हूँ. और सबसे अधिक चिंता की बात गाजा पट्टी की स्थिति जहां पर मै पंद्रह साल पहले इन्ही दिनों मे फर्स्ट एशियाई कारवां का आयोजन करने के बाद लॅंन्ड टू लॅंन्ड पाकिस्तान, इराण, सिरिया तुर्कस्थान इजिप्त से होते हुए रफाह सिमा को पार कर के एक जनवरी 2011 के दिन गाजा पट्टी में एक हफ्ता रहकर आने की वजह से मुझे गाजा पट्टी का एकेक कोना मालुम है. जो मै पिछले दो सालों से लगातार देख रहा हूँ. और कल की ही खबर हैं की डोनाल्ड ट्रंप अपने पारिवारिक कन्स्ट्रक्शन कंपनी के द्वारा गाजा पट्टी पर बचे हुए फिलिस्तीनीयो को हटाकर सिरिसॉर्ट बनाने का अपना काम करने जा रहा है. पिछले दो सालों से चले इस्राइल के हमलो मे एक लाख से अधिक संख्या में लोगों की मृत्यु हो गई. और इस हमले की लगभग पूरे विश्व ने निंदा की है. लेकिन अमेरिका पूरी तरह से इस्राइल के साथ खड़ा रहां और उसे युध्द करने के लिए हर तरह की मदद करते रहने के बाद पूरी गाजा पट्टी को खंडहरों मे तब्दील करने के बाद यह आदमी तथाकथित युध्द बंदी करने का दावा करते हूऐ उसके एवज में नोबेल शांति पुरस्कार की कामना कर रहा है. और एक लाख लोगों की मौत और बचे हुए 20 – 21 लाख लोगों को हटाकर टूरिज्म के लिए रिसॉर्ट बनाने का अमानवीय हरकत कैसे कर सकता है ? यह वही अमेरिका है जिसने विश्व में पहलीबार दुसरे महायुद्ध के अंतिम चरण में जापानी शहर नागासाकी और हिरोशिमा पर एटम बम गिराने का सबसे अमानवीयता का काम किया है और उस एटम बम का परिक्षण न्यू मेक्सिको की जमीन पर किया था.
वैसे ही हमारे पड़ोसी बंगला देश में पिछले डेढ सालों से जो घटनाक्रम चल रहे वह भी काफी दुःखद है. मै बंग्लादेश पहलीबार 2015 मे ढाका मे एशियन सोशल फोरम के अधिवेशन के लिए गया था. और वहां के हिंदूओं का हालचाल पता करने के लिए विशेष रूप से एक दिन अलग से निकालकर ढाका के हिंदू बहुल क्षेत्र धनमंडी में रामकृष्ण मिशन के मठ से लेकर धनमंडी मे पूरा दिन वहाँ रह रहे हिंदू परिवारों के साथ हालचाल पुछने के बाद लोगों ने ही कहा की श्याम को छह बजे के बाद ही ढाकेश्वरी मंदिर के आहाते मे बंग्लादेश मे रह रहे हिंदूओं के बारे में उस कार्यालय में जानें से आपको पूरे बंग्लादेश मे रह रहे हिंदूओं की पूरी जानकारी मिल सकती है. इसलिए मैं दो घंटों से अधिक समय तक वहां पर की गई बातचीत से पता चला था कि शेख हसिना वाजेद के सत्ता मे रहने से काफी सुरक्षितता महसूस होती है. लेकिन उनके हटने के बाद असुरक्षित माहौल बन जाता है. जो आजकल डेढ साल से दिखाई दे रहा है. और इस परिस्थिति का राजनीतिक लाभ भाजपा आनेवाले वर्ष मे पश्चिम बंगाल के चुनाव मे भुनाने की कोशिश कर रहा है डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपने हिंदूबनाम हिंदू पुस्तिका में इस विषय पर बहुत विस्तार से लिखा है. और ढाकेश्वरी मंदिर के प्रांगण के पदाधिकारियों ने मुझे मै नागपुर में रहता हूँ, यह देखकर एक विशेष सुचना देतें हूऐ हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हूऐ कहां कि दादा आपनी तो नागपुरेर मराठी भद्र लोक जदी आपनि समोय पाबेन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केर पदाधिकारियोंर जन्नौ आमादेर संदेश अवश्य देबेन कि भारतेर जोमीन थेके मुसलमानेर उपर किछू अत्याचार होत छे तार हिसाब आमाके देते होत छे देखून ना 6 दिसबंर 1992 दिन बाबरी मस्जिद विध्वंस कोरार पोर समस्त बंग्लादेशेर हिंदू के कौन रोकम अत्याचारेर सामना करते होलो? “( की जब भी कभी भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों उपर हमले होते हैं. तब-तब बंग्लादेश मे मुस्लिम कट्टरपंथीयो के तरफ से हमले हमारे उपर किऐ जाते हैं. इसलिए आप आर एस एस और उनके अनुषंगिक संघटनाओ को अवश्य बताएं कि भारत में रह रहे अल्पसंख्यक समुदायों के साथ शांती और सद्भावना के साथ व्यवहार किजिए. यह संदेश देने का अनुरोध किया था.) और कोइंसिडेंटली मुझे नागपुर वापस आने के बाद आर एस एस के हेडगेवार विचारमंच ने मेरे बंग्लादेश के यात्रा के अनुभवों पर बोलने के लिए बुलाया था . और वैसे तो मै गया नही होता लेकिन ढाकेश्वरी मंदिर के प्रांगण के बंग्लादेशेर हिन्दूओं के हाथ जोड़ कर की हुई प्रार्थना को आरएसएस के मंचपर बताने के लिए जानबूझकर गया था. और मैंने कहा कि हिंदू बहुल भारत में बैठ कर हिंदूत्ववादी प्रचार – प्रसार करने की किमत आपको देने के बजाय आप सत्ताधारी बन बैठे हो. लेकिन भारत के बाहर जितने भी हिंदू रह रहे हैं वह आप लोगों के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति की किमत किस तरह चुका रहे ? यह बात मुझे आप लोगों को बताने के लिए बंगलादेश के हिंदूओं ने विशेष रूप से करबद्ध निवेदन करते हूऐ आपको यह संदेश बताने की विनती की है, इसलिए मै आज आप लोगों के मंचपर आया हूँ. लेकिन आज दस साल होने को आए आर एस एस क्या कर रहा है ?
वैसे ही महात्मा गाँधी जी के जन्म को 150 साल पूरे होने के कार्यक्रम के लिए मुझे (2019) आसाम जाने का मौका मिला था. और उस कार्यक्रम के उद्घाटन भाषण मे मैनें महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका के भारतीययो को दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकारने एन आर सी जैसे ही कानून के अनुसार कई तरह की पाबंदियां लगाने के कानून के खिलाफ ही बैरिस्टर मोहनचंद करमचंद गाँधी ने अपने सत्याग्रह की खोज की थी. और वह मोहन 1915 मे भारत की भूमि पर महात्मा गाँधी बनकर वापस आया था. और इसीलिए आज हम उनकी 150 वी जयंती का कार्यक्रम कर रहे हैं. जो वर्तमान चिफजस्टिस गोगोई साहब आपके आसाम के ही है. और उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के जनरल स्मट के जैसा फैसला दिया है. और इसलिए महात्मा गाँधी जी के जन्म के 150 वर्ष का सबसे बड़ा कार्यक्रम उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में किऐ हूऐ सत्याग्रह के मार्ग से इस फैसले के खिलाफ हमे आसाम तथा उत्तरपूर्व के अन्य प्रदेशों में इस फैसले को लेकर लोगों को जागरूक करने के लिए शुरुआत करनी चाहिए अन्यथा सबसे अधिक अफरा-तफरी आप के आसाम और सभी उत्तरपूर्व के राज्य में सबसे अधिक होने की संभावना है . यह सुनने के बाद आयोजको ने मुझे एक महिने के लिए संपूर्ण आसाम और उत्तरपूर्व के राज्यों में यात्रा करने का आग्रह किया. और उसी यात्रा के दौरान मुझे तीन हफ्ते से अधिक समय तक आसाम तथा उत्तर पूर्वी प्रदेश में घुमने का मौका मिला था.
उस दौरान मै बोडोलैंड और कर्बिलॉंग भी गया था. आजही कर्बिलॉंग मे चल रही हिंसा देखकर मुझे बहुत दुख हो रहा है. वर्तमान सरकारने अपने पूंजीवादी विकास के लिए संविधान से लेकर हमारे पर्यावरण संरक्षण के सभी नियमों को अनदेखा करते हूऐ हिमालय मे चारधाम योजना के तहत हिमालय पर्वत मे की जा रही खुदाई तथा चौड़ी सडकें बनाने का युद्ध स्तर पर का काम से लेकर अरावली, सह्याद्री, विंध्य तथा उनसे निकलने वाले सभी नदिया तथा खनिजों का दोहन करने के जूनून के वजह से आदिवासीयो के लिए विशेष रूप से बनाऐ गए संविधानिक प्रावधान पांचवीं और छठवी सूची की ऐसी की तैसी करते हूए यह पागलदौड चल रही है. इसे हरहाल मे रोकना है. और राजधानी दिल्ली के रायसिना हिल्स से लेकर हरियाणा राजस्थान तथा गुजरात तक फैला हुआ अरावली पर्वत को भी खोदने का काम करने की अनुमति देखकर मै बहुत ही हैरान हूँ. इस तरह के विकास के नाम पर चल रहे विनाश को हर हाल में रोकना चाहिए.
आज मेरे जन्मदिन के अवसर पर मै संकल्प करता हूँ कि” हमारे देश की आधी आबादी अल्पसंख्यक समुदाय, महिलाओं की, तथा दलित – आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों को हजारों सालों से मनुस्मृति के हिसाब से अत्यंत उपेक्षित रुप से रखा गया है. उन्हें सही मायने में बराबरी में लाने के लिए समाज-सुधारक जो हमारे पूर्वज रहे हैं. उनके अधुरे कार्य को आगे बढ़ाने के लिए किसी भी प्रकार की कोर – कसर बाकी नहीं रखुंगा.और विकास के नाम पर चल रहे विनाश को रोकने से लेकर, सांप्रदायिकता तथा जातीयता के खिलाफ पिछले पचास साल से अधिक समय से जो परिवर्तन का काम कर रहा हूँ, उसे मेरे जीवन के अंतिम समय तक जारी रखने का संकल्प दोहराता हूँ. ” सभी साथियों को क्रांतिकारी अभिवादन
डॉ. सुरेश खैरनार, 25 दिसंबर रात के 1-35, नागपुर.

