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जीवन की यात्रा केवल वर्षों का जोड़ नहीं होती, बल्कि वह संघर्षों, अनुभवों, विचारों और समाज के प्रति समर्पण की कहानी होती है। जब कोई व्यक्ति अपने जीवन के साठ वर्ष पूरे करता है, तो यह केवल एक आयु का पड़ाव नहीं बल्कि जीवन की उस लंबी यात्रा का उत्सव होता है जिसमें संघर्ष, मेहनत, सपने, संवेदनाएँ और समाज के प्रति जिम्मेदारी साथ-साथ चलती हैं।
12 मार्च 1966 को मेरा जन्म मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के एक छोटे से अत्यंत पिछड़े गाँव तिनसाई में हुआ। उस समय गाँव की परिस्थितियाँ आज की तरह विकसित नहीं थीं। गाँव में न बिजली थी, न सड़क और न ही स्कूल की सुविधा। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बीच बचपन बीता। लेकिन संघर्षों के बीच ही जीवन ने आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
प्राथमिक शिक्षा के लिए मुझे पास के गाँव मरखंडी जाना पड़ता था। उसके बाद मिडिल शिक्षा बड़गवाँ में और हायर सेकेंडरी शिक्षा बेगमगंज में प्राप्त की। आगे की उच्च शिक्षा के लिए सागर का रुख किया। उस दौर में ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर शिक्षा प्राप्त करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन यही संघर्ष आगे की यात्रा की नींव बन गया।
जीवन के इस सफर में शिक्षा ने मार्गदर्शन दिया और 1986 में सरकारी सेवा में शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिली। शिक्षक के रूप में सेवा करते हुए यह प्रयास रहा कि शिक्षा केवल नौकरी न होकर समाज निर्माण का माध्यम बने। विद्यार्थियों के भीतर जागरूकता, संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना विकसित करना हमेशा प्राथमिकता रही।
लेकिन जीवन की यात्रा केवल पेशे तक सीमित नहीं रही। 1983 से ही सामाजिक कार्यों में सक्रियता शुरू हो गई थी। समाज के प्रश्नों, समस्याओं और अधिकारों के मुद्दों पर काम करने की प्रेरणा हमेशा भीतर से आती रही और यह सिलसिला आज भी निरंतर जारी है। विभिन्न सामाजिक और जनसंगठनों के साथ मिलकर समाज में जागरूकता और परिवर्तन के लिए कार्य करते रहना जीवन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बन गया।
लेखन की प्रवृत्ति भी बचपन से ही रही। विचारों को शब्दों में व्यक्त करने की यह यात्रा धीरे-धीरे एक साहित्यिक और वैचारिक साधना में बदल गई। इसी क्रम में मासिक पत्रिका “तरुणभारती” का प्रकाशन शुरू किया गया। बाद में “शिल्पक्ष जनयोद्धा” का संपादन भी किया। लेखन और पत्रकारिता के माध्यम से समाज के मुद्दों, संघर्षों और विचारों को सामने लाने का प्रयास लगातार चलता रहा।
समय के साथ बदलती तकनीक और संचार माध्यमों को देखते हुए वर्ष 2020 में “बहुजन संवाद” और “चड़ार संवाद” नाम से दो यूट्यूब चैनल की शुरुआत की गई। इन माध्यमों के जरिए सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक मुद्दों पर संवाद का एक नया मंच तैयार करने का प्रयास किया गया।
लेखन की यह यात्रा लगातार आगे बढ़ती रही। वर्ष 2025 में चार पुस्तकों का प्रकाशन हुआ और अब तक कुल मिलाकर 15 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से समाज, इतिहास, विचार और जनचेतना से जुड़े विषयों पर अपने विचार और अनुभव साझा करने का प्रयास किया गया है।
आज पीछे मुड़कर देखने पर यह महसूस होता है कि जीवन की यह यात्रा केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, सीख और समाज के प्रति जिम्मेदारी की यात्रा है। एक छोटे से पिछड़े गाँव से शुरू हुई यह राह अनेक अनुभवों से गुजरते हुए आज इस मुकाम तक पहुँची है।
साठ वर्ष की यह यात्रा यह सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मन में संकल्प, समाज के प्रति संवेदनशीलता और निरंतर प्रयास की भावना हो, तो रास्ते स्वयं बनते चले जाते हैं।
आज जब जीवन के षष्टिपूर्ति के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़ा हूँ, तो मन में संतोष भी है और नई ऊर्जा भी। संतोष इस बात का कि जीवन की राह पर चलते हुए समाज के लिए कुछ करने का अवसर मिला, और ऊर्जा इस बात की कि आने वाला समय भी समाज, विचार और जनचेतना के कार्यों के लिए समर्पित रहेगा।
ईश्वर से यही कामना है कि आने वाले वर्ष स्वास्थ्य, ऊर्जा और नई प्रेरणाओं से भरे हों और जीवन की यह यात्रा आगे भी समाज के लिए उपयोगी और सार्थक बनी रहे।
साठ वर्ष की यह यात्रा केवल मेरा व्यक्तिगत पड़ाव नहीं, बल्कि उन सभी लोगों का साझा सफर है जिन्होंने हर कदम पर सहयोग, प्रेरणा और विश्वास दिया।

