अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

बिना जानकारी के छपते लेखऔर कवि ध्रुव शुक्ल की हैरानी

Share

कीर्ति राणा

हमारा लिखा कब, किन अखबारों में छप जाता है पता ही नहीं चलता।मानदेय तो दूर की बात अखबार प्रकाशित लेख की प्रति, धन्यवाद पत्र लिखना भी जरूरी नहीं समझते।
ये दर्द है कवि ध्रुव शुक्ल का। अपनी कविताओं और उपन्यास से देश-विदेश में पहचाने जाने वाले कवि ध्रुव शुक्ल से एक विवाह समारोह में मुलाकात हो गई।चर्चा चल पड़ी आजकल क्या लिख रहे हैं? उनका कहना था जिन अखबारों में कॉलम लिख रहे हैं वही सब देश के अन्य अखबारों में कब छप जाता है, हमें ही पता नहीं चलता। जब किसी साहित्यकार मित्र का फोन आता है और वह बताएं कि फलां अखबार में आप का लिखा पढ़ा है तो आश्चर्य होता है कि वहां तो लेख भेजा ही नहीं छप कैसे गया? गूगल पर सब कुछ आसानी से अवेलेबल होने का यह परिणाम है।
ऐसे अखबार इतनी सदाशयता भी नहीं दिखाते कि प्रति भेज दें।एक जमाना वह भी था जब दैनिक भास्कर व अन्य अखबार लेखकों को फोन करके लिखने का अनुरोध करते थे। 3 हजार रु तक मानदेय भी देते थे।अब तो गूगल/मोबाइल पर अखबारों को सब आसानी से मिल रहा है।
ध्रुव शुक्ल की एक कविता
🔺जन-गण मंगलदायक भरे बाज़ार में *

बने-बनाये घर मिलते बाज़ार में
बने-बनाये डर मिलते बाज़ार में
बने-बनाये पर मिलते बाज़ार में
नहीं मिलती है
अपने मन की उड़ान भरे बाज़ार में!

बने-बनाये प्रेम मिलें बाज़ार में
बने-बनाये फ्रेम मिलें बाज़ार में
बने-बनाये गेम मिलें बाज़ार में
नहीं मिलता है
अपने मन का खेल भरे बाज़ार में!

बने-बनाये मुख मिलते बाज़ार में
बने-बनाये रुख़ मिलते बाज़ार में
बनी-बनायी तुक मिलती बाज़ार में
नहीं मिलती है
अपने मन की बात भरे बाज़ार में!

बने-बनाये नेता मिलें बाज़ार में
बने-बनाये अभिनेता मिलें बाज़ार में
बने-बनाये विक्रेता मिलें बाज़ार में
कहाँ मिलते हैं
जन-गण मंगलदायक भरे बाज़ार में!

बने-बनाये स्वाद मिलें बाज़ार में
बने-बनाये वाद मिलें बाज़ार में
बने-बनाये विवाद मिलें बाज़ार में
नहीं मिलता है
जीवन का संवाद भरे बाज़ार में!

होता रहता प्रकट, रटा-रटाया दुख
बने-बनाये सुख, पटे पड़े बाज़ार में
कहाँ ज़रूरत कुछ रचने की
सब मिलता है बना-बनाया भरे बाज़ार में!
*साभार(‘जानकी पुल से’कविता शुक्रवार 16)
——
🔺रचनाएं और सम्मान
सागर (मप्र)में जन्में 69 वर्षीय ध्रुव शुक्ल कवि-कथाकार के तौर पर पहचाने जाते हैं।उनकी रचनाएं हैं “उसी शहर में’, “अमर टॉकीज’ एवं “कचरा बाज़ार’ उपन्यास, “खोजो तो बेटी पापा कहाँ हैं’, “फिर वह कविता वही कहानी’, “एक बूँद का बादल’, “हम ही हममें खेलें’ कविता संग्रह, “हिचकी’ कहानी-संग्रह प्रकाशित। राष्ट्रपति द्वारा कथा अवार्ड, कला परिषद् के रज़ा पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें