मुनेश त्यागी
पिछले दिनों अमेरिका के टेक्सास राज्य में 18 वर्षीय छात्र ने स्कूल में घुसकर अंधाधुंध गोलाबारी करके 18 बच्चों समेत 21 लोगों की हत्या कर दी। सभी बच्चों की उम्र 7 से लेकर 10 वर्ष के बीच थी। घटना के समय हत्यारे साल्वाडोर रामोस के पास हेंडगन, अर्द्ध स्वचालित राइफल और मैगजीन थी। स्कूल पहुंचने से पहले इस हत्यारे ने अपनी दादी को भी गोली मारी थी।
अमरीका में बढ़ते अपराधिक हमलों की तस्वीर बड़ी भयावह है। वहां साल दर साल बंदूक से हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं। इस देश में वहां की आबादी से ज्यादा बंदूकें हैं। आलम यह है वर्ष 2020 में बंदूकें 45, 252 निर्दोष लोगों की जान का दुश्मन बनीं। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार 2020 में 43 परसेंट हत्या, 54% आत्महत्या और तीन परसेंट अन्य तरह की मौतों का कारण बंदूक हैं।
आंकड़े यह भी बताते हैं कि 2020 में कुल 24, 576 घटनाओं में से 19384 लोगों की हत्या का कारण बंदूक थी। यह आंकड़ा वर्ष 1968 के बाद से सबसे बड़ा है। इस तरह आत्महत्या के कुल 45979 मामलों में 53% यानि 24,292 मामलों के लिए बंदूक जिम्मेदार है। 11968 से 2017 के बीच करीब 15 लाख लोगों की मौत का कारण बंदूक रही है। अमरीकी अर्थव्यवस्था को हर साल शूटिंग के कारण 40 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है।2021 में 1.9 करोड़ की बिक्री हुई जबकि 2020 में यह आंकड़ा 2.1 करोड था।
अमेरिकी स्कूलों में गोलाबारी की ये घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। यहां 100 लोगों पर 120 बंदूकें हैं। अमेरिका में गन लोबी इतनी मजबूत है और सरकार पर इतनी हावी है कि वहां की सरकार भी इनके सामने नाक रगडती है और बेबस नजर आती है और पूरा का पूरा अमरीका गन लोबी के सामने लाचार है।
अमेरिका के 4 राष्ट्रपति,,, जॉर्ज बुश, बराक ओबामा, डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडेन कहते रहे, मगर कुछ भी नहीं बदला। जॉ बाइडन का कहना है कि “गन कल्चर को लेकर मैं बीमार और थका हुआ महसूस कर रहा हूं।” गैलप द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार वहां के लोग बंदूक संस्कृति को लेकर बंठे हुए हैं। 52 प्रति सख्त कानून चाहते हैं जबकि 35 फीसदी इस व्यवस्था से संतुष्ट हैं।
बंदूक संस्कृति की शुरुआत 1871 में हुई और राजनीतिक दखल के कारण बढ़ती जा रही है और काबू से बाहर हो गई है। सीडीसी के अनुसार अमेरिका में रोज 53 निर्दोष आदमी बंदूक द्वारा मारे जा रहे हैं। अब यहां पर मुख्य सवाल यह उठता है कि अमेरिका में बंदूक से इतने अपराध और हत्याऐं क्यों हो रही है?( ये तमाम आंकड़े 26 मई 2022 के हिंदुस्तान के मेरठ संस्करण से लिए गए हैं)
इसका एक कारण तो यह है कि वहां 18 से 21 वर्ष तक का कोई भी आदमी बंदूक रख सकता है, यह उनका संवैधानिक अधिकार है। यहीं पर हम देख रहे हैं कि वहां काल और गोरे का नस्ली भेदभाव बढ़ता जा रहा है। इसका कोई अंत अमेरिकी समाज या सरकार के पास नहीं है। दूसरा वहां पर बढ़ती आर्थिक अमीरी का अंतर लोगों की गरीबी और बेरोजगारी और काले लोगों का डर भी इस तरह की घटनाओं को जन्म दे रहा है और इस सब का समाधान वहां की पूंजीवादी सरकार के पास नहीं है और वहां के काले और गोरे लोगों में नस्लभेद का भेदभाव भी इस तरह तरह की हत्याओं और घटनाओं को जन्म देता है।
वहां की राजनीतिक संस्कृति और कालों पर गोरों की वर्चस्ववादी नीति भी इसके लिए जिम्मेदार है। इस तरह हम देख रहे हैं कि अमेरिकी व्यवस्था के पास गरीबी, नस्ली भेदभाव की अमीरी और गरीबी और बेरोजगारी को दूर करने के उपाय नहीं हैं। वहां के समाज में समता समानता और आपसी भाईचारे की भावना का नितांत अभाव है। वहां पर के अमीरों और गरीबों में नफरत और हिंसा का माहौल है जिसे अमेरिकी लुटेरी व्यवस्था इतनी डींगें मारने के बाद भी दूर नहीं कर पाई है।
इसके अलावा श्वेत जातियों ने और अंग्रेजों ने जब अमेरिका पर हमला किया था और वहां के करोड़ों रेड इंडियन को मौत के घाट उतार दिया था, तब से लेकर आज तक वह हिंसा और काले बाल गोरे की राजनीति का भेद और आपकी नफरत, वर्चस्ववादी मानसिकता और सोच और हिंसा की राजनीति खत्म नहीं हुई है। वह आज भी जारी है और हम आए दिन उसके दर्शन करते रहते हैं।
इस तरह नस्ली हिंसा और भेदभाव इस तरह की हिंसक और आपराधिक घटनाओं को लगातार जन्म दे रहे हैं, समता समानता और भाईचारे को नहीं और आज हम अमरीकी समाज का हिंसक, आपराधिक और खूंखार चेहरा देख हैं। इस प्रकार हम पूरे इत्मीनान के साथ कह सकते हैं कि अमेरिकी लुटेरी साम्राज्यवादी व्यवस्था एक आदर्शवादी व्यवस्था नहीं है। इसका विकल्प केवल और केवल समाजवादी व्यवस्था ही है जिसमें जनता किसानों मजदूरों के कल्याण के लिए और उनकी भलाई के लिए नीतियां बनाई जाएंगी और उस समाज में किसानों और मजदूरों की सत्ता और सरकार होगी जो इस तरह की आपराधिक और हिंसक घटनाओं पर और कत्लेआम पर आसानी से विजय हासिल कर लेगी।





