डॉ. विकास मानव
मैं किसी भी मजहवी धर्म का नहीं हूँ. मैं किसी जाति-विशेष का भी नहीं हूँ. मेरा किसी मत से भी कोई संबंध नहीं है. मैं सिर्फ मैं हूँ -- मौलिक, खालिस और चेतना के स्तर पर संपूर्ण. मेरे जीवन में काम की चीज हर जगह से स्वीकार है, कचरे का, अविधायी का वहिष्कार है. वेदों का किसी धर्म-विशेष से कोई संबंध नहीं है. वे सिर्फ इंसानियत की बात करते हैं और इंसान के हित में समग्र विज्ञान के उद्घोषक व पोषक हैं. मनुर्भव उनका सूत्र है. इसके विपरीत वहाँ जो कुछ है, वह षडयंत्रियों द्वारा प्रक्षेपित है और मैं भी उनका विरोधी हूँ.1. ब्राह्मण-वर्ण योजना :
ब्रह्मणे ब्राह्मणमालभते”।
ब्रह्म वै ब्राह्मणः।
ब्रह्मैव तद्ब्रह्मणा समर्द्धयति।
~यजुर्वेद (३०/५)
मंत्र का अर्थ जानने से पहले ब्रह्म शब्द का अर्थ जानना चाहिए। बृह्-वृद्धौ, बृहि बृंह- बृद्धौ शब्दे च, (पा.धातुपाठ १/४८८,४८९,४९०) धातुओं से “सर्वधातुभ्यो मनिन्”(उपादि सूत्र ४/१४६)
इस सूत्र से मनिन् प्रत्यय करके “बृंहेनोऽच्च” (उणादि सूत्र ४/१४६)
सूत्र के द्वारा मनिन् के बचे ‘न’ को ‘अ’ करके और ‘ब’ के ‘ऋ’ को ‘र’ करके ब्रह्म शब्द की सिद्धि होती है।
“बृंहति वर्धते यत् तद् ब्रह्म।”
अर्थात् जो बढ़ता रहता है, वह ब्रह्म है, अब प्रश्न यह है कि ऐसा क्या है, जो बिना विराम लिए निरंतर बढ़ता ही रहता है, ऐसा नहीं कह सकते कि ऐसा कुछ भी नहीं है, क्योंकि ज्ञान सदैव बढ़ता ही रहता है। इसलिए ब्रह्म शब्द का मूल अर्थ ज्ञान ही है।
अब पुनः जहाँ कहीं ज्ञान की वृद्धि रूप संबंध दिखता है, वह भी ब्रह्म है। जैसे-जहाँ बहुत ज्ञान है, ऐसे चारों वेद भी ब्रह्म हैं “वेदो ब्रह्म”(जै.उ.४/२५/३)
मन से जानता है, इसलिए “मनोब्रह्म” (गो.प.२/१०)
मन ब्रह्म है, श्रोत्र से जानता है इसलिए “श्रोत्रं ब्रह्म”(शतपथ १४/६/१/४२)
नेत्रों से जानता है इसलिए “चक्षुर्वै ब्रह्म” (शतपथ १४/६/१०/८)
सबके हृदय में अन्तर्यामी रूप से बैठा परमात्मा.
सब कुछ जानता है, इसलिए श्रुति उसे “परम ब्रह्म” कहती है। “हृदयं वै सम्राट परमं ब्रह्म”
(शतपथ १४/६/१०/१८)
इस प्रकार स्पष्ट है कि, प्रकृष्ट ज्ञान ही ब्रह्म है, “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐतरेय उपनिषद ५/३)
जैसे ज्ञानवान् ज्ञानी वैसे हि ब्रह्मवान् ब्राह्मण, इसी प्रकार जब वेद ब्रह्म है, तो वेद की व्याख्या करने वाले शास्त्र ब्राह्मण कहे जाते हैं। जैसे—ऐतरेय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण, ताण्ड्य महाब्राह्मण और गोपथब्राह्मण। संस्कृत में पुस्तक शब्द नपुंसक लिंग है, तदनुसार शास्त्र के अर्थ में प्रयुक्त ब्राह्मण शब्द भी नपुंसक लिंग है। इसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति पुल्लिंग है।
तदनुसार ज्ञानी के अर्थ में प्रयुक्त ब्राह्मण शब्द भी पुल्लिंग है। इस प्रकार वेद हुआ ब्रह्म और वेद का ज्ञानवान् ब्राह्मण। अब मंत्रार्थ देखें राष्ट्र का अध्यक्ष राजा अथवा राष्ट्र हित में राजा द्वारा संगठित विद्वत् समाज ब्रह्मणे-ज्ञान के लिए, राष्ट्र के बालक-बलिकाओं की शिक्षा के लिए, वेद की शिक्षा के लिए। ब्राह्मणम्- ज्ञानी को वेद के विद्वान शिक्षक को आलभते- सब जगह से प्राप्त कर इस व्यवस्था में नियुक्त करता है।
ब्रह्म ज्ञान वै-निश्चय ही ब्राह्मण:- अर्थात् निश्चित रूप से ज्ञान ही ब्राह्मण है। इस प्रकार ज्ञान से युक्त, ज्ञान देने में समर्थ व्यक्ति ही ब्राह्मण है, शिक्षक है, आचार्य है। निश्चय ही ब्रह्मचर्या के द्वारा, शिक्षाचर्या के द्वारा, ब्राह्मण से अर्थात् शिक्षक से सभी ब्राह्मचारियों अर्थात् शिक्षार्थियों में बढ़ता हुआ ज्ञान ही, ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व या गुरु का गुरुत्व या शिक्षक का शिक्षकत्व है। तद्ब्रह्मणा- उस ज्ञान के द्वारा, ब्रह्म एव बढ़ता हुआ ज्ञान ही, समर्द्धयति- समृद्ध होता है।
अर्थात् ज्ञान ग्रहण करने वाले ब्राह्मचारियों, शिष्यों, शिक्षार्थियों के साथ ही ज्ञान देने वाले ब्राह्मणों, शिक्षकों गुरुओं में भी बढ़ता हुआ ज्ञान, स्वयं राष्ट्रीय ज्ञान के रूप में समृद्ध होता है। इस प्रकार इस समृद्धि को प्राप्त होता हुआ, राष्ट्र में फैलता हुआ, यह ज्ञान गुरु की, शिष्य की और राष्ट्र की भी उन्नति करता है।
2. क्षत्रिय- वर्ण योजना
क्षत्राय राजन्यम्।
क्षत्रं वै राजन्यः।
क्षत्रमेव तत्क्षत्रेण समर्द्धयति।
~यजुर्वेद (३०/५)
मंत्र का अर्थ जानने से पहले क्षत्र, क्षत्रिय और राजन्य पदों का अर्थ जानना चाहिए।
क्षण्यते हिंस्यते नश्यते पदार्थो येन स क्षतः (ऐतरेय ७/२२) अर्थात् चोट हानि और क्षति को क्षत कहते है। “क्षतात् त्रायते रक्षति इति क्षत्रम्” अर्थात् जो किसी भी प्रकार की क्षति से रक्षा करे वह क्षत्र है। क्षणु- हिंसायाम् तनादिधातु से ‘क्त’ प्रत्यय करने से क्षत शब्द सिद्ध होता है।
किसी विपत्ति से, प्रजा के रक्षण में सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य और राष्ट्र, क्षत्र हैं। “क्षत्रेण युक्तः क्षत्रियः” और ऐसे राष्ट्र की रक्षा में सम्प्रभुता सम्पन्न राजा, रक्षण कर्म में लगे हुए राज्य के सैनिक, अथवा प्रशासनिक कार्य में लगे हुए सभी कर्मचारी क्षत्रिय हैं।
जैसा कि श्रुति कहती है “क्षत्रं ‘हि राष्ट्रम्’ राष्ट्र ही क्षत्र है।’ इसके साथ हि जहाँ कही भी सम्प्रभुता सम्पन्न रक्षण करने का सामर्थ्य है, वह क्षत्र है। जैसे– “प्राणो हि वै क्षत्रम् । हैनं प्राणः क्षणितो: प्रक्षत्रमात्रमाप्नोति क्षत्रस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद”(शतपथ ब्राह्मण १४/८/१४/४)। अर्थात् प्राण हि क्षत्र है, यह प्राण चलता हुआ जीवन की रक्षा करता है, इसलिए यह क्षेत्र के प्रकृष्ट क्षत्रत्व को प्राप्त होता है।
जो कोई इस रहस्य को जानता है, वह राष्ट्र के साथ आत्मीय भाव से जुड़ता है, और लोगों की भावनाओं पर विजय प्राप्त करता है, अर्थात् लोगों का आत्मीय बन जाता है। इसी प्रकार शारीरिक क्षति से रक्षा करने वाला हृदय भी क्षत्र है। प्रायः लोगों का पालन और रक्षा करने के कारण पालक और रक्षक के लिए क्षत्र और क्षत्रिय शब्द का प्रयोग किया जाता है।
इसलिए श्रुति कहती है “प्रजापतिर्वै क्षत्रम् “(शतपथ ब्राह्मण ८/२/३/११)। प्रजा का पालन करने वाला प्रजापति राजा ही क्षेत्र है।
जो राष्ट्र रक्षा के अधिकार से प्रकाशित होता है, उसे राजन्य कहते हैं, इस व्युत्पत्ति से राजू दीप्तौ धातु से राजेरन्यः(उणादि सूत्र ३/१००)। इस सूत्र के द्वारा अन्यः प्रत्यय करने पर राजन्य शब्द सिद्ध होता है। अथवा इसी धातु से “कनिन् युवृशितक्षिराजिधन्विद्युप्रतिदिवः “(उणादि सूत्र १/१५६)। इस सूत्र के द्वारा कनिन प्रत्यय करने से राजन्य शब्द की सिद्धि होती है।
जो अपने दिव्य गुण, कर्म से प्रकाशित हो वह राजा है। राजन् शब्द से ‘राज वसुराद्यत्’ इस सूत्र के द्वारा ‘यत्’ प्रत्यय करके राजन्य शब्द बनता है। इस प्रकार से राजा का और राष्ट्र का कर्मचारी ही राजन्य होता है।
इसलिए राज्य कार्य के संचालन में समर्पित कर्मचारियों को राजन्य कहा जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि क्षेत्र तत्व मूलक ही राजन्य है। जैसा कि श्रुति कहती है “क्षत्रस्य वा एतद्रूपं यद्राजन्य: “(शतपथ १३/१/५/३), यह जो राजन्य है, यह राष्ट्र का ही प्रतीक है “ओजः क्षत्रं वीर्य राजन्यः “(ऐतरेय ८/२) ओज क्षत्र है, और सामर्थ्य राजन्य है।
अब इस मंत्र का अर्थ देखें :
क्षत्राय प्राणियों के प्रति आत्मीय भावना, सत्यनिष्ठा, न्याय नीति, चरित्र और सामर्थ्य के द्वारा लोगों की और राष्ट्र की रक्षा के लिए, उसी प्रकार मिथ्याचरण से, दुश्चरित्रता से, निष्ठुरता से पापों से समाज की रक्षा करने के लिए, एवं मिथ्याचारियों को दुश्चरित्रों को, निष्ठुरों को, पापियों को दण्ड देने के लिए, (राजन्यम्) इस प्रकार के कार्य सम्पादन में सक्षम एवं कुशल राजपुरुषों, क्षत्रियों अर्थात् सैनिकों को (आलभते) अच्छी तरह से प्राप्त किया जाता है, अर्थात् राष्ट्राध्यक्ष राजा, या इस प्रकार के लोगों का चयन करने के लिए बनायी गयी चयन समिति, सम्पूर्ण राष्ट्र से ऐसे योग्य लोगों का चयन कर इस कार्य में नियुक्त किया जाय।
अर्थात् राष्ट्र की रक्षा के लिए राष्ट्र-भक्तों की नियुक्ति की जाती है।
क्षत्रं वै राजन्यः निश्चय ही जो यह क्षत्र-रक्षण सामर्थ्य है वह ही प्रशासक का, राजपुरुष का, राजपुरुषत्व या क्षत्रिय का क्षत्रियत्व है।
क्षत्रमेव तत्क्षत्रेण समर्द्धयति”। इस पालन-रक्षण रूप क्षत्रिय कर्म के द्वारा जन-जन में पालन-रक्षण सामर्थ्य की समृद्धि होती है। वह इस प्रकार से जब कोई रक्षा करने वाला, किसी की किसी भी प्रकार के संकट से रक्षा करता है, तब जिसकी रक्षा की गयी है, उसमें रक्षा करने वाले के प्रति श्रद्धा जागृत होती है, और साथ ही रक्षा करने की भावना भी जागृत होती है।
राष्ट्र में रक्षा और न्याय की स्थापना होती है। दुराचरण, निष्ठुरता, और पाप मिटता है। इस प्रकार से राष्ट्र सत्य, न्याय, नैतिकता, रूप, रक्षण, धर्म से समृद्ध होता है। यह रक्षण कर्म अत्यन्त संवेदनामूलक है,इसलिए इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए राजा की प्रतिज्ञा का यह वेद वाक्य है- “आत्मा क्षत्रमुरो मम”(यजुर्वेद मा.सं.२०/७)
“रक्षण धर्म और राष्ट्र मेरा आत्मा है मेरा हृदय है।”
जैसा कि प्रारम्भ में ही यह विमर्श किया गया कि सृष्टि के प्रारम्भ में वर्ण विभाग नहीं था, आपस का ज्ञान ही आपसी व्यवहार का आधार था, इस ज्ञान के द्वारा ही आपसी व्यवहार चलता था, इस ज्ञान का सामूहिक उपयोग नहीं था, यह आपसी कुटुम्ब व्यवहार अतीव सीमित था।
इसलिए इस आत्मीय विज्ञान का सामूहिक लाभ प्राप्त करने के लिए, समाज के अभ्युदय के लिए, ज्ञानियों ऋषियों ने क्षेत्र तत्व की रचना की, इस विषय को शतपथ ब्राह्मण में इस प्रकार बताया गया है-
“ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकं सन्न व्यभवत्। तच्छ्रेयो- रूपमत्यसृजत क्षत्रम् । यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमः रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति । तस्माद्ब्राह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपासते, राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दघाति, सैष क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म । तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति, ब्रह्मैवान्ततः उपनिश्रयति स्वां योनिम् य उ एनं हिनस्ति स्वां स योनिमृच्छति। स पापीयान्भवति यथा श्रेयासं हिंसित्वा ।”(शतपथब्राह्मण १४/४/२/२३, बृहदारण्यक १/४/११)
सृष्टि की, संस्कृति की प्रारम्भिक दशा में लोगों के व्यवहार का साधन एक मात्र ब्रह्म अर्थात् ज्ञान ही था। ज्ञान के द्वारा ही पारस्परिक व्यवहार चलता था। वह ज्ञान प्रत्येक व्यक्ति का अलग-अलग होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति के अलग-अलग एकाकी कर्मप्रयास के द्वारा अपेक्षित वैभव को नहीं प्राप्त कर सका।
तब उस ज्ञानी समुदाय ने आपस में विमर्श से उदित ज्ञान के द्वारा समुदाय के हित की, अपेक्षा से, सम्पूर्ण समुदाय का अतिशय हित चाहते हुए, संवेदनामूलक हृदय प्रधान ज्ञान का जो अत्यन्त श्रेष्ठ रूप था, सबकी किसी भी प्रकार की क्षति से रक्षा करने की क्षमता एवं योग्यता के दृष्टिगत सम्पूर्ण समाज हृदय रूप क्षत्रम् – राष्ट्र, राजा और राजन्य की रचना की।
इस क्षेत्र और क्षत्रिय का प्रसिद्ध प्राकृतिक रूपकों के द्वारा श्रुति ज्ञान कराती है। ये जो लोक में प्रसिद्ध रक्षा करने वाले देव क्षत्रिय है, जैसे- इन्द्र अर्थात् जीवात्मा इन्द्रियों का अधिपति है, जैसे- वरुण जल में रहने वाले जलचर जीवों का अधिपति है, जैसे- चन्द्रमा रात्रि का अधिपति है, जैसे रुद्र, अर्थात् मुख्य प्राण इन्द्रिय और प्राणों का अधिपति है।
रुद्र की यह व्याख्या स्वयं श्रुति इस प्रकार करती है :
“कतमे रुद्रा इति । दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यद- स्मान्मर्त्याच्छरीरादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्रुद्रा इति।”(शतपथ. ११/६/३/७)
“कितने रुद्र हैं ? इस पुरुष में दश प्राण हैं, ग्यारहवाँ आत्मा है, इस प्रकार ग्यारह रुद्र हैं। मर्त्य शरीर से जब यह निकलने लगते हैं, तब रुलाते हैं, इसीलिए इन्हें रुद्र कहते हैं।”
जैसे पर्जन्य- बादल वनस्पतियों का अधिपति है, स्वामी है, जिस प्रकार यम अर्थात् संयम स्वास्थ्य का अधिपति है, जिस प्रकार मृत्यु रोगों का अधिपति है, और जिस प्रकार अन्तर्यामी परमात्मा सबका अधिपति है, जैसे ये सब क्षत्रिय राजा अपने पाल्यों का पालन करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्राध्यक्ष राजा को भी राष्ट्र व्यवस्था में नियुक्त पुरुषों, राजन्यों, क्षत्रियों- सैनिकों के द्वारा राष्ट्रहित के लिए बनाये गये नियमों के माध्यम से अपने शरीर की भाँति प्रजा का पालन करना चाहिए।
क्योंकि राष्ट्राध्यक्ष क्षत्रिय अर्थात् राजा सारी प्रजा को अपनी संन्तानों के समान देखता है, अपने शरीर के अंगों की भाँति देखता है, और उसकी रक्षा के लिए अपना जीवन भी लगाने को सन्नद्ध रहता है, इसीलिए श्रुति कहती है- ” तस्मात्क्षत्रात्परं नास्ति” इसीलिए क्षत्र अर्थात् राष्ट्र, राष्ट्ररक्षक राजा और राजन्य अर्थात् राष्ट्ररक्षा में नियुक्त कर्मचारी से श्रेष्ठ समुदाय कुछ भी नहीं है।
इसलिए ब्राह्मण भी ऐसे धर्म पालक राज्य सिंहासन के नीचे खड़ा होकर उसकी उपासना करता है। क्योंकि राष्ट्र रक्षक राजा और राष्ट्र रक्षा में लगा हुआ सैनिक रूप क्षत्रिय प्रजा का आत्मभूत है। राज्य के हित नियामक सत्कर्म रूप राजसूय यज्ञ में अपने ज्ञानात्मक यश की विद्वान् ब्राह्मण ऐसे क्षत्रिय में ही में स्थापना करता है।
इस प्रकार यह रक्षात्मक ब्रह्म अर्थात् ज्ञान ही राष्ट्र राजा और राजन्य रूप क्षत्रिय की उत्पत्ति का मूल है।
इसलिए यद्यपि राजा ज्ञान का हृदयरूप होने के कारण विद्वानों में भी सर्वश्रेष्ठ है, अन्त में अर्थात् राज्य कर्म निष्पादन के अनन्तर परमात्म- विज्ञान का ही आश्रय लेता है। क्योंकि उस परमात्मविज्ञान से ही उसकी उत्पत्ति हुई है। जो भी राजा या राज्य कर्मचारी अर्थात् क्षत्रिय इस जन- समुदाय को अपनी आत्मा के रूप में नहीं देखता है, अपने को शासक और प्रजा को शास्य समझता है, वह सभी प्राणियों में सर्वात्मरूप से विद्यमान परमात्मा की, ब्रह्म की हिंसा करता है।
जो राजा प्रजा को निम्न भाव से देखता है, प्रजा में परमात्मा को नहीं देखता, ऐसा राजा श्रेष्ठ सर्वात्मभाव की हिंसा करके पापी होता है, शरीर को ही आत्मा समझने के अहंकार के कारण। इस प्रकार से ऐसा राजा अपनी योग्यता का विनाश कर देता है और नष्ट हो जाता है।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि, जन समुदाय ने ही अपने विमर्शात्मक ज्ञान के द्वारा राष्ट्र, राजा और राज्य कर्मचारी रूप क्षत्रिय वर्ण की रचना किया, और समुदाय की रक्षा का विमर्श करने वाला समूह ही ब्राह्मण कहा गया। उन विमर्श करने वाले विद्वानों में जो सर्वश्रेष्ठ था, जिसमें सर्वाधिक समाज हित की संवेदना थी, उसे ही क्षत्रिय के रूप में, राजा के रूप में चुना गया।
मूल रूप से सभी लोग किसान थे, उन्हीं में से क्षत्रिय और ब्राह्मण का चयन किया गया, यह बात स्वयं श्रुति स्पष्ट कहती है :
“तस्माद् ब्रह्म च क्षत्रञ्च विशि प्रतिष्ठिते।”(शतपथ ब्राह्मण १२/२/७/१६।)
इसलिए ब्राह्मण और क्षत्रिय जन सामान्य में से ही चयनित होकर प्रतिष्ठित हुए हैं।
“विड्वै जनित्रम्”(तैत्तिरीय सं.५/३/३/४१)
निश्चय ही सामान्य कृषक समुदाय ही उत्पादक है। उसी से सभी वर्ण उत्पन्न हुए।
“विशामेवैकमेतत्पतिं करोति ।”(शतपथ ५/३/४/१० /)
एक मात्र प्रजा ही इस राष्ट्र के अधिपति का चयन करती है।
“ओजसैव वीर्य विश आदाय क्षत्रायापि दधदि । “(काठक संहिता २१/१० ।)
ओज के द्वारा ही प्रजा से वीर्य सामर्थ्य लेकर राष्ट्र, राजा और राजन्य में स्थापित किया गया।
“विशो राजानमुपतस्थुर्ऋग्मियम्” (ऋ०६/८/।
प्रजा ने ही राजा को स्थापित किया, यही सत्य है।
3. वैश्य-वर्ण योजना :
मरुद्भ्यो वैश्यम्”। विशो वै मरुतः। विशमेव तद्विशा समर्द्धयति ।(यजुर्वेद ३० / ५, शतपथ ३ / ६ / २ / १०) मंत्र का अर्थ करने से पहले विशु, वैश्य और मरुत् पदों का अर्थ समझ लेना चाहिए।
निघण्टु में विश् शब्द मनुष्य के नामों में पढ़ा गया है। विश् प्रवेशने धातु से “अन्येभ्योऽपि दृष्यते” (पा. अ. ३/२/१७८ ) इस सूत्र से “क्विप्” प्रत्यय करने से विश् शब्द बनता है। “विशन्ति अनुप्रविशन्ति सर्वकर्मसु- अधिकारित्वेन ये ते विशः” जो सभी कर्मों में अधिकार के साथ प्रवेश करते हैं, अथवा आवश्यकता अनुसार अनुप्रवेश करते हैं, वे सभी मनुष्य ही, कृषक ही विश् हैं।
पुनः विश् प्रवेशने धातु से “गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च ।”( पा. अ. ५/१/१२४) सूत्र से कर्म और भाव अर्थ में ष्यञ् प्रत्यय करके वैश्य शब्द बनता है।
“मृङ्-प्राणत्यागे”(पा.६ / ११३।) धातु से ‘मृग्रोरुति:’ (उणादिः १/९४) इस सूत्र से ‘उत्’ प्रत्यय करके ‘मरुत्’ शब्द बनता है। इस वृद्ध के बिना मरते हैं, अथवा यह मारता है। इस अर्थ में यह शब्द प्रयुक्त है। इससे शरीर में गमनागमन क्रिया के सामर्थ्य का संचार करने वाले प्राण, अपान, समान, ब्यान, उदान आदि ४९ वायुओं का ग्रहण किया जाता है।
शरीर में श्वास के रूप में, प्राण वायु के रूप में, यह मरुत् शरीर को जीवन देता है, और इसके बिना प्राणी समुदाय मृत्यु को प्राप्त होता है। इसलिए यह मरुत् जीवनदाता और मृत्यु- दाता दोनों ही है। मरुत् शब्द से ‘प्रज्ञादिभ्यश्च”(पा. अ. ५/४/३८) इस सूत्र से मरुत् शब्द के प्रज्ञादि गण में पठित होने के कारण ‘अण’ प्रत्यय होता है। और “अचोञ्णिति”(पा. अ. ७/२/११५/)
इस सूत्र से मरुत् शब्द के मकार के अकार को दीर्घ करने से मारुत् शब्द बनता है। कोशों में ‘मरुत्’ और ‘मारुत्’ शब्दों के निम्नलिखित अर्थ दिखाई देते हैं- “मरुतः स्पर्शनः प्राणः समीरो मारुतो मरुत्”(विक्रमादित्यकोश)
मरुत्, स्पर्शन, प्राण, समीर, मारुत्, मरुत् ये सभी शब्द पर्यायवाची है।
पुनः- “मारुतः श्वसनः प्राणः समीरो मारुतो मरुत् ।”(संसारावर्तकोशा)
मारुत, श्वसन, प्राण, समीर, मरुत् पर्यायवाची हैं। ३” इसी प्रकार श्रुति भी कहती है- “प्राणा वै मारुताः ।”(शतपथ ९/३/१/७)
निश्चय ही सभी प्रकार के प्राण ही मरुत् उत्पन्न होने वाले मारुत् “सप्त सप्त हि मारुता गणाः । “(शतपथ ९/३/१/२५/)
निश्चय ही सात-सात के सात गण ही मारुतृगण हैं । इस प्रकार से यह स्पष्ट है कि प्राणियों में संचरित हो रही जीवनदायी प्राणवायु को ही मरुत् और मारुत् पद से कहा गया है, न कि सामान्य वायु।
अब मंत्र का अर्थ समझें :
अन्नादि भोग्य पदार्थों के उत्पादन के लिए और उन पदार्थों की समग्र राष्ट्र में सर्वत्र उपलब्धि सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रकार के भोग्य पदार्थों की, संचार व्यवस्था के लिए कृषि और वाणिज्य की आवश्यकता है, इसी को श्रुति ने वैश्यवर्ण कहा है। कृषि के द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थों से ही जीवों का जीवन चलता है, इस प्रकार से खाद्य पदार्थ ही प्राणियों के प्राण हैं।
इसी तथ्य को भगवान वेद निश्चित करते हैं, “मरुद्भ्यो वैश्यम्” प्राणियों के प्राणात्मक अन्नादि आवश्यक वस्तुओं की सर्वत्र समुपलब्धि सुनिश्चित करने के लिए, राष्ट्राध्यक्ष राजा और उस प्रकार के कार्य संपादन करने के लिए गठित प्रशासनिक सभा, इस प्रकार के कर्म में मरुत् गणों की भाँति कुशल मानव समुदाय को ‘आलभते’ सम्पूर्ण राष्ट्र से भलीभाँति प्राप्त करती है, अर्थात् समाज व्यवस्था में संयुक्त करती है।
अभिप्राय यह है कि सम्यक् कृषि और वाणिज्य व्यवस्था के द्वारा आवश्यक वस्तुओं की सर्वत्र उपलब्धता शासन को सुनिश्चित करना चाहिए।
यहाँ इस तथ्य को ठीक-ठीक समझना चाहिए कि, सात-सात के वायु के सात समुदायों को श्रुति ने मरुद्गण बताया, अर्थात् ४९ प्रकार के प्राणवायु होते हैं। वह इस प्रकार से वृक्षों, वनस्पतियों के द्वारा छोड़ी जाने वाली वायु ही मनुष्य आदि चर जीवों की प्राणवायु है। इसी प्रकार मनुष्य, पशु आदि जंगमों के द्वारा छोड़ी जाने वाली अपानवायु वृक्षादि, वनस्पतियों की प्राणवायु है।
ये मरुद्गण वृक्षादि, वनस्पतियों की छोड़ी गयी अपानवायु आक्सीजन को मनुष्य, पशु आदि जीवों तक प्राणवायु आक्सीजन के रूप में लाते हैं, और मनुष्य पशु आदि जीवों से छोड़ी गयी अपानवायु (कार्बनडाईआक्साइड) को वृक्षों वनस्पतियों तक उनकी प्राणवायु (कार्बनडाईआक्साइड) के रूप में पहुँचाते हैं। इस प्रकार से यह मरुद्गण मानवादि जंगमों को प्राणवायु देते हुए वृक्षादि वनस्पतियों के लिए प्राणवायु पैदा कर रहा होता है, और वृक्षादि वनस्पतियों को उनकी प्राणवायु देता हुआ मनुष्यादि जंगमों के लिए प्राणवायु को उत्पन्न कर रहा होता है।
इस प्रकार से यह मरुद्गण सभी प्राणियों के द्वारा भोगा जाता हुआ भी नष्ट नहीं होता, बल्कि सभी प्राणियों को निरन्तर चेतना देता हुआ स्वयं ही चैतन्य चलता रहता है, क्योंकि एक प्रकार के प्राणियों का भोग ही दूसरे प्रकार के प्राणियों के भोग उत्पादन का रहस्य है। उपभोग में ही उत्पादन का रहस्य होने के कारण यह चैतन्य चलता हुआ, वायु भोगा जाता हुआ भी क्षीण नहीं होता है।
जैसे यह मरुद्गण सात-सात के सात गणों में सर्वत्र संचरित होता हुआ जीवन चेतना का नियामक है उसी प्रकार कृषि एवं पशुपालन से उत्पादित भोग्य वस्तुओं (अन्न, वस्त्र आदि) की सभी प्राणियों के अनुरूप यथायोग्य सभी वस्तुओं की सर्वत्र संचाररूप कृषि वाणिज्यात्मक वैश्य वर्ण व्यवस्था है।
वैसे ही मनुष्य और पशु आदि अन्न-जल का उपयोग करते हुए जिस मलमूत्र आदि का त्याग करते हैं, वही मलमूत्र आदि कृषि कार्य के लिए उर्वरक होता है, तथा कृषि में उत्पादित अन्न, शाक, घास, भूसा, पुवाल आदि आवश्यकतानुसार मनुष्य, पशु आदि प्राणियों का भोग होता है। इस प्रकार सभी प्राणियों के लिए अपेक्षित भोग्य पदार्थों का उत्पादन, और सम्पूर्ण राष्ट्र में यथावश्यक उनकी उपलब्धि की सुव्यवस्था ही राष्ट्र को वैश्यवर्ण से युक्त करना है।
“विशो वै मरुतः ” निश्चय ही सभी प्रणियों में प्रविष्ट चल रही प्राणवायु के समान प्राणदायिनी भोग्य वस्तुओं की संचार व्यवस्था द्वारा सर्वत्र सुलभता ही वैश्यत्व है।
“विशमेव तद्विशा समर्द्धयति’ इन भोग्य वस्तुओं के उत्पादन एवं संचरणात्मक कृषि और वाणिज्य कर्म के द्वारा उत्पादक किसान, उपभोक्ता जन सामान्य, और व्यापारी समृद्धि को प्राप्त करते हैं। इनकी समृद्धि में यह कृषि और वाणिज्य रूप में, समग्र राष्ट्र में संचरित हो रहा वैश्य कर्म ही समृद्धि को प्राप्त होता है।
इस प्रकार इस कर्म के द्वारा किसान व्यापारी और उपभोक्ता की समृद्धि में यह सम्पूर्ण राष्ट्र ही समृद्ध होता है।
4. शूद्र-वर्ण योजना :
तपसे शूद्रम्”
(शतपथ ९/३/१/२५/)
तपो वै शूद्रः।
तप एव तत्तपसा समर्द्धयति।।
(यजुर्वेद ३० / ५)
मंत्र का अर्थ करने के पहले शूद्र पद का अर्थ और तप पद का अर्थ विचार कर लेना चाहिए।
शोचतेर्ज्वलतिकर्मणः”(निघण्टु १/१६ ) इस ज्वलतिकर्मा शुच् धातु से ‘शुचेर्दश्च”(उणादि २/१९/) इस सूत्र से ‘शु’ के उकार को दीर्घ और ‘रक्’ प्रत्यय ‘और ‘द’ करने से शूद्र शब्द बनता है। “शोचति, ज्वलति, प्रकाशते, स्वश्रमेण यः सः शूद्रः।
जो अपने श्रम के द्वारा जलता है, प्रकाशित होता है, शूद्र कहा जाता है। उसी प्रकार से निघण्टु में कही गयी ‘तप ज्वलने’, ‘तप ऐश्वर्ये'(निघण्टु १/१७/) धातुओं से अपने ही अर्थ में ‘सर्वधातुभ्योऽसुन्'(उणादि ४ / १९०) सूत्र से ‘असुन्’ प्रत्यय करने से तप शब्द बनता है। “तापयति ज्वालयति अकर्मण्यतां शत्रून् वा येन तत्तपः”।
जिसके द्वारा अकर्मण्यता को और शत्रुओं को जलाया जाता है, वह तप है। अथवा “तप्यते समर्थो भवति येन तत्तपः” जिस श्रम के द्वारा अपने लक्ष्य को सिद्ध करने में व्यक्ति समर्थ होता है, वह श्रम ही तप है। क्योंकि श्रम से ही सामर्थ्य आता है, इसलिए श्रम ही तप है।
जैसा कि श्रुति कहती है- “तपसा वै लोकं जयन्ति।”(शतपथ ३/४/४/२७/)
तप के द्वारा ही, श्रम के द्वारा ही संसार की सभी वस्तुओं को जीत लिया जाता है।
“तद्धि जातं यत् तपसोऽधिजायते।” (काठकसं. ३४/१२/)
वही पैदा हुआ, जो तप से पैदा किया गया, श्रम से पैदा किया गया, अर्थात् अपने श्रम से पैदा किया हुआ अन्न-धन ही श्रेष्ठ उत्पादन है।
श्रुति के इसी तथ्य को लोकोक्ति में भी कहा जाता है—
“श्रम का खाता हूँ, दान का नहीं।”
अब मंत्र के अर्थ पर विचार करते हैं :
राष्ट्र की समृद्धि के लिए, कर्मों के उत्कर्ष के लिए, लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए, अन्न उत्पादन, संचरण, वितरण आदि कर्मों के अतिरिक्त, जीवन में आवश्यक शिल्पादि कर्मों के स्वतंत्र विकास के लिए, सभी कर्मों के आधारभूत जिस प्रकार के आवश्यक श्रेष्ठ श्रम की, तप की, आवश्यकता होती है, उस प्रकार के तप के लिए, उस प्रकार के तप श्रम करने की सामर्थ्य से सम्पन्न श्रमिक, तपस्वी अर्थात् शूद्र को राष्ट्राध्यक्ष राजा या उस प्रकार के कार्य को सम्पन्न करने के लिए गठित की गयी प्रशासनिक सभा (आलभते) भलिभांति प्राप्त करती है, अर्थात् उस प्रकार के कर्म में नियुक्त करती है।
“तपो वै शूद्रः।” “निश्चय ही, लक्ष्य प्राप्ति के लिए किया जाने वाला श्रम ही, तप ही, शूद्र है।”
“तप एव तत्तपसा समर्द्धयति।”
“उस तपस्वी के द्वारा किये जा रहे तप से, वह तप ही समृद्ध होता है।”
जिस कार्य को लक्ष्य करके तपस्वी श्रमिक, अर्थात् शूद्र के द्वारा जो तप श्रम किया जाता है, उस श्रम के द्वारा वह श्रमिक तपस्वी उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। अर्थात् वह कार्य सफल हो जाता है। इस तपस्वी-श्रमिक-शूद्र के द्वारा किये जा रहे तप अर्थात् श्रम से लक्ष्य की सिद्धि के साथ ही उस तपस्वी अर्थात् श्रमिक की समृद्धि होती है, राष्ट्र की समृद्धि होती है।
इस प्रकार कार्य की सिद्धि, तपस्वी श्रमिक की समृद्धि, राष्ट्र की समृद्धि, में यह तप ही समृद्ध होता है।
इस शूद्र वर्ण का क्या प्रयोजन है? ब्राह्मण वर्ण की व्यवस्था के द्वारा सभी लोगों की शिक्षा की व्यवस्था की गयी। क्षत्रिय वर्ण के द्वारा सभी लोगों के पालन, रक्षण और दुष्टों के लिए दण्ड की व्यवस्था की गयी। उसी प्रकार वैश्य वर्ण के द्वारा सभी भोग्य वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार की व्यवस्था की गयी।
सामान्य जन भी कृषक एवं वैश्य कहा गया है। इस प्रकार से सभी कर्मों की व्यवस्था होने के कारण इस शूद्र वर्ण का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता, ऐसी शंका का समाधान श्रुति स्वयं करती है।
“स नैव व्यभवत्स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमियं (पृथिवी) वै पूषेयं हीदं सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च।”(शतपथ १४/४/२/२५, बृहदारण्यक १/४/१३)
“सः ” – वह ज्ञानियों द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्ण की व्यवस्था से युक्त किया गया समाज “नैव व्यभवत्”- अपेक्षित वैभव को नहीं प्राप्त हो सका, क्योंकि कृषि के कार्य में हल और फाल की आवश्यकता होती है, दैनिक व्यवहार में बर्तन की आवश्यकता होती है, रक्षा करने के लिए शस्त्र आदि की आवश्यकता होती है।
वस्तुओं को लाने और ले जाने के लिए वाहन की आवश्यकता होती है, सबके लिए भवन, वस्त्र, आभूषण आदि की आवश्यकता होती है, यह सभी कार्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण में व्यवस्थित नहीं किये गये थे, इनकी सुव्यवस्थित व्यवस्था न होने के कारण केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्ण की संरचना से यह समाज अपेक्षित वैभव को नहीं प्राप्त कर सका।
इसलिए इस प्रकार की आवश्यकता की पूर्ति के लिए उस ज्ञानी विमर्शशील समुदाय ने, उस प्रकार के कार्य- सम्पादन में सक्षम “शौद्रं वर्णमसृजत” शौद्र वर्ण का गठन किया अर्थात् शौद्र – जो श्रम से उत्पन्न हो वह शौद्र है। ऐसे श्रम के द्वारा अपनी पहचान बनाने वाले, श्रम करने में समर्थ श्रमिक वर्ग अर्थात् शौद्र वर्ण की रचना की। शूद्र ही शौद्र है, अपने ही अर्थ में “अण्” प्रत्यय करने से आदि वृद्धि होकर शूद्र से शौद्र शब्द बना है।
अपने कुशल श्रम के द्वारा, उपर्युक्त हल, फाल, वस्त्र, आभूषण, घर आदि आवश्यकताओं की पूर्ति करता हुआ जो सभी लोगों की इन आवश्यकताओं का पोषण करता है, वही शौद्र वर्ण है। उस शूद्र वर्ण का प्राकृतिक दैवीय रूपक के द्वारा श्रुति ज्ञान कराती है। “इयं (पृथिवी) वै पूषा”- निश्चय ही यह पृथ्वी ही पूषा है। “इयं हीदं सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च'”- यह पृथ्वी ही इस सबका पोषण करती है, जो कुछ भी इस पृथ्वी पर है।
जिस प्रकार यह पृथ्वी सबका पोषण करती है, उसी प्रकार श्रम भी सभी कर्मों का पोषण करता है। और श्रमिक-शूद्र वर्ण भी सभी प्रकार के हल, फाल, पात्र, वस्त्र, आभूषण के द्वारा और उन-उन कार्यों में लग कर अपने शारीरिक श्रम के द्वारा सबका पोषण करता है।
इसलिए पृथ्वी देवता शूद्र वर्ण का उदाहरण है। श्रम ही सभी कर्मों का आधारभूत होने के कारण सभी कर्मों की प्रतिष्ठा है, इसलिए वैदिक राष्ट्रात्मा राजा सिंहासनारूढ़ होने से पहले अपनी शपथ में घोषणा करता है-
“पद्भ्यां जङ्घाभ्यां धर्मोऽस्मि, विशि राजा प्रतिष्ठितः।”(यजुर्वेद २० / ९)
“पाँवों और जाँघों से मैं धारण करने का सामर्थ्य धर्म हूँ, इसलिए प्रजा में प्रतिष्ठित राजा हूँ।”
इसी बात को श्रुति इस प्रकार कहती है :
“एषु लोकेषु प्रतितिष्ठति य एवं वेद।”(ताण्ड्य ६ / २ / ११)
“जो शूद्र वर्ण की संरचना के इस रहस्य को इस प्रकार जानता है, वह लोक में अपने सभी कर्मों में प्रतिष्ठित होता है।”
यह कैसे कहा जा सकता है कि सभी शिल्पों की स्वतंत्र स्थापना के लिए शूद्र वर्ण की रचना की गई? इस विषय में क्या प्रमाण है?
बताते हैं, वेद ही प्रमाण हैं, देखें ये वेद मंत्र :
“तपसे कौलालम्”(यजुर्वेद ३०/७१)
तप के लिए कौलाल को भलीभाँति प्राप्त किया जाता है : कुं मृत्तिकां लालयति इति कुलाकः, कुलालादेव कौलालः तम् कौलालम्.
अर्थात् जो मिट्टी के साथ खेलता है वह कुलाल है और कुलाल से ही कौलाल कहा गया। कुलाल अर्थात् कुम्हार श्रम करके तालाब की मिट्टी को अच्छी तरह तैयार कर फिर उस मिट्टी से चाक एवं दण्ड द्वारा अपने कलाकौशल से विविध प्रकार के बर्तन तैयार करता है।
इस मंत्र से वेद ने स्पष्ट कर दिया कि सभी शिल्प शूद्र वर्णविभाग के अन्तर्गत आते हैं : जैसे- कुलाल-कुम्हार आदि।





