अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

इतिहास को तोड़ मरोड़कर बदलने की कसरत 

Share

जूली सचदेवा (दिल्ली)

_आरएसएस वाले चालाकी से इतिहास को तोड़ते मरोड़ते हैं और मुगलों को हिन्दुओं पर जुल्म करने वाला बताते हैं._
    फिर ये संघी ज्यादा होशियारी दिखाते हुए नौजवानों को भड़काते हैं कि आज के मुसलमान उन्हीं जालिम मुगलों के वंशज हैं. इसलिए हम हिन्दुओं का इनसे नफरत करना जायज है.

असलियत में दोनों ही बातें झूठ हैं मुग़ल उतने ही जालिम थे जितने हिन्दू राजा थे. और उतने ही उदार भी थे जितने हिन्दू राजा थे.

औरंगजेब सवा मन जनेऊ देखने के बाद ही खाना खाता था संघी कहते हैं :
अरे मूर्खों चार ग्राम का एक जनेऊ होता है. तो सवा मन जनेऊ के लिए कितने ब्राह्मणों को रोज मुसलमान बनाया जाता होगा ¿
औरगंजेब का शासन 1658 से 1707 तक चला.
तो सवा मन याने पचास किलो जनेऊ उनचास साल तक तुलवा कर खाना खाया. यानि इतने ब्राह्मणों को मुसलमान बनाया तो 50 kg यानी 50 हजार ग्राम भाग दो 4 ग्राम से तो आया 12500 जनेऊ रोज.
अब इसे 49 सालों से गुणा करो 49 x 365 x 12500= 22.35 यानी बीस करोड़ पैंतीस लाख ब्राह्मणों को संघियों के मुताबिक़ औरंगजेब ने मुसलमान बनाया
जबकि आजादी के समय भारत की आबादी 36,करोड़ 10 लाख थी.

उस समय भारत की आबादी में 13.4 प्रतिशत ही मुसलमान थे यानी आजादी के समय भारत में कुल मुसलमान 4.83 करोड़ थे.
भारत के कुल 4.83 करोड़ मुसलमानों में ज्यादातर पुराने दलित हैं. जो बराबरी की तलाश में इस्लाम की शरण में गये ( नहीं मानते तो विवेकानन्द को पढ़ लो ). अब सवाल उठता है कि मुगलों के आने से पहले से मुग़ल काल खत्म होने तक ब्राह्मणों की आबादी उतनी ही रही?_
फिर ये मुसलमान बने हुए बाईस करोड़ बामन कहाँ से आये और कहाँ को गये?
इतिहास में ऐसा भी कहीं नहीं लिखा कि इन मुसलमान बन चुके बामनों ने कहीं दुसरे देश में शरण ली हो.
इस तरह आप देख सकते हैं कि यह आरएसएस वाले पूरी तरह शुद्ध गप्प को इतिहास कह कर फैलाते हैं.

अब असली मुद्दे की बात :
सच्चाई यह है की मुग़ल काल में भारत में भक्तिकाल का विकास हुआ. कृष्ण का बाल रूप प्रेमी रूप मुग़ल काल में ही कविताओं और कथाओं में लोकप्रिय हुआ.
कई मुस्लिम कृष्णभक्त कवि भी हुए और जम कर कृष्ण भक्ति करी.
मानुस हों तो वही रसखान बसों ब्रज गोकुल गाँव की ग्वारन जैसी कृष्णभक्ति की कविताएँ लिखी.

मुग़लकाल में ही रामचरित मानस लिखी गई. तुलसीदास तो राम का चारित्र लिखते थे और मस्जिद में सोते थे. विनय पत्रिका में तुलसीदास खुद लिखते हैं मांग के खईबो मसीत ( यानी मस्जिद ) को सोइबो , ना लेबे को एक ना देबे को दुई.

और अब बिलकुल असली बात :
आज अट्ठारह सौ सत्तावन के गदर शुरू होने का दिन है. जब सारे देश से गदर के सिपाही इकठ्ठा हुए तो वो किसके पास गये कि अब आप हमारे राजा बनिये.
गदर के सिपाही ज्यादातर हिन्दू थे. लेकिन वे किसी हिन्दू राजा के पास नहीं गए. वो मरण प्राय आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफर के पास पहुंचे और कहा उठो अब तुम हमारे बादशाह हो.
अब संघियों से पूछिए झूठों अगर मुग़ल जालिम थे तो गदर के सिपाही बिस्तर पर पड़े मुग़ल के पास क्यों गये थे?

असलियत दूसरी ही है. फैलाई दूसरी जा रही है. इस देश की तहजीब,इस देश की जुबान, इस देश की सोच में सब शामिल हैं.
सब इस मुल्क के हैं यह मुल्क सबका है. सब इससे मुहब्बत करते हैं. लेकिन संघी इस मुल्क से मुहब्बत नहीं करते.
वो नफरत फैलाते हैं और मुल्क को कमजोर करते हैं. आइये गदर के वक्त की यकजहदी को बरकरार रखने का अहद लें और इन नफरत फ़ैलाने वालों से हमेशा संघर्ष करते रहने का वादा करें.
{चेतना विकास मिशन}

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें