स्त्री के मन की गहराई
स्वयं स्त्री ही जाने
आ जाए यदि हृदय किसी पर
फिर न किसी की माने ।।
स्त्री का है रूप कुछ ऐसा
अपनी ओर सबको खींचे
चाहे कितना बड़ा साधक हो
एक पल न आँखें मींचे ।।
स्त्री जब पतिव्रता हो जाती
पति ऊंचाई पाता
जब वो व्यभिचारी बन जाए
सब रसातल में जाता ।।
चरित्र देश ने उत्तम माना
जो चरित्रवान बन जाए
गिर जाये चाहे भले गोबर में
फिर भी कीमत पाये ।।
एक पुरुष नारी के मन को
कभी नहीं पढ़ पाया
नारी का है रूप विचित्र
मादक ममता माया ।।
नेह रागिनी, कवियत्री, ग्वालियर

