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वैश्विक फलक : विश्व-चेतना से विश्वासघात

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डॉ. प्रिया मानवी

 _दो तरह के जीवन होते हैं। एक वह, जो सुख-चैन के लिए होता है, दूसरा वह जो किसी बड़े लक्ष्य के लिए स्वयं को होमने के लिए होता है। पहले वाले जीवन का तर्क यह है- और जैसा कि मनुष्य की मूलभूत-वृत्ति भी है- कि हमें सुखमय जीवन बिता लेना चाहिए, हरसम्भव ख़ुश रहने की कोशिश करनी चाहिए, जीवन का जितना रस ले सकें ले लेना चाहिए, सारे स्वाद चख लेना चाहिए। इसके पीछे यह धारणा है कि छोटा-सा जीवन है, इसमें मन बहल जाए और मज़े से गुज़र हो जाए तो इससे अधिक क्या चाहिए।_
      इसके विपरीत जो किसी अज्ञात किंतु महान प्रयोजन के लिए स्वयं को ख़र्चते हैं- वो सोचते हैं कि अगर किसी व्यक्ति ने आजीवन सुख भोग भी लिया और तमाम ख़ुशियां हासिल भी कर लीं तो वैसे जीवन का भी अंत में योगफल क्या हुआ? आख़िर में क्या वह भी उसी तरह वाष्पीभूत होकर विलीन नहीं हो जावेगा, जैसे कि उससे पहले अरबों व्यक्तियों का जीवन कुछ ऐसे विलीन हुआ है, मानो वे कभी थे ही नहीं, या थे तो किसी अफ़वाह या साये की तरह थे, जो खो गए?
   _क्या सृष्टि के इतिहास में उस चेतना की कोई भूमिका दर्ज की जावेगी? सबसे मुख्य प्रश्न तो यही है कि आख़िर मनुष्य के जीवन का प्रयोजन क्या है? सुख भोग लेना या इस जीवन से कुछ काम लेकर एक महान लक्ष्य को साध लेना? और वह महान लक्ष्य क्या हो सकता है?_
       जो दार्शनिक या अन्वेषी क़िस्म के लोग होते हैं, उनके भीतर नियति की एक अश्रव्य-सी पुकार भी जन्म से ही मौजूद रहती है। दूसरे उसे अनुभव नहीं कर पाते। क्योंकि वो जीवन को एक जीवनकाल की अवधि से अधिक नहीं देख पाते, जिसमें उन्हें- लगभग किसी बाध्यता की तरह- तमाम सुख-सुविधाओं को भोगकर और अपनी संतानों को जन्म देकर, उन्हें जीवन में प्रतिष्ठित कर गुम हो जाना है। लेकिन ब्रह्माण्ड ने मनुष्य के भीतर मनन करने और अनुभूत करने की क्षमता क्यों पैदा की थी?

क्या यह एक आकस्मिक संयोग था या इसके पीछे कोई अमूर्त प्रयोजन था? आप परिकल्पना कर सकते हैं कि कदाचित् किसी महाचेतना ने मनुष्यों को अपने अनुषंग के रूप में रचा और उन्हें यह ज़िम्मेदारी सौंपी कि वे चेतना के नित-नूतन सोपान तय करें और एक समेकित-प्रयास के रूप में उस महाचेतना के आरोहण को सम्भव बनावें। किंतु मनुष्य ने अपना जीवन हँसी-ठट्ठे, मित्र-गोष्ठी, खान-पान, चर्चा-चकल्लस में गँवा दिया।
इतना ही नहीं, उसने उस दार्शनिक या अन्वेषी को हेयदृष्टि से भी देखा, जो एकाग्रचित्त होकर अपने उस काम में जुटा था, जिसका समेकित-लक्ष्य चेतना के नए आयामों को आलोकना था। उन्होंने उस पर आक्षेप भी किया कि वैसे जीवन का क्या अर्थ, जिसमें आपने सुख ही नहीं भोगे? किंतु जीवन सुख भोगने के लिए है, यह विश्वास उसे कहाँ से मिला? क्या इसका कोई आधार था?
आप पाएँगे कि सृष्टि ने वैसा कोई लक्ष्य मनुष्य के सामने नहीं रखा है कि उसे एक जीवनकाल में तमाम सुखों को भोगना ही है। यह तो मनुष्य के भीतर से ही उठी एक ललक और लिप्सा और वृत्ति है। इसका ऐंद्रिक और भौतिक परिप्रेक्ष्य है। किंतु चेतना के इतिहास में इसका क्या मोल है?

कल्पना कीजिये कि सृष्टि की चेतना का समूचा विस्तार एक ग्राफ़ की तरह है, जिसमें हम ऊर्जा की एक सीधी समतल रेखा को देख पा रहे हैं। सहसा एक जगह पर हम उस ग्राफ़ में एक उछाल देखते हैं।
वह उछाल क्या है? क्या वह किसी मनुष्य के द्वारा भोगा गया कोई वैसा एकान्तिक सुख है, जिसने सृष्टि को उस बिंदु पर ऊर्ध्वगामी बनाया है, या वहाँ पर किसी के द्वारा ऐसे विचार की प्रस्तावना की गई है, जिसने सहसा मनुष्य की चेतना की यात्रा को एक सदी आगे पहुँचा दिया है। और उसकी वजह से वहाँ पर आपको एक क्वान्टम लीप दिखलाई देती है।
एक महान छलाँग, जिसने समय के भीतर सेतु बना दिए हैं। संसार में आज तक जितने भी महान-विचार उत्पन्न हुए हैं, जितने भी ग्रेट आइडियाज़ और फ़िलॉस्फ़िकल-नोशंस हैं, वे वहीं हैं- और यह मेरी निजी आस्था है- जिन्होंने चींटी की चाल से रेंग रही मनुष्य की चेतना को सहसा किसी क्षण में एक ऊँचाई प्रदान की है और उसके जीवन को सार्थकता दी है- अन्यथा जीवन का, जीते चले जाने का, अपने आपमें कोई प्रयोजन दिखलाई नहीं देता है।
तॉल्सतॉय ने कुछ सोचकर ही कहा होगा कि “इत्मीनान और चैन तो मानसिक अधमता है, मनुष्य को छटपटाना चाहिए, निरन्तर संघर्ष करना चाहिए।”
जिनके भीतर नियति की एक पुकार होती है, वे अपने शरीर, अपने प्राण, अपने जीवन, अपनी समूची यात्रा को एक उपकरण की तरह देखते हैं, जिससे उन्हें एक लक्ष्य को साधना है। वे सुख को भी वैसी एक युक्ति की तरह लेते हैं, जो उनके काम को कदाचित् सरस बनावेगा, किंतु सुख भोग लेना उनका मक़सद नहीं।
सुख का संस्थानीकरण करना तो तब दूर की बात है। सुख उनके लिए एक ऐंद्रिक-स्फुरण है, जो लहर की तरह आकर बीत जाएगा। उन्हें उसे भोगकर उससे अलग हो जाना है। कदाचित् वह भोग भी उनके लक्ष्य में बाधा ही है। वस्तुत: जीवित रहना ही एक बाधा है- चेतना के लिए देह बनकर जीना कष्टकारी ही होगा।
जबकि उन्हें वैसे ग्रेट-आइडियाज़ की खोज में ख़ुद को खपाना है, जो चेतना के सार्वभौमिक इतिहास में टिमटिमाएँगे, हिस्ट्री ऑफ़ कॉस्मिक-कॉन्शियसनेस में बिजली की बत्ती की तरह ब्लिन्क करेंगे, जिनके होने से यूनिवर्सल-ग्राफ़ में उथल-पुथल होगी, वर्टिकल-रेखाएँ निर्मित होंगी, जो हॉरिज़ॉन्टल-सतह पर चल रहे एकरस-सुखमय जीवन का समकोण पर प्रतिकार करेंगी।

मेरा स्पष्ट मत है कि लेखक, चिंतक, दार्शनिक, कलाकार की ना केवल यह नियति है, बल्कि नैतिक-ज़िम्मेदारी भी है कि वह अपने जीवन को एक साधन की तरह उपयोग में लाकर वैश्विक-चेतना के प्रति अपनी महान ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करे और स्वयं को उसमें झोंक दे।
और अगर कोई लेखक, कलाकार, दार्शनिक होकर भी हँसी-ठट्ठे, दोस्ती-यारी, मौज-मस्ती, सुख-चैन वाली ज़िंदगी बिता रहा है, तो वह समय के एक छोटे से खण्ड में लोकलुभावन भले हो जावे, किंतु वैश्विक-चेतना के आयामों में उसे विश्वासघाती की ही संज्ञा दी जावेगी!
(चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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