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किसान परिवारों के माथे पर चिंता की लकीरें….मजदूर खोजने पर भी नहीं मिल रहे

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प्रदेश में चुनावी माहौल चरम पर है। लोकतंत्र के इस सबसे बड़े उत्सव को लेकर जहां चारों तरफ उत्साह का माहौल देखने को मिल रहा है, वहीं इस चुनाव ने कई किसान परिवारों के माथे पर चिंता की लकीरें उभार दी हैं। दरअसल, खेतों में फसलें लहलहा रहीं हैं। धान कटने को तैयार हैं। खरीदी भी शुरू हो गई है। लेकिन, किसानों को खोजे मजदूर नहीं मिल रहे। कारण, मजदूरी। चुनावी प्रचार के लिए प्रत्याशी एक व्यक्ति को 500 से 600 रुपए दे रहे हैं। जबकि, खेतों में एक दिन की मजबूरी 250 रुपए तक होती है। 300 रुपए रोजी देने की बात कहने पर भी लोग खेतों में काम करने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। धान कटाई में पसीना बहाकर कम पैसे कमाने के बजाय मजदूर ‘नेताजी’ के साथ चुनाव प्रचार में आगे-पीछे खड़े होकर ज्यादा पैसे जो कमा ले रहे हैं। साथ में दावत और गाड़ी में घूमने का मौका अलग। नतीजतन किसानों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। आलम ये है कि मजदूर न मिलता देखकर किसान अपने परिवार के सदस्यों के साथ ही खेतों में फसलों की कटाई में जुट गए हैं। बता दें कि इलाके में व्यापक तौर पर खेती होती है। इसलिए यहां कामगारों की संख्या भी हजारों में है। आम सालों में मजदूरों की संख्या इतनी अधिक होती है कि सस्ती कीमत पर भी मजदूर मिल जाते हैं। लेकिन, इस बार विधानसभा चुनावों ने स्थिति बदलकर रख दी है।

मजदूरी इतनी मांगी कि खुद ही काम करने लगे
सोमवार को परिक्षेत्र के एक किसान मुकेश यादव तपती धूप में धान की कटाई करते दिखे। साथ में परिवार की कुछ महिलाएं और बच्चे भी थे। बात करने पर उन्होंने पसीना पोंछते हुए कहा, खेत में धान पके खड़े हैं। मजदूर मिल नहीं रहे। कुछ राजी भी हुए तो मजदूरी इतनी मांग रहे हैं कि उससे अच्छा खुद ही काम कर लो। ऐसे में परिवार के सदस्यों के साथ लग गए हैं। यही हालात दूसरे गांव में भी है। किसान रघुवीर राम अपने भाई और बच्चों के साथ धान काटने में लगे हैं। उनका कहना था, वैसे तो कंबाइन से धान कटवा लेते। लेकिन, इससे पैरा नहीं मिलेगा। पैरा नहीं मिला तो जानवरों को क्या खिलाएंगे? ऐसे में खुद ही धान काट रहे हैं। थोड़ा समय लगेगा, लेकिन नुकसान नहीं होगा। यही हाल नरेश, सीतारामचंद्र और संत का भी था, जो मजदूर न मिलने के कारण खुद ही परिवार के साथ मिलकर धान काटने में व्यस्त हैं।

कार्यकर्ता अब पहले जैसे नहीं करते काम
प्रत्याशियों के साथ उनके नाते-रिश्तेदारों भी समर्थन जुटाने का प्रयास करते हैं। जनसंपर्क के दौरान पार्टी के झंडे, बैनर, स्टीकर चिपकाने व घर-घर में अपील करने के लिए लोगों की जरूरत पड़ती है। पहले ये काम कार्यकर्ता स्वेच्छा से करते थे। अब समय बदल गया है। समर्थक व कार्यकर्ता भी प्रत्याशी के साथ क्षेत्र के लोगों के सामने हाथ जोड़कर ये बताते हैं कि नेताजी अपने खास हैं। इन्ही को वोट देना। अपना हर काम करेंगें।

इधर, नगर के लोगों को भी हो रही है परेशानी
मजदूरों के चुनाव प्रचार में लग जाने से नागरिक भी परेशान हैं। प्रमुख ठीये पर मजदूर खोजने से नहीं मिल रहे हैं। जो मिल रहे हैं, वे साफ-सफाई व रंग-रोगन के लिए मुंहमांगी कीमत मांग रहे हैं। मजदूरों का कहना है, अभी चुनावी सीजन है। कम मेहनत में मजदूरी भरपूर मिल रही है। मुफ्त में चाय-पानी के साथ खाने का इंतजाम भी हो जाता है। ऐसे में मेहनत का काम कराना है तो मजदूरी भी ज्यादा देनी होगी।

Ramswaroop Mantri

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