*नेताजी ने समाजवादी आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की*
*- डॉ सुनीलम*
नेताजी मुलायम सिंह यादव की आज 87 वीं जयंती है। देशभर में आज समाजवादी पार्टी के कार्यालयों में कार्यक्रम आयोजित किए गए । जिसे भी नेताजी के साथ काम करने का मौका मिला उन्होंने अपने संस्मरण सांझा किए, जिनसे नेताजी के बहुआयामी व्यक्तित्व को जाना समझा जा सकता है।
जब भी मैं नेताजी के बारे में सोचता हूं तब मुझे लगता है कि यदि व्यक्ति दृढ़ संकल्पित हो तो सभी रूकावटों को दूर कर अपने उद्देश्य की ओर बढ़ सकता है। सैफई गांव के एक साधारण परिवार में जन्म लेकर शिक्षक की नौकरी और पहलवानी करते हुए देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश का तीन बार मुख्यमंत्री, एक बार देश का रक्षा मंत्री बनना कोई साधारण बात नहीं है।
यह सर्वविदित है कि एक बार ऐसा समय आया जब प्रधानमंत्री के तौर पर उनका नाम लगभग तय हो गया था।
इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारतीय लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था में अभी भी समाजवादी विचार के लिए संभावनाएं बाकी है।
17 मई 1934 को आचार्य नरेंद्र देव, लोकनायक जय प्रकाश नारायण, डॉ राम मनोहर लोहिया आदि 100 समाजवादियों ने नासिक जेल में लिए गए निर्णय के अनुसार कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन कांग्रेस पार्टी के भीतर 90 वर्ष पहले किया था। आजादी के बाद समाजवादी 1948 में कांग्रेस पार्टी से अलग हुए तब से लेकर 1977 तक सोशलिस्ट पार्टी देश में अलग अलग नाम से काम करती रही। जयप्रकाश जी की प्रेरणा से लोकतंत्र की बहाली के लिए जनता पार्टी के गठन होने के बाद 50 वर्ष पहले सोशलिस्ट पार्टी का पृथक अस्तित्व समाप्त हो गया।
जनता पार्टी के टूटने के बाद जनसंघ ने भारतीय जनता पार्टी बना ली लेकिन समाजवादियों ने सोशलिस्ट पार्टी को पुनर्जीवित नहीं किया। लेकिन 1992 में यानी 33 वर्ष पहले मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन किया। यह पार्टी देश के सबसे बड़े उत्तर प्रदेश में अब तक चार बार सरकारें बना चुकी है।
समाजवादी पार्टी आज देश में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है जिसके लोकसभा में 37 और राज्य सभा में 4 सदस्य है।
समाजवादियों का मजाक लगातार यह कहकर उड़ाया जाता है कि वे न तो ज्यादा समय एक रह सकते हैं और न ही अलग , लेकिन नेताजी की समाजवादी पार्टी ने पिछले 33 वर्षों में बिना बड़ी टूट के पार्टी चलाकर इस मिथक को खत्म करने का काम किया है, जिसमें मुलायम सिंह यादव की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
डॉ लोहिया ने पिछड़े वर्गों के लिए एक नारा दिया था जिसे देश भर के समाजवादी लगभग रोज दोहराते हैं – सोशलिस्टों ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ’ । मुलायम सिंह यादव आजीवन इस सूत्र पर चलते रहे। उन्होंने सामाजिक न्याय की राजनीति को हर स्तर पर न केवल स्थापित किया बल्कि विस्तार भी किया।
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संविधान सम्मान बताए जाने के बाद लोगों को लगा था कि अब सामाजिक न्याय पर बहस समाप्त हो जाएगी लेकिन नेताजी ने दलितों की आवाज बनकर उभरे काशीराम को इटावा से चुनाव जितवाकर सामाजिक न्याय की राजनीति को एक नया आयाम दिया। नेताजी के इस प्रयोग से सांप्रदायिक ताकतों को रोका जा सका।
अखिलेश यादव ने बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनावी समझौता कर दूसरी बार इसे आगे बढ़ाया। अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी की पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की एकजुटता पर आधारित राजनीति को व्यापकता प्रदान करते हुए डॉ लोहिया के विचारों के आधार पर बनी समाजवादी पार्टी को बाबा साहब के विचारों के साथ जोड़ने का महत्पूर्ण कार्य किया, उन्होंने बाबा साहेब के साथ काशीराम को भी समाजवादियों के बीच स्थापित किया।
आज समाजवादी पार्टी द्वारा डॉ लोहिया के साथ-साथ बाबा साहेब अंबेडकर, नेताजी और काशीराम को विशेष स्थान दिया जाता है। इसके नतीजे भी निकले हैं।
समाजवादी पार्टी के 41 सांसदों में अधिकतर सांसद सामाजिक न्याय की धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
नेताजी ने फूलन देवी को चुनाव लड़वाकर और जितवाकर अपनी प्रतिबद्धता जिस तरह साबित की थी उसी तरह अखिलेश यादव ने अयोध्या की सामान्य सीट से दलित नेता अवधेश प्रसाद को चुनाव लड़वाकर और जितवाकर अपनी प्रतिबद्धता साबित की है।
नेताजी पर तमाम लोग जातिवादी होने का आरोप लगाते हैं लेकिन यह सर्वविदित है कि उनके नजदीकी साथियों में जनेश्वर मिश्र, कपिल देव सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खान, भगवती सिंह, रामशरण दास, माता प्रसाद पाण्डेय ,
बृजभूषण तिवारी, मोहन सिंह, किरणमय नंदा , राजेंद्र चौधरी, अंबिका चौधरी, रामगोविंद चौधरी, अमर सिंह जैसे गैर यादव समाजवादी साथी रहे हैं ।
नेताजी का एक बड़ा योगदान सांप्रदायिक ताकतों का पूरी ताकत लगाकर बिना सत्ता की चिंता किए मुकाबला करना था। उन्हें मुल्ला मुलायम और हिंदुओं का हत्यारा कह कर समाज में अलग-थलग करने का प्रयास हुआ लेकिन वे न डरे, न झुके और न ही उन्होंने कोई समझौता किया। संविधान की पुस्तक को बिना प्रदर्शित किये उन्होंने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए सत्ता को लात मार दी।
तमाम लोग यह कहते हैं कि वे सैफई केंद्रित है। सही भी है इसके साथ उन्हें यह भी कहना चाहिए कि नेताजी ने सैफई जैसे गांव में जो सुविधाएं उपलब्ध कराई वैसा सुविधायुक्त गांव देश का कोई भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री आज तक नहीं बना सका। सैफई में वे सालाना कवि सम्मेलन कराया करते थे और रात भर कवियों के साथ मंच पर भी बैठते थे।
पहली बार नेताजी ने यूपीएससी की परीक्षाओं में जब हिंदी को जोड़ दिया तब बड़े पैमाने पर वंचित वर्ग के लोगों को अफसर बनने का मौका मिला जैसा अवसर कर्पूरी ठाकुर ने अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म कर बिहार के वंचितों को दिया था।
समाजवादी चिंतक अरुण त्रिपाठी जी कहते है कि नेताजी ने समाजवाद के दर्शन को समाजवादी कार्यक्रमों के माध्यम से सगुण रूप देकर जनता के बीच ले जाने का काम किया।
विशेष तौर पर शिक्षा और स्वास्थ्य और वंचित वर्गों के लिए
विभिन्न योजनाएं लागू की।
*नेताजी से जुड़े कुछ अविस्मरणीय किस्से*
नेताजी की खासियत उनकी कार्यकर्ताओं से आत्मीयता थी। कार्यकर्ताओं की वे किसी भी स्तर पर जाकर मदद किया करते थे। नेताजी की संगठन पर जबरजस्त पकड़ रहती थी क्योंकि वे मंत्रियों या पदाधिकारों के माध्यम से नहीं , सीधे कार्यकर्ताओं से संबंध रखते थे।
नेताजी का पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ संचार तंत्र अत्यंत मजबूत रहता था।
तीन बार मुख्यमंत्री बनने और रक्षा मंत्री बनने पर तथा अधिकतर समय विपक्ष में रहने के बावजूद भी उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं का साथ नही छोड़ा। यही कारण है कि एक बार नेताजी से जो भी कार्यकर्ता मिला वह उनका होकर रह गया।
निम्नलिखित किस्सों से यह और स्पष्ट हो सकता है।
• नेताजी के प्रिय साथी पांच बार सांसद रहे बृजभूषण तिवारी जी का जब अचानक देहांत हो गया, खबर पाते ही वे अस्पताल पहुंचे तथा शरीर पर लेप लगवाने और हेलीकॉप्टर से बस्ती भिजवाने का इंतजाम करके चले गए। मैं जब वहां पहुंचा तो मैंने प्रोफ़ेसर उदय प्रताप जी को सुझाव दिया कि लंबे समय तक बृजभूषण जी दिल्ली में रहे हैं, उनके पार्थिव शरीर को समाजवादी पार्टी कार्यालय में रखा जाना चाहिए। प्रोफेसर साहब ने कहा कि मैं नेता जी से बात करता हूं। नेताजी ने तुरंत मेरा सुझाव मान लिया। पार्थिव शरीर समाजवादी पार्टी कार्यालय दिल्ली लाया गया, जहां लगभग सभी पार्टी के नेताओं एवं केंद्र सरकार के मंत्रियों और उपराष्ट्रपति ने आकर उन्हें पुष्पांजलि दी।
• मुझे याद है जब मैंने डॉ. लोहिया के जन्म शताब्दी वर्ष पर युसूफ मेहेरअली सेंटर और राष्ट्र सेवा दल के 30 युवाओं के साथ देश भर की सप्तक्रांति विचार यात्रा निकाली थी तब उन्होंने कानपुर में शिवपाल जी को भेजा। अंबिका चौधरी जी, नीरज जी को बलिया में यात्रा की अगवानी के लिए भेजा। कानपुर में शिवपाल जी आए, उन्होंने पार्टी की तरफ से यात्रा के लिए पांच लाख रुपए देने की घोषणा की लेकिन यात्रा के लिए यह नियम तय किया गया कि किसी से भी 50 हजार से ज्यादा नहीं लिया जाएगा। इसलिए मैंने साढ़े चार लाख रूपये वापस किया।
• एक बार जब जॉर्ज फर्नाडीज ज्यादा बीमार हुए और उन्हें अचानक हरिद्वार रामदेव बाबा के पास ले जाया गया, तब मैंने नेताजी से कहा कि आप बाबा से बात कीजिए । उन्होंने तुरंत फोन लगाकर कहा कि जॉर्ज साहब मेरे नेता है उनका ख्याल रखना, उन्हें 15 दिन में ठीक करके भेजना। बाबा ने कहा कि मैं उन्हें दौड़ा दूंगा । तब नेता जी ने हंसते हुए कहा कि तुम दौड़ा पाओ या ना दौड़ा पाओ लेकिन अगर जॉर्ज साहब को कुछ हो गया तो मैं तुम्हें दौड़ा दूंगा।
• पार्टी के सम्मेलन और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के अनुभवों से स्पष्ट होता है कि नेताजी में अपने साथियों ,पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की बात सुनने की अटूट क्षमता थी। 2 दिन की कार्यकारिणी की बैठक में वे शुरुआती वक्तव्य और समापन के समय वक्तव्य देते थे। यदि कोई उनसे बीच में बात करने आता था तब भी वे बैठक के बाद या लंच के समय बात करने के लिए कहा करते थे। ऐसा सम्मेलनों में हुआ करता था।
शायद मैं ऐसा अपवाद हूं जिसकी प्रस्तुति के बाद नेताजी ने माइक हाथ में लेकर टीका टिप्पणी की हो । हुआ इस तरह कि पटना के राज्य स्तरीय अधिवेशन में मैंने कहा कि दिल्ली का रास्ता मध्य प्रदेश से होकर गुजरता है। मेरी शिकायत थी कि आप मध्यप्रदेश में समय नहीं देते। उन्होंने मेरे हाथ से माइक लेकर कहा कि बताइए कब से समय चाहिए। मैंने 1 जनवरी की तारीख मांगी, जब टीकमगढ़ के समाजवादी नेता गौरी शंकर शुक्ला जी की पुण्यतिथि थी। उन्होंने टीकमगढ़ आने की तत्काल घोषणा कर दी।
इसके बाद का वाकया और भी दिलचस्प है। कार्यक्रम तय हो जाने के बाद उत्तर प्रदेश के कुछ बड़े नेताओं ने कहा कि टीकमगढ़ में कार्यक्रम प्रभावशाली नहीं हो पाएगा इसलिए कार्यक्रम को रद्द कर देना चाहिए। नेता जी ने मुझे फोन करके कहा कि मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है, बुखार है, बाद में कार्यक्रम करेंगे। मैंने उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह जी का एक किस्सा सुनाया जिसमें वे दिल्ली के वीपी हाउस लॉन में डायलिसिस के बीच में, दोनों पैर फैक्चर होने के बाद भी स्ट्रेचर पर कार्यक्रम में शामिल हुए थे। नेताजी ने कहा कि ठीक है, मैं आऊंगा। मेरे प्रस्ताव पर यह तय हो गया कि आप बोलिएगा नहीं केवल हाथ हिलाकर हेलीकॉप्टर से चले जाइएगा। नेताजी पृथ्वीपुर आए, खेत में लक्खू जैन के घर के सामने हेलिकॉप्टर उतारा गया। मैंने जाकर उनका स्वागत किया। नेताजी मंच पर आए तब मैंने मंच से कहा कि नेताजी की तबीयत ठीक नहीं है, वे केवल वायदे पूरे करने आए हैं, बाद में विस्तार से बात करेंगे। नेताजी ने कहा कि मैं 5 मिनट बोलता हूं। नेताजी के नाम से, जो हजारों लोग सुनने आए थे उनके बीच उन्होंने जब लगातार बोलना शुरू किया तब मैंने उनके बगल में खड़े होकर कई बार रोकने-टोकने की कोशिश की तो वे मुझे हाथ से अलग हटा देते थे। मुझे लग रहा था कि कहीं तबीयत ज्यादा न बिगड़ जाए इसलिए मैं बार-बार टोक रहा था। तब उन्होंने कहा कि आप लोगों का उत्साह और संख्या देखकर मेरा बुखार उतर गया है। और तब उन्होंने पूरे 45 मिनट तक भाषण दिया।
• नेताजी के साथ यदि मैं बैठा हूं और कोई जब उनसे मिलने आता था तब वे मेरा परिचय कराए वक्त कहते थे डॉ सुनीलम गजब का संघर्ष करते वाले समाजवादी हैं, इन्होंने डी लिट किया है।
अतिथि के जाने के बाद मैं नेताजी से कहता था मैं केवल पी एच डी हूं , नेताजी कहते थे, मैं जानता हूं लेकिन लोगों को मालूम पड़ना चाहिए कि आप बहुत विद्वान हैं।
फिर नेताजी ने कहा कि मेरी एक बार पहली बार चुनाव जीतने के बाद डॉ लोहिया ने प्रशंसा की तो देखो मैं तीन बार मुख्यमंत्री बन गया। मैं तुम्हारी प्रशंसा करता रहता हूं फिर भी तुम मुझसे लड़ते रहते हो।
यह थी नेताजी की कार्यकर्ताओं को जोड़ रखने की शैली !
• नेताजी ने एक बार देर रात फोन करके कहा कि मामा बालेश्वर दयाल की दो फोटो आप लेकर लखनऊ आइए। मैं राजेश बैरागी के साथ पहुंचा । उन्होंने फोटो कार्यालय में लगवाई।
• अमरसिंह जी ने एक बार सीधे-सीधे राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मुझ पर बड़ा आरोप लगा दिया। उन्होंने कहा कि कार्यकारिणी में एक ऐसा व्यक्ति भी बैठा है, जो मुझे जेल पहुंचाने का षड्यंत्र कर रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को पार्टी से निकाला जाना चाहिए। उन्होंने नेताजी को धमकाते हुए कहा कि यदि मैं जेल जाऊंगा तो आप भी नहीं बचेंगे। असल में अमरसिंह जी पूर्व विधायक किशोर समरीते की शिकायत कर रहे थे, क्योंकि उन्होंने पार्टी के चुनाव प्रचार के लिए राशि को छापा डालकर पकड़वाने की कोशिश की थी। किशोर को पार्टी से निकाल दिया गया। मैंने पर्ची लिख कर भेजी यह ठीक नहीं हुआ।
उन्होंने कहा अमरसिंह से बात कर लो। मैंने बात की, किशोर से माफी मंगवाई ,पार्टी से बर्खास्तगी वापस हो गई । नेताजी ने किशोर की पीठ ठोककर कहा – पार्टी के सभी नेताओं का सम्मान करना सीखो!
नेताजी अपने निर्णय को बदलने में भी कभी पीछे नहीं हटते थे यदि उन्हें यह भरोसा हो जाता था कि उन्हें किसी कार्यकर्ता द्वारा दिया गया सुझाव बेहतर या उपयुक्त है।
• अन्ना आंदोलन के दौरान जब मैं पार्टी का राष्ट्रीय सचिव था, तब मैंने प्रयास किया कि समाजवादी पार्टी, अन्ना आंदोलन का समर्थन करे। नेताजी ने कहा कि समाजवादी पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने में सक्षम है,
उसे किसी दूसरे संगठन की जरूरत नहीं है। मैंने पूछा मैं आंदोलन के शामिल हूं । तब उन्होंने कहा – आपको किसने रोका है। तब मैं अन्ना आंदोलन में सक्रिय रहा तथा मुझे अन्ना आंदोलन की कोर कमेटी में शामिल किया गया।
• एक बार बैतूल जिले के पाथाखेड़ा में मुझे मारने की मंशा से मेरी मोटरसाइकिल को टक्कर मारी गई, पैर का पूरा मांस बाहर निकल गया तथा गैंगरीन का संक्रमण हुआ। नेताजी को इस बात का पता चला तो उन्होंने मिलने पर मेरे हाथ को सिर पर रख कर कहा कि मैंने अपने बहुतों को खोया है, मैं तुम्हें नहीं खोना चाहता। अब कभी मोटरसाइकिल से और डिब्बी जैसी मारुति से नहीं चलना। मैंने कहा- नेताजी जीप नहीं हो तब! उन्होंने कहा – मैं आज ही नई जीप का इंतजाम करता हूं। हालांकि तब मैं विधायक बन चुका था। जीप मैंने बैंक से फाइनेंस करा ली थी इसलिए नेताजी से लेने की जरूरत नहीं पड़ी।
• इसी तरह एक बार जब मुलताई गोली चालन को लेकर मुझ पर चल रहे मुकदमें में फैसले निर्णायक दौर में चल रहे थे, तब नेताजी चिंतित हो गए। उन्होंने कई बार मुझसे कहा कि मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हें षड्यंत्र करके सजा दी जाएगी। तुम कुछ करो! हर बार मैं कहता था कि निर्णय तो न्यायालय को करना है, मैं क्या कर सकता हूं? तब वे शिवपाल जी का किस्सा सुनाते थे, जब उन्हें हत्या के मामले में झूठा फंसा दिया था। मैं उनसे कहता था कि जैसे आपने शिवपाल जी की मदद की थी, वैसी मेरी कीजिए। तब उन्होंने मेरे केस लड़ रही एडवोकेट आराधना भार्गव को बुलाया, केस समझा तथा कुछ बड़े वकीलों से बात की लेकिन इस बीच मेरे ही 24 किसानों के शहीद होने के बावजूद मुझे ही 52 वर्ष की सजा सुनाई गई। तब नेताजी ने अखिलेश जी को कहकर जमानत कराने के लिए आर्थिक मदद की थी
• कई बार जब मेरी पुलिस से भिड़ंत हो जाती थी। मैं नेताजी को बतलाता था तब वे मेरा हाथ पकड़ कर कहते थे कि मैंने बहुत साथियों को खोया है तुम्हें खोना नहीं चाहता। क्यों पुलिस से ज्यादा भिड़ते हो कभी भी एनकाउंटर कर देंगे।
✍🏻 डॉ सुनीलम
पूर्व विधायक, पूर्व राष्ट्रीय सचिव
समाजवादी पार्टी
8447715810

