,मुनेश त्यागी
अभी दो दिन पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजपथ की जगह, इसका नाम बदलकर कर्तव्यपथ रख दिया है और इसके द्वारा भारत की जनता को यह संदेश दिया जा रहा है कि अब वे अपने अधिकारों और हकों को भूल जाएं। अब वे जनता से कह रहे हैं कि जनता रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य न्याय महंगाई गरीबी रोजगार प्रदूषण रहित जीवन और जल के अधिकारों की मांग ना करें।
किसान अपनी मांगों को भूल जाएं, मिनिमम सपोर्ट प्राइस की बात ना करें, फसलों के वाजिब दाम की बात ना करें, किसानों के लिए जो तीन कानून बनाए गए हैं उनका विरोध ना करें। तमाम मजदूरों, कर्मचारियों और शिक्षकों से कहा जा रहा है कि वह अपने हक अधिकार भूल जाएं। उन्होंने जो 36 कानून भारत की आजादी के बाद, अपने हक और अधिकारों के लिए बनवाए थे, उन्हें भूल जाएं और उनसे कहा जा रहा है कि हमने मजदूरों के लिए जो चार श्रम संहिताएं बनाई हैं,यानी मजदूरों और कर्मचारियों के लिए जो आधुनिक गुलामी के 4 दस्तावेज तैयार किए हैं, उनका पालन करें, उनके हिसाब से काम करें।
यहीं पर छात्रों से कहा जा रहा है कि वे सस्ती, मुफ्त, आधुनिक और अनिवार्य शिक्षा की बात ना करें। नौजवानों से भी कहा जा रहा है कि वे सबको काम, सबको मकान, सबको स्वास्थ्य, सबको रोजगार की मांग को भूल जाएं और पिछले दशकों से जो कर्मचारियों और अधिकारियों के पद खाली पड़े हैं, उन्हें भूल जाएं, उन्हें भरने की बात ना करें। औरतों से भी कहा जा रहा है कि औरतें अब औरत विरोधी मानसिकता और सोच को खत्म करने की बात और मांग ना करें। उनका सदियों से जो काम रहा है, उसे ही करें। उनसे कहा जा रहा है कि वह घरों में रहें और अपने पतियों की सेवा करें।
वकीलों और वादकारियों से कहा जा रहा है कि वह सस्ते और सुलभ न्याय की मांग और बात ना करें, वे 5 करोड़ मुकदमों के पहाड़ को शीघ्रता से निर्णित करने की बात ना करें, वे मुकदमों के अनुपात में जज नियुक्त करने की बात ना करें, वे 80 फ़ीसदी खाली पड़े बाबू के पदों को भरने की बात ना करें, बस न्यायालयों में जाएं और अधिकांश मामलों में तारीख पर तारीख के बाद तारीख लेकर अपने घर आ जाएं।
अब राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्यपथ कर दिया गया है। मोदी सरकार द्वारा ऐसे प्रदर्शित किया जा रहा है कि मानो सरकार ने कोई जंग जीत ली हो। यहां पर यह जानना जरूरी है कि राजपथ का नाम अंग्रेजों ने नहीं, बल्कि भारत की सरकार ने 1947 और 1950 में संविधान लागू होने के बाद, रखा था। यह किसी गुलामी की पहचान नहीं थी जिसे सरकार आज गुलामी की पहचान बता रही है।
यह पथ हमें याद दिलाता था कि भारत की सरकार संविधान और कानून के तहत काम करेगी, जनता की सेवा करेगी, उसके अधिकारों की रक्षा करेगी, उसके बुनियादी हक दिलवाएगी और वह केवल और केवल लुटेरे पूंजीपतियों की सेवक और सरकार ही बनकर नहीं रह जाएगी। कर्तव्यपथ के नाम पर जनता से कहा जा रहा है, इशारों इशारों में उसे बताया जा रहा है कि अब अधिकारों और हकों की बातें भूल जाओ, अब बिना किसी हक और अधिकार के अपना कर्तव्य करो, यानी पूंजीपतियों और धन्ना सेठों की गुलामी करो, उनकी सेवा करो, अपना न्यूनतम वेतन मत मांगो, मजदूरों के हित में बनाए गए कानूनों को लागू करने की बात मत करो। आप अपने हक और अधिकार भूल जाओ और पूंजीपतियों की सेवा में लग जाओ।
दूसरे इस अवसर पर सुभाष चंद्र बोस का नाम बड़े जोर शोर से लिया गया है। स्मरण रहे कि इस मौके पर सुभाष चंद्र बोस के परिवार का कोई सदस्य वहां मौजूद नहीं था। सुभाष चंद्र बोस तो भारत में जनवादी, वर्णविहीन, वर्ग विहीन, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, गणतंत्र कायम करना चाहते थे। सबको रोटी कपड़ा मकान हवा जल शिक्षा रोजगार उपलब्ध कराना चाहते थे, जातिवाद और वर्णवाद का खात्मा चाहते थे।
वे हिंदू मुस्लिम एकता के सबसे प्रबल हामी थे। उन के सबसे पक्के दोस्त आबिद हसन और हबीबुर्रहमान थे, जो सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु के समय उनके साथ थे। उन्होंने सिंगापुर में जो अंतरिम सरकार बनाई थी उसमें चार हिंदू और मुसलमान थे। सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस का अध्यक्ष रहते हुए हिंदू महासभा r.s.s. और मुस्लिम लीग के लोगों पर सांप्रदायिक होने की बात कहकर, उन्हें कांग्रेस की सदस्यता देने से मना कर दिया था।
उन्होंने भारतीयों की रक्षा और विकास के लिए योजना आयोग के गठन की बात की थी। मोदी सरकार सुभाष चंद्र बोस की तमाम नीतियों और सपनों के भारत को खत्म कर, सुभाष बाबू के सपनों के भारत को रौंद दिया है। अब वह किस मुंह से सुभाष चंद्र बोस का नाम ले रही है? आज वह सुभाष चंद्र बोस के सपनों की सबसे बड़ी कातिल बन गई है।
कर्तव्यपथ की बात एक-दो दिन की घटना नहीं है। हम पिछले दो-तीन महीनों से r.s.s. के अंध भक्तों की बात सुनते आ रहे हैं। बात बात में उनका कहना है कि अब अधिकार भूल जाओ, हकों अधिकारों को याद मत रखो, आप सिर्फ और सिर्फ कर्तव्यों की बात करो। हमने कई रिटायर्ड जज और कई सारे वकीलों को ऐसा कहते सुना है।
इस प्रकार यह कर्तव्यपथ की बात उछाला जाना, एक बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा है, जिसकी आड़ में मोदी सरकार भारत के संविधान का शिकार करना चाहती है। जनता के बुनियादी अधिकारों और हकों की बात करने को, भूल जाने की सलाह देती है। इस सब की आड़ में जनता के तमाम हकों और अधिकारों को छीनने की मुहिम जारी हो चुकी है क्योंकि मोदी सरकार पूंजीपतिरथ” पर सवार हो चुकी है और अब भारत की तमाम जनता किसानों मजदूरों छात्रों नौजवानों और महिलाओं को गुलामी के पथ पर आगे ले जाया जाएगा। अब उनका काम केवल और केवल पूंजीपति वर्ग और सवर्णों की गुलामी और सेवा करना रह जाएगा।





