अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

‘ट्रेड – डील’ में सोयाबीन की बदहाली:भारत के किसानों के लिए संकट

Share

अरविंद सरदाना

अमरीका के साथ हुई हाल की ‘ट्रेड-डील’ के बारे में जितना, जो कुछ पता चल रहा है उससे उजागर हो रहा है कि यह ‘डील’ भारत के किसानों के लिए भांति-भांति के संकट खड़े करेगी। सोयाबीन उनमें से एक है।‘ट्रेड – डील’ में सोयाबीन की बदहाली पर बता रहे है

भारत–अमेरिका के बीच प्रस्तावित ‘ट्रेड डील’ में यह दावा किया गया है कि खेती और किसान हित पूरी तरह सुरक्षित हैं, लेकिन जब हम इसके प्रावधानों की तह में जाते हैं, तो तस्वीर उतनी साफ़ नहीं दिखती। सतह पर सुरक्षा का आश्वासन है, पर बारीकियों में कई ऐसे प्रावधान छिपे हैं जो किसानों, विशेषकर सोयाबीन उत्पादकों के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं।

केवल सोयाबीन के संदर्भ पर ध्यान केंद्रित करें तो दो ऐसी आयातित वस्तुएँ हैं, जो यदि अमेरिका से भारत में बड़े पैमाने पर प्रवेश करती हैं, तो देश के किसानों को भारी नुकसान पहुँचा सकती हैं। इसमें पहला है, ‘डीडीजीएस’ (डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सोल्यूबल्स)। यह इथेनॉल उत्पादन प्रक्रिया (मुख्यतः मक्का) से बचा हुआ एक उच्च प्रोटीन और पौष्टिक उप-उत्पाद है, जिसका उपयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है। यह फाइबर, प्रोटीन और वसा से भरपूर होता है, जो मवेशियों, पोल्ट्री और मछली के लिए एक बेहतरीन आहार है।

अमेरिका में मक्का से बड़े पैमाने पर इथेनॉल का उत्पादन होता है जिसके निर्माण के बाद जो अवशेष बचता है, वह एक प्रकार की खली होती है। अब तक भारत में इसे अनुमति नहीं दी गई थी, क्योंकि इससे देश में उत्पादित सोयाबीन खली के बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। यदि सस्ती दरों पर ‘डीडीजीएस’ का आयात होता है, तो पशु-आहार उद्योग घरेलू सोयाबीन खली की जगह इस आयातित विकल्प को प्राथमिकता देगा। इसका सीधा असर सोयाबीन की मांग और कीमतों पर पड़ेगा, जिससे किसानों की आय प्रभावित होगी। सबसे बडी चिंता यह है कि अमेरिका में उत्पादित अधिकांश मक्का ‘जीएम’ यानि अनुवांशिक रूप से संशोधित है। भारत में ‘जीएम’ खाद्य एवं फीड पर सख्त प्रतिबंध और नियामक नियंत्रण हैं। ऐसे में ‘डीडीजीएस’ का आयात न केवल आर्थिक, बल्कि जैव-सुरक्षा और नीतिगत प्रश्न भी खड़े करता है।

दूसरा, कच्चा सोयाबीन तेल। यदि अमेरिका से कच्चा सोयाबीन तेल आयात कर केवल भारत में उसका रिफाइनिंग किया जाता है, तो इसका लाभ प्रसंस्करण उद्योग को तो मिल सकता है, परंतु घरेलू सोयाबीन उत्पादकों को नहीं। इससे भारतीय किसानों द्वारा उत्पादित सोयाबीन की खपत और कीमत दोनों प्रभावित होंगी।

सोयाबीन की स्थानीय खली के मुकाबले आयातित ‘डीडीजीएस’ सस्ता पड़ता है। इस कारण इसका पशु-आहार में उपयोग बढ रहा है। अभी तक इन दोनों में घरेलू बाज़ार में कुछ प्रतिस्पर्धा है। अमेरिका से आयात के बाद यह प्रतिस्पर्धा बहुत तेज हो जाएगी, क्योंकि यह और भी सस्ता होगा। अभी आयात पर कोटा लगाया गया है – केवल 5 लाख टन ही आयात कर सकते हैं, परन्तु एक बार दरवाज़ा खोल दिया, तो यह बढ़ता ही जाएगा।

यह चिंताजनक है, क्योंकि देशी सोयाबीन का बाज़ार मूल रूप से बदल गया है। कारखाने पहले अधिकमात्र में इसका निर्यात करते थे, अब उनका 80% बाज़ार घरेलू माँग से पूरा होता है। अमेरिकी ‘डीडीजीएस’ आयात से सोयाबीन खली का भाव गिरेगा। खली का भाव गिरते ही मंडी में सोयाबीन का भाव गिरेगा। इस पर ध्यान देना चाहिए कि सोयाबीन तेल और उसकी खली जुड़वा उत्पाद हैं। वज़न के हिसाब से सोयाबीन में तेल केवल 20% है, बाकी खली है। कारखाने के लिए मूल्य के हिसाब से देखें तो खली के कारण 60% आय होती है। वर्तमान परिस्थिति में कारखाने देशी खली को घरेलू बाज़ार में ही बेच पाएँगे। निर्यात के मौके सीमित हैं। अमेरिका की खली का आयात सोयाबीन के भाव को कमज़ोर करेगा। इसे रोकना चाहिए।

अमेरिका से आयात की अनुमति सूची में सोयाबीन तेल को जोड़ा गया है। सोयाबीन के कच्चे तेल के आयात पर अभी 16ꓸ5% आयात शुल्क लगता है। अमेरिका से आयात करने पर क्या शुल्क होगा, अभी सौदेबाज़ी की स्थिति में है। यदि अमेरिका के लिए आयात-शुल्क कम कर दिया तो इसका गंभीर प्रभाव होगा।

सोयाबीन तेल के व्यापार का ढाँचा बहुत नाज़ुक मोड़ पर है। भारत में सोयाबीन तेल की खपत का एक हिस्सा घरेलू कारखानों से आता है और यह 30 से 40 प्रतिशत ही है। ये कारखाने, किसानों से सोयाबीन खरीदते हैं और तेल का उत्पादन करते हैं। बाकी 60 प्रतिशत, कच्चे सोयाबीन तेल को आयात करके उसे रिफाइन कर, घरेलू बाज़ार में बेचा जाता है। वर्ष 2024-25 का आंकड़ा देखें तो हमने केवल 17 लाख टन तेल का उत्पादन किया और 55 लाख टन आयात किया है। हम आयात पर निर्भर हैं, न कि अपने किसानों और सोयाबीन तेल निकलने के कारखानों पर।

तेल बनाने वाले कारखाने लगभग 60 प्रतिशत क्षमता पर चल रहे हैं। तेल की माँग है, पर ये कारखाने अपने को सीमित रख रहे हैं, क्योंकि सोयाबीन की खली का बाज़ार संकुचित हो गया है और वर्तमान आयात शुल्क कम है जिससे रिफाइनरी वालों को फायदा है। खाद्य तेल का भाव और सोयाबीन आयात को सीमित रखने में संतुलन की ज़रूरत है। किसान और उपभोक्ता दोनों का हित देखना चाहिए। इस परिस्थिति में यदि अमेरिका से सस्ता, कच्चा सोयाबीन तेल आयात किया, जो वर्तमान आयात शुल्क से भी कम होगा तो यह कारखानों को बहुत बुरी तरह प्रभावित करेगा। तेल का भाव गिरेगा और कारखाने अपनी माँग और कम कर देंगे। इसका सीधा असर सोयाबीन के भाव और उसकी खेती पर होगा। यदि मंडी भाव 3000 से 3500 पर आ जाए तो इससे उबरना संभव नहीं होगा। यहां भावान्तर भी नहीं चलेगा।

अमेरिका की व्यापार नीति अक्सर ऐसी मानी जाती है कि वह सीधे टकराव के बजाय “पीछे के दरवाज़े” से बाज़ार में पैर जमाने की कोशिश करती है—धीरे-धीरे अपने उद्योगों के लिए रास्ता बनाते हुए। ऐसे प्रयासों पर सतर्कता और आवश्यक नियंत्रण ज़रूरी है, परंतु केवल रोक से बात नहीं बनेगी। सोयाबीन उद्योग एक नाज़ुक मोड़ पर है। उसे उभरने के लिए चाहिए कि देशी खली का बाज़ार बढ़े और इस पर शोध किया जाए। भारत की देशी खली ‘जीएम’ मुक्त है और कई देशों में इसकी माँग बढ़ सकती है।

एक विडंबना है कि सोयाबीन प्रोटीन युक्त है और हमारे देश में प्रोटीन की कमी है, पर हम इसे अपने खान-पान में पर्याप्त शामिल नहीं कर पा रहे हैं। बाज़ार बढ़ाने के लिए सोयाबड़ी का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। साथ ही सोया आटे को अन्य आटे में मिलाया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या “खेती को सुरक्षित रखने” का आश्वासन केवल एक औपचारिक वाक्य है, या वास्तव में किसानों के हितों की रक्षा के लिए ठोस सुरक्षा प्रावधान भी मौजूद हैं? ‘ट्रेड डील’ केवल व्यापार का दस्तावेज़ नहीं होती — वह लाखों किसानों की आजीविका, बाजार संरचना और खाद्य सुरक्षा की दिशा तय करती है। इसलिए आवश्यक है कि सोयाबीन जैसे संवेदनशील कृषि उत्पादों के संदर्भ में हर प्रावधान को पारदर्शिता और दूरदर्शिता के साथ रखा जाए।

Ramswaroop Mantri

Add comment

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें