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स्वतंत्रता के पिचहत्तर वर्ष का गौरव

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शशिकांत गुप्ते

15 अगस्त 2022 को देश की स्वतंत्रता को 75 वर्ष पूर्ण ही जाएंगे। लगभग दो सौ वर्षों तक बरतानिया हुकूमत ने देश को गुलाम बनाकर रखा।

असंख्य स्वतंत्रता सैनानियों की शहादतें असंख्य देशभक्तों का संघर्ष, असंख्य देशप्रेमियों ने यातनाएं भोगी। असंख्य लोग जेल गए।

इन पिचहत्तर वर्षो में हमनें क्या खोया क्या पाया? इस व्यवहारिक और अहम प्रश्न का उत्तर ज्ञात करने की कोशिश कर रहा था?

उक्त प्रश्न का जवाब ज्ञात करने में स्वयं को जब अक्षम समझा, तब सीधे सीतारामजी के पास गया।

सीतारामजी मेरा प्रश्न सुनकर पहले तो ऐसे मुस्कुराएं मानों मैने मूर्खतापूर्ण प्रश्न पूछ लिया हो? पश्चात सीतारामजी अपनी व्यंग्यकार की मानसिकता में आ गए।

सीतारामजी ने कहा सन 1947 से 2014 तक के इतिहास को शून्य बताने वालों को स्मरण करवाना है कि, सन 1947 से पूर्व और सन 1947  के बाद लगभग दो दशक तक पट्टी और पेम,टाक और दवात के साथ पुस्तकों को कपड़े के थैले में रख कर पढ़ाई करने वाले Commissioner आयुक्त, Collector जिलाध्यक्ष, इंजीनियर,प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और केंद्रीय और राज्य मंत्रियों के सचिव बने है। भूगोल पर प्रगति हुई। 

आज हम आजाद हैं। हमारी स्मृति क्षीण हो गई। हम अंगेजो के अत्याचार को भूल गए। अंग्रेजों ने ना सिर्फ हमें गुलाम बनाया बल्कि हमारी संस्कृति को भी भ्रष्ट्र करने की साज़िश भी की। आज हम अंग्रेजों को कोसने के अपने देश को सौहाद्र को कमजोर कर रहें हैं।

आंग्ल भाषा,हमें पाश्चात्य  अंधानुकरण को आत्मसात करने में सहयोगी बनी।

फैशन की दौड़ में हम शीर्षस्थ स्थान प्राप्त करने में अग्रसर हैं।

देश की युवतियों ने धूम्रपान, और मद्यपान को अपना Status symbol मतलब प्रतिष्ठा का प्रतीक बना लिया है। युवक अपनी केशसज्जा के प्रति 

अतिउत्साहित हैं। सिर के बालों को विभिन्न आकर प्रकार के बनवाकर गौरवाविन्त हो रहें हैं।

Psychology मनोविज्ञान के चिकित्सकों के लिए, यह खोज का विषय बन गया है कि, सिर बाह्य सज्जा चाहे जैसी हो सिर में दिमाग नाम का अवयय है या नहीं?

भारतीय संस्कार यह सिखातें हैं कि,कभी भी अपने कर्तव्य से भागना नहीं चाहिए, मतलब पीठ नहीं दिखाना चाहिए। आज तो पीठ दिखाना फैशन हो गया है?

1947 के बाद हमने तीन युद्ध लड़े। स्वतंत्रता प्राप्ति के मात्र पन्द्रहवर्ष के बाद। सन 1962 में चीन के साथ युद्ध हुआ।

चीन युद्ध के समय सभी देशवासियों ने देशप्रेम स्वाभाविक रूप से जागृत हो गया था। आश्चर्य की बात यह है कि,उस को समय किसी भी देशप्रेमी को राष्ट्रवादी होने का प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं होती थी।

सन 1962 में युद्ध के समय फ़िल्म कलाकरों,गीतकारों और संगीतकारो ने भी देशभक्ति के गीत प्रस्तुत किए थे।

गीतकार *जान निसार अख्तरजी* ने यह गीत लिखा था। यह गैर फिल्मी गीत फिल्मकारों पर फिल्माया और देश के समक्ष प्रस्तुत किया था।

*एक है अपनी ज़मीं, एक है अपना गगन*

*एक है अपना जहां, एक है अपना वतन*

*अपने सभी सुख एक हैं, अपने सभी ग़म एक हैं*

*आवाज़ दो, आवाज़ दो हम एक हैं, हम एक हैं*

*ये वक़्त खोने का नहीं, ये वक़्त सोने का नहीं*

*जागो वतन ख़तरे में है, सारा चमन खतरे में है*

*फूलों के चेहरे ज़र्द हैं, ज़ुल्फ़ें फ़िज़ा की गर्द हैं*

*ये है हिमाला की ज़मीं*, *ताज-ओ-अजंता की ज़मीं*

*संगम हमारी आन है, चित्तौड़ अपनी शान है*

*गुल्मर्ग का महका चमन, जमुना का तट, गोकुल का बन*

*गंगा के धारे अपने हैं, ये सब हमारे अपने हैं*

*कह दो कोई दुश्मन नज़र, उठे न भूले से इधर*

*उठो जवानां-ए-वतन, बाँधे हुए सर से कफ़न*

*उठो दकन की ओर से,* *गंग-ओ-जमन की ओर से*

*पंजाब के दिल से उठो, सतलुज के साहिल से उठो*

*महाराष्ट्र की खाक से, दिल्ली की अर्ज़-ए-पाक से*

*बंगाल से गुजरात से, कश्मीर के बागात से*

*नेफ़ा से, राजस्थान से, कुल खाके हिन्दोस्तान से*

इस गीत की कुछ पंक्तियां तो आज भी प्रासंगिक लगती है।इस गीत में गीतकार ने सम्पूर्ण भारत *कच्छ से कटक और काश्मीर से कन्याकुमारी तक एक है।* यह सशक्त संदेश दिया है।

सीतारामजी ने कहा अनेकता में एकता ही भारत की पहचान है।

आज देश जो कुछ हो रहा है, बहुत ही चिंतनीय है।

यह कहते हुए सीतारामजी ने कहा हमें तो देशभक्ति का परिचय देतें हुए स्वतन्त्रता के 75 वर्ष पर गर्व करना है। हमें भारतीय भाई भाई का नारा बुलंद करना है। 

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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