सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक व्यवस्था ने देश की अर्थव्यवस्था को बचाया
इंदौर। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के डॉ सुराजीत मजूमदार ने कहा है कि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से पूरे विश्व में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। इस प्रक्रिया में हालत में जो बदलाव हुआ है उसके चलते हुए भारत भी अपने हितों को सुरक्षित नहीं रख सकेगा। बावजूद इसके वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक व्यवस्था ने देश की अर्थव्यवस्था को बचाए रखा।
श्री सुराजी मजूमदार रविवार कोअभिनव कला समाज सभागृह में एमपी बैंक ऑफिसर से संगठन के 11 वें अधिवेशन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वर्ष 2008 में विश्व में आर्थिक संकट की शुरुआत हुई थी। इस समस्या का भारत में ज्यादा असर नहीं पड़ा था। अन्य देश इस समस्या से ज्यादा प्रभावित हुए। हमारे देश के सार्वजनिक बैंकों ने देश को इस संकट से सुरक्षित रखा। वर्ष 2008 से लेकर आज तक में स्थिति में परिवर्तन हो गया है। अब बैंकिंग सेक्टर में भी निजी क्षेत्र का हिस्सा ज्यादा हो गया है और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की संख्या भी, यह चिंता का विषय है।
श्री मजूमदार ने कहा कि वर्ष 2008 के मुकाबले वर्ष 2026 में स्थिति ज्यादा गंभीर हो गई है। विश्व अर्थव्यवस्था और देश की अर्थव्यवस्था के बीच स्थिति में परिवर्तन हो गया है और आने वाले समय की स्थिति का चित्र अभी साफ नहीं है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह समय एक चुनौती का दौर है। यदि अभी हमने अपने बैंकिंग सेक्टर की दिशा को नहीं बदला तो आने वाले समय की स्थिति का हम सामना नहीं कर पाएंगे।

श्री मजूमदार ने कहा कि आज स्थिति यह है कि हम उत्पादन के मुकाबले वित्तीय गतिविधियों बढी़ है। । हम कर्ज लेकर खरीदारी कर रहे हैं। बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं। मकान खरीद रहे हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में हम मेडिक्लेम पर निर्भर हैं तो पेंशन भी हमारी हमारे द्वारा जमा की गई किस्त पर आधारित है। इस समय उत्पादन की प्रक्रिया ग्लोबल सप्लाई चैन पर आधारित हो गई है।
उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा आ गया था जब प्रचारित किया गया कि विश्व में एक ही महाशक्ति बची। उस समय यह उम्मीद की गई कि अब विश्व से युद्ध खत्म हो जाएंगे और शांति की बहाली होगी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका है। इस समय विश्व के कई देशों में एक साथ युद्ध चल रहा है। उत्पादन में विकास की रफ्तार धीमी हो गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति के द्वारा टैरिफ लगाए जाने के मामले की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने देश के हितों को देखा है। उनका लक्ष्य यही है कि उनके देश से दूसरे देशों में जाने वाला माल ज्यादा से ज्यादा हो और दूसरे देश से उनके देश में आने वाला माल कम से कम हो।

श्री मजूमदार ने कहा कि इस समय पूरे विश्व में डॉलर को चुनौती दी जा रही है। पूरे विश्व को एक गांव बनाने की जो बात हुई थी वह हकीकत में सार्थक नहीं हो सकी। हर देश के विकास का रास्ता अलग है और आय के बंटवारे में असमानता है। जब देश में टैक्स कम और ज्यादा खर्च होगा तो महंगाई बढ़ेगी। विदेशी मुद्रा का भंडार देश के लिए आवश्यक है। वर्ष 2000 में पूरे विश्व में 75 प्रतिशत उत्पादन पश्चिमी यूरोप, उत्तर अमेरिका और जापान पर केंद्रित था। शेष विश्व में केवल 25 प्रतिशत उत्पादन होता था। औद्योगिकरण में भी करीब यही स्थिति थी। भारत की अर्थव्यवस्था में इस समय यह स्थिति है कि हम दूसरे देशों से खरीदते ज्यादा है और भेजते कम है। हमारे देश में सस्ती मजदूरी होने के बाद भी हम सफल नहीं है। पूर्वी एशिया और खास तौर पर चीन हमारे मुकाबले में ज्यादा आगे है। हमारी सेवा का बाजार 55 प्रतिशत अमेरिका पर निर्भर है। विदेश में काम करने के बदले जो पैसा भारत के लोग वहां से कमा कर अपने देश में भेजते हैं उसमें 27 प्रतिशत धन अमेरिका से आता है। इसके परिणाम स्वरुप ताकत के संतुलन में परिवर्तन आया है। डालर के भविष्य सवालिया निशान है। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया की स्थिति आने वाले समय में और बदल जाएगी। इसके कारण अनिश्चितता बनी है। हमें अपनी घरेलू क्षमता को मजबूत करना होगा और बैंकिंग सेक्टर को महत्वपूर्ण रोल अदा करना होगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ राजेश दीक्षित ने बैंकिंग सेक्टर की स्थिति और भारत की अर्थव्यवस्था में इस सेक्टर के योगदान को रेखांकित किया। इसके साथ ही उन्होंने वैश्विक स्तर पर बैंकिंग सेक्टर में बदलते हालात और उसका समाज पर आ रहे परिवर्तन की भी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ए आई मानवीय संबंधों का विकल्प नहीं बन सकती। यह तकनीक आने वाले समय में मानवीय गरिमा पर प्रहार करेगी।
वीके शर्मा ने कहा कि विगत दिनों देश के 25 करोड़ कर्मचारीयों मजदूरों की हड़ताल विश्व की सबसे बड़ी हड़ताल थी। सार्वजनिक क्षेत्र को बचाने के लिए और अधिक संघर्ष की जरूरत है। कार्यक्रम को शिव शंकर मौर्य राजीव तामणे, आदि ने संबोधित किया।
आयोजन के संयोजक अरविंद पोरवाल ने सम्मेलन की उपयोगिता को प्रतिपादित किया,स्वागत भाषण दिया एम के शुक्ला ने। कार्यक्रम में अतिथि के रूप में एस आयंगर, सुरेश उपाध्याय, शिव शंकर मोरे, श्यामसुंदर यादव, गुरमीत सिंह, राजीव महाने, शिव शंकर मौर्य और बीके शर्मा, कृष्णा बरुरकर, परमानंद काक लोकेश यादव भी मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन राजेंद्र नागर और अरविंद पोरवाल ने किया। अतिथियों का स्वागत संजय खरे, बी एस रावत, राहुल सोनी, संजय अहिरवार, भगवान कुशवाहा, पुष्पेंद्र शंकर, विशाल जैन, राहुल गुप्ता, अश्विन शर्मा, हिमांशु शेखर, जसविंदर चहल, रमेश सिंह, लोकेश यादव, आशीष खरे ने किया। आयोजन में अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट किये गए।आभार माना वीएस रावत एवं संजय खरे ने।






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