
राम विद्रोही
विजया दशमी के संदर्भ न तो एक दिवसीय हैं और न एक देशीय हैं। एक देशीय से तात्पर्य केवल अयोध्या के प्रजातांत्रिक राजतंत्र या केवल भारत तक ही सीमित नहीं हैं। मानवीय मूल्यों की प्रसार क्षमता भूगोल की सीमाओं को तोड कर भूमंडलीकृत होने की होती है। इन संदर्भोंं में विजया दशमी की पीठिका राम जन्म या इसके भी पूर्व से आरम्भ होती है। मनुष्यों और देवताओं की मुक्ति की कामना में यह आकांक्षा पल्लवित होती है। राम के नेतृत्व में संपूर्ण भारतीय समाज की एक सूत्रता में यही आकांक्षा गहरी और सघन होती है। रावण के मरण के साथ ही सारे भारत में राक्षसी उपनिवेशवाद की समाप्ति में यह आकांक्षा फलवती होती है। राम राज की स्थापना के साथ ही समाज के नव निर्माण और प्रजातांत्रिक राज व्यवस्था, न्याय व्यवस्था की मूल्य प्रतिस्थापना के बीज के रूप में नि:शेष हो जाने में यह आकांक्षा अपनी एक यात्रा चक्र का लक्ष्य पूरा करती है। यह सृष्टि की अनन्त-अनन्त यात्राओं में त्रेता युग की एक समुन्नत यात्रा की पूर्णाहूति है। विजया दशमी के सामाजिक संदर्भ वहां तक फैले हैं जहां समाज की अंतिम पंक्ति का व्यक्ति खडा है।

विजया दशमी अकेले नहीं आती। इस महा देश के सांस्कृतिक वैभव हिमालय और विंध्याचल से निकलती, कल-कल करती, तटों को सींचती और अनुष्ठानों को सम्पन्न करती अनेक सरिताओं की धाराओं को विजया दशमी का जय घोष तरंगायित करता आता है। लोक, शास्त्र, पुराण और मिथकों के सूत्र इसी पर्व के साथ जुडते हैं। विजया दशमी राम कथा का उत्कर्ष और चरम तो है ही, यह भारत की प्रकृति और लोक की उत्सव वृति का भी गतिमय गीत है। यह एक विजय गीत है, एक जय गाथा है। यह उत्सव प्रिया की प्रतिक्षा का आनन्दमय पर्यावसान है। एक संघर्ष का विराम है, एक अशुभ का अन्त है। एक सत्य की अनगिनत रश्मियों में उतरती ज्योति है। राम कथा मंदाकनी है, एक बहती हुई स्रोतस्वनी है। इसमें वानस्पतिक संसार का, लोक का, समय का और देश का बहुस्वादी जल आ कर मिला है। हजारों साल पहले इस भूमि पर मानव इतिहास की एक अभूत पूर्व और अविस्मरणीय घटना घटी, यह है सद् की असद् पर विजय गााथा । राम सत्य हैं, इस लिए वह अपराजेय तो हैं ही, उनकी शक्ति भी अमोघ है। राम रावण का युद्ध सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म के बीच हुआ एक ऐसा संग्राम है, जिसने सामाजिक संदर्भों को भी प्रभावित किया और उसके अंतस में मूल्यों को भी स्थापित किया।
राम कथा की मंदाकनी में हजारों सालों से नित नया जुडता चला गया और जुड रहा है। विजय पर्व आज अकेले भारत का जय घोष ही नहीं वह भारत की व्यापकता में समाहित हो कर राम का विजय घोष बन गया है। इस देश और समाज की व्यापकता में अन्तर्निहित राम से तात्पर्य उस ऊर्जा से है, जो संघर्षों में थकती नहीं, अंधेरों से डरती नहीं, असत्य से हारती नहीं, अपने एकान्त में टूटती नहीं, मौसमी हवाओं से बुझती नहीं और जो विपरीतताओं के आगे झुकती नहीं। जो संघर्ष का उत्तर प्रति संघर्ष से और आराधन से देना जानती है। विजय पर्व में यह ऊर्जा कई कोणों से आकर राम कथा की धारा का ही नहीं बल्कि इस देश की चेतना का या आत्मा का उत्सव रचती है। जब विजया दशमी होती है तो उस उस में शुम्भ-निशुम्भ के नाश का भी संकल्प फल है। आदिशक्ति का ताली बजा-बजा कर अपने दल के साथ नृत्य भी है। शरद की दूधिया चांदनी में नहाई रात और रात के नेह में भीगते कृष्ण का अनुराग भी है। झरती हुई शरद ज्योत्सना और ओस भरी रजनी में कृष्ण और गोपियों के महारास का रस भी है। जीव और ब्रह्म के नेह-छोह भी हैं। यह जडत्व के खिलाफ बीज का अंकुरित हो कर नए बीज की सृष्टि की अदम्य जिजीविषा भी है। शाल्य पूजन और महा लक्ष्मी की अगवानी की आकुल आतुरता भी है और स्वाति नक्षत्र में बरसती बूंद के साथ ही चातक की प्यास की अमरता भी है।





