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भाप के इंजन से हुई थी रंग-गुलाल उड़ाने की शुरुआत, होलकर शासक राजवाड़ा की परिक्रमा कर निकालते थे ‘गेर प्रज्ञा’

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इंदौर

इंदौर में रंगपंचमी पर गेर की परंपरा राजशाही के दौर से चली आ रही है। इस परंपरा की डिटेल 94 साल पुरानी एक किताब ”उत्सवादर्श” में देखने को मिलती है। यह किताब स्व. गणेश मतकर के संग्रह में रखी है। जिसे उनके बेटे सुनील मतकर दैनिक भास्कर को उपलब्ध कराया। यह किताब 1929 में लिखी गई है। इस किताब को केबी पुरंदरे ने लिखा है। जो हाउस होल्ड ऑफिसर थे होलकर शासन में। उन्होंने भी 70 वर्ष की उम्र में यह किताब लिखी है। उसके पहले उन्होंने 40 वर्ष तक इन उत्सवों को देखा उसके बाद ही इस किताब को लिखा है।

94 साल पुरानी उत्सवादर्श किताब

94 साल पुरानी उत्सवादर्श किताब

सुनील मतकर बताते हैं कि नवंबर सन् 1927 में महाराज ने भाप का छोटा इंजन आग बुझाने के लिए खरीदा था। 1928 में जब श्रीमंत यशवंत राव होलकर द्वितीय जब 12 साल के थे। तब उनसे श्रीमंत तुकोजीराव महाराज तृतीय ने पूछा कि आप होली कैसे खलेंगे। तब यशवंत राव होलकर द्वितीय ने कहा कि था आग बुझाने के लिए जो भाप का इंजन खरीदा है उससे पानी दूर तक जाता है। इसमें हम रंग डालकर प्रजा (गेर व्यक्तियों) पर उड़ाएंगे। गेर व्यक्तियों के साथ होली खेलने से ही गेर प्रचलन में आया जो आज भी जारी है। उस वक्त भाज के इंजन के साथ पाड़ा (भैंसा) गाड़ी में रंग भरकर पाइप से प्रजा पर रंगों की बौछार करते हुए राजबाड़ा की परिक्रमा की जाती थी।

1728 में रंगपंचमी के दौरान महाराज राजबाड़ा चौक पर 40×40 के अष्टकोणीय चबुतरे पर आकर बैठते थे। समय के अनुरुप व्यवस्थाओं में बदलाव होता गया। 1950 तक यह ख्याति थी जिस प्रकार राज्याश्रय में मैसूर का दशहरा प्रसिद्ध था उसी प्रकार इंदौर की होली-रंगपंचमी भी प्रसिद्ध थी। रंगपंचमी पर दो बार दरबार लगता था जिसमें सुबह महाराज प्रजा और दरबारियों के साथ होली खेलते थे।

खास बात यह रहती थी कि महाराज केशर के रंग से होली खेलते थे और दरबारी टेसू के फूलों से बने रंग से होली खेलते थे। उस वक्त दरबारी आरारोट के गुलाल की गोले भी तैयार करते थे। उसके थाल तैयार होते थे। क्योंकि उस दिन सुबह के दरबार में सभी सफेद वस्त्र में रहते थे। उनके ऊपर गुलाल के गोले फेंक जाते थे। सफेद कपड़ों पर गुलाल फैल जाता था। राजबाड़ा के अंदर का हिस्सा गुलालमय हो जाता था।

अलग-अलग रंगों के ड्रम में रहता था पानी
उन्होंने बताया कि किताब पढ़कर पता चलता है कि उस वक्त अलग-अलग रंगों के ड्रम तैयार करके भाप के इंजन के साथ प्रजा के ऊपर रंग उड़ाया जाता था। यशवंत राव महाराज ने राजबाड़े की परिक्रमा लगाकर प्रजा पर रंग उड़ाना शुरू किया। महाराज जो रंग उड़ाते थे उसे गेर प्रज्ञा के रूप में लिया जाने लगा। जिसके बाद गेर प्रज्ञा का स्वरुप बदलता गया। आज इस विशाल स्वरुप में गेर निकाली जाती है।

सोने-चांदी के पिचकारियों से उड़ता था रंग

सोने-चांदी के पिचकारियों से उड़ता था रंग

सोने-चांदी की पिचकारी के उड़ता था केशरिया रंग

चांदी की पिचकारी।

चांदी की पिचकारी।

उन्होंने बताया कि रंगपंचमी पर महाराज और राजपरिवार के पास सोने की पिचकारी हुआ करती थी। रंगपंचमी पर महाराज और उनके परिजन आपस में सोने की पिचकारी से रंग उड़ाते थे। वहीं उस वक्त दरबारियों के पास चांदी की पिचकारी हुआ करती थी जिससे वे रंग उड़ाते थे। इन सोने की पिचकारियों को होली के वक्त खजाने से निकाला जाता था और इनकी निगरानी भी की जाती थी।

दक्षिण दरवाजे से आते थे महाराज
उन्होंने बताया कि उस वक्त महाराज राजबाड़े के दक्षिण दरवाजे से अंदर आकर सीधे दरबार हॉल में जाते थे। महाराज यहां पहले भगवान को और देवी अहिल्या बाई की गादी पर रंग डालते थे। जिसके बाद अपने वरिष्ठजनों को रंग लगाते थे। इसके बाद वे प्रजा के साथ होली खेलने के लिए मुख्य दरवाजे से बाहर जाते और प्रजा पर भाप के इंजन से रंग उड़ाते। इस दौरान राजघराने की महिलाएं जालीदार झरोखों से उन्हें देखती। वहीं राजघराने के पुरुष राजबाड़े की पहली और दूसरी मंजिल की खिड़कियों से गुलाल के गोले फेंकते थे। इसके बाद मिठाई और पान का बीड़ा दिया जाता था।

शाम को लगता था दरबार
रंगपंचमी के बाद राजबाड़ा पर शाम का दरबार लगता था, जहां गीत संगीत के कार्यक्रम होते थे। इस गीत संगीत के प्रोग्राम में महाराज शामिल होते थे। इसमें कई प्रकार के गीत संगीत होते थे।

Ramswaroop Mantri

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