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‘विजय’ के अण्णा महाराज बनने की कहानी:फिर एक दिन देवास की गुरु माई ने दिखाया अध्यात्म का रास्ता, आज हजारों शिष्य

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इंदौर

आज गुरु पूर्णिमा है। इस अवसर पर ख्यात सद्गगुरु अण्णा महाराज संस्थान में आज गुरु पाद पूजन होगा। भजन-कीर्तन कार्यक्रम के साथ ही महाप्रसादी भी होगी। सद्गगुरु अण्णा महाराज के चरण छूकर शिष्य उनसे आशीर्वाद लेंगे। हर गुरु पूर्णिमा पर यहां आने वाले भक्तों में सामान्यजन से लेकर राजनेता, समाजसेवी, उद्योगपति सहित कई हस्तियां गुरु महाराज से आशीर्वाद लेने आते हैं। यहां तीन दिनी आयोजन की शुरुआत शनिवार से हो चुकी है। लेकिन सोमवार को गुरु पूर्णिमा का अलग महत्व है।

जानिए ख्याति प्राप्त सदगुरु अण्णा महाराज (विजय चव्हाण) के जीवन का सफर। वे एक फार्मा कंपनी के डायरेक्टर थे। नौकरी छोड़कर उन्होंन धर्म और अध्यात्म का मार्ग अपनाया और सद्गगुरु का स्थान प्राप्त किया। उन्होंने धार्मिक व सामाजिक सेवा के लिए संस्था का भी गठन किया। यह संस्था इन दोनों क्षेत्रों में सेवा गतिविधियां संचालित कर रही है।

विजय चव्हाण यानी अण्णा महाराज का जन्म 20 अक्टूबर 1956 को शरद पूर्णिमा पर इंदौर में हुआ। परिवार मूलत: बारामती (महाराष्ट्र) का रहने वाला था लेकिन सालों से इंदौर में ही है। पिता पोस्ट मास्टर थे और मां गृहिणी। परिवार में चार बहनें व महाराज सहित दो भाई हैं। महाराज का बचपन विस्मयकारी घटनाओं से भरा है। उनकी शिक्षा इंदौर में ही हुई। बीएससी करने के बाद महाराज ने फार्मा कंपनी की ओर रुख किया। उन्होंने 1980 के दशक में उन्होंने एक फार्मा कंपनी में बतौर केमिस्ट जॉइन की और 26 वर्ष की उम्र में गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया। इसके बाद खुद की फार्मा कंपनी शुरू की और उसके डायरेक्टर बने।

ऐसे आया जीवन में परिवर्तन

महाराज बताते हैं कि 1987 में उन्होंने अपने साथी अनिल अभ्यंकर के साथ नई फार्मा कंपनी शुरू की। उनके जीवन में अहम परिवर्तन अपनी गुरु माई (देवास) के माध्यम से आया। 1992 में गुरु माई ने उन्हें धर्म और अध्यात्म के मार्ग पर चलने के लिए आदेशित किया। चूंकि परिवार में परिवार की जवाबदारी भी थी तो 1997 तक फार्मा कंपनी का संचालन किया और पूरी तरह से ही फिर धर्म और फिर अध्यात्म की ओर रुख कर लिया।

​​​​​अपनी कमी को निकाल फेंको और मंजिल की ओर बढ़ो

‘दिगम्बरा दिगम्बरा श्रीपाद वल्लभ दिगम्बरा’ का निरंतर महामंत्र का जाप करने वाले परम पूज्य महाराज अपने भक्तों व शिष्यों का दुख निवारण कर अनुग्रह बरसाते हैं। उनकी चेतना से सदा ही भक्तों का कल्याण हुआ है। महाराज का एक परम लक्ष्य है कि सभी सुखी और निरोगी हों। पलसीकर स्थित उनके निवास (अब संस्थान भी) में हर गुरुवार को भक्तों की लम्बी कतारें लगती हैं। वे कहते हैं दुनिया में सफल होने की असीम संभावनाएं हैं। बस अपनी कमी को निकाल फेंको और मंजिल की ओर बढ़ते चलो।

बड़ी हस्तियां भी लेती हैं उनसे आशीर्वाद

गुरु पूर्णिमा पर महाराज से आशीर्वाद लेने के लिए इंदौर ही नहीं अलग-अलग राज्यों से भी लोग आते हैं। इनमें नेता, समाजसेवी, उद्योगपति आदि हैं। स्थानीय नेताओं में पूर्व लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन, सांसद शंकर लालवानी, पूर्व मंत्री जीतू पटवारी सहित कई जनप्रतिनिधि हमेशा यहां आते रहे हैं।

हाल ही में पूर्व लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने महाराज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 9 साल के कार्यकाल का विवरण-पत्रक भेंट किया।

हाल ही में पूर्व लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने महाराज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 9 साल के कार्यकाल का विवरण-पत्रक भेंट किया।

जीवन का सबसे सुखद क्षण; विधवा को दिया ‘कल्याणी’ नाम

महाराज ने बताया कि उनके द्वारा 2014 से एक विशेष प्रकल्प शुरू किया। ऐसी महिलाएं जो विधवा हैं उन्हें अकसर धार्मिक व आध्यात्मिक आयोजन में पीछे बैठे देखा जाता था और समाज भी नजरिया यही था जिसे उन्होंने बदला। बकौल महाराज जब मैं उन्हें देखता तो एक टीस होती थी कि क्यों न उन्हें सामाजिक दृष्टि से जोड़ा जाए।

इसके लिए सबसे पहले विधवा शब्द को हटाने पर विचार हुआ कि ऐसा नाम दिया जाए जिनमें उन्हें सम्मान लगे। इसके लिए शिष्यों ने सिंहस्थ में अलग-अलग स्थानों पर नाटक मंचन के माध्यम से उन महिलाओं को एकत्र कर उन्हें सम्मान देने का प्रयास किया। फिर मंथन कर उन्हें ‘कल्याणी’ नाम देने का प्रयास किया।

महाराज बताते हैं कि उन्हें सही मायने खुशी तब हुई जब 8 अगस्त 2017 को महिला दिवस के अवसर पर मप्र शासन ने विधवा शब्द हटाकर ‘कल्याणी’ नाम दिया। अब प्रदेश में उन्हें विधवा के बजाय ‘कल्याणी’ कहा जाता है।

संस्थान के माध्यम से संचालित धार्मिक, सामाजिक और रचनात्मक गतिविधियां

हर गुरु पूर्णिमा पर भक्तों की लगती हैं कतारें।

हर गुरु पूर्णिमा पर भक्तों की लगती हैं कतारें।

265 जोड़ों के माध्यम से नवविवाहितों को दिया यह संदेश

महाराज ने अनुभव साझा करते हुए बताया कि शादी के तुरंत बाद पति-पत्नी के बीच संबंध तेजी से विच्छेद हो रहे हैं। उनके पास ऐसे भी कई दंपती आए जिनकी शादी को करीब 10 दिन हुए और वे साथ में रहना नहीं चाहते। ऐसे मामले परिवार व समाज के लिए चिंतनीय है। खास तो यह कि वे कारण भी नहीं बता पाते।

पता नहीं 10 दिनों में ऐसा क्या हो जाता है कि उन्हें संबंध विच्छेद करना ही अच्छा लगता है। समाज में ऐसे कई दंपती हैं जिन्हें शादी के बाद 50 साल से ज्यादा हो गए हैं और सफल जीवन जी रहे हैं। इसके लिए महाराज ने अपने जन्मदिन पर इसके लिए एक आयोजन किया।

इनमें उन दंपतियों को आमंत्रित किया जिनकी शादी को 50 साल से ज्यादा हो गए। इन्दौर में ऐसे 265 जोड़े मिले। माई मंगेशकर सभा गृह में उनका सम्मान नवविवाहित जोड़ों से ही कराया ताकि वे उनसे प्रेरणा लेकर सफल दाम्पत्य जीवन जिये। वे समझें कि दाम्पत्य जीवन में सुख-दु:ख दोनों ही हैं लेकिन आपस में समन्वय बनाकर निभाएं।

शिक्षा वृत्ति के लिए बचत का यह नेक कदम

महाराज ने 10 जुलाई को मूर्ति स्थापना दिवस पर शिक्षा के क्षेत्र के लिए निर्णय लिया। इसके हर गुरु पूर्णिमा पर शिष्यों को गुल्लक के रूप में सीख दी कि कुछ भी सामान खरीदते हैं जो थोड़े बहुत रुपए मिलते हैं उन्हें इसमें एकत्रित करें। फिर अगली गुरु पूर्णिमा पर उन लोगों से वह गुल्लक बुलवा लेते हैं। फिर स्थापना दिवस पर यह जो राशि एकत्रित होती हैं उसे चेक के माध्यम से शिक्षा वृत्ति के रूप में देते हैं। इससे उनका खाता खुल जाता है और उन्हें सेविंग की आदत लग जाती हैं। ऐसे हर साल सौ बच्चे लाभान्वित होते हैं। अभी तक करीब 40 लाख रु. 800 बच्चों को वितरित कर चुके हैं। यह प्रकल्प बढ़ता जा रहा है। इस बार 10 जुलाई को फिर शिक्षा वृत्ति दी जाएगी।

Ramswaroop Mantri

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