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स्वयं की सत्यकथा : सूक्ष्म शरीर से विचरण

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डॉ. विकास मानव

धीरे-धीरे एक मास का समय व्यतीत हो गया। न अखिलेश्वरानंद आये और न तो फिर भेंट हुई दिव्यकैवल्य से ही। उनके मार्गदर्शन में अभी भी मेरी साधना चल रही थी। नगवा [काशी] की उस छोटी-सी कोठरी को छोड़ा नहीं था मैंने।


अकेले रहने का अभ्यास और प्रगाढ़ हो गया था मेरा। अपने हाथ से भोजन केवल एक बार बनाता। उसके बाद पढ़ना-लिखना, चिन्तन करना और अन्त में साधना में डूब जाना पूरी रात के लिए। बाहर अति आवश्यकता पड़ने पर ही निकलता था मैं, अन्यथा नहीं।
बरसात शुरू हो गयी थी। वातावरण में परिवर्तन होना भी शुरू हो गया था और चारों ओर लगी थी फैलने हरियाली। मेरी चेतना अब तक काफी विकसित हो चुकी थी। जैसा कि इस मार्ग में होता है मेरा स्थूल पार्थिव शरीर दुर्बल अवश्य हो गया था लेकिन मेरा सूक्ष्म शरीर पहले से अधिक विकसित और शक्तिशाली हो चुका था।
मेरा उस पर पूरा अधिकार था, जबकि स्थूल शरीर पर कम हो रहा था अधिकार। साधना-मार्ग में ऐसा ही होता है। जैसे-जैसे सूक्ष्म शरीर दृढ़ और शक्तिशाली होता जाता है, वैसे-ही-वैसे स्थूल शरीर कृष, निर्बल, शिथिल और कमजोर होता जाता है। जो सच्चा योगी होगा और जिसने अंतर्जगत में प्रवेश कर लिया है, उसका शरीर कभी भी मोटा न होगा, स्वस्थ न होगा। वह कृशकाय ही होगा।

  अब मैं अपने शरीर से अलग होने की प्राण-क्रिया से भी परिचित हो चुका था और सूक्ष्म शरीर द्वारा एक सीमा तक कहीं भी आ-जा सकता था। उसकी गति निर्बाध थी लेकिन सीमा के बाहर निकलने पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का उसे झटका लगता था।
 _किसी भी प्रकार पार्थिव वस्तुएं उसके मार्ग में बाधा उपस्थित कर सकने में असमर्थ थीं। विशेष प्राण-क्रिया द्वारा मैं आधी रात के समय अपने सूक्ष्म शरीर को अपने पार्थिव शरीर से अलग कर देता था अत्यन्त सहजता से। उस समय मेरा पार्थिव शरीर पद्मासन की मुद्रा में ध्यानस्थ रहता था और भीतर तथा बाहर--दोनों ओर से कोठरी का दरवाजा बन्द कर देता था ताकि लोग समझें कि मैं कहीं गया हूँ।_
    सचमुच साधना-मार्ग में काफी सावधानी रखनी पड़ती है। अपने विषय में, साधना की प्रगति के विषय में कभी कुछ बतलाना नहीं चाहिए, अन्यथा व्यवधान पड़ने की आशंका रहती है। लोग परेशान करने लगते हैं, वह अलग।
  _सूक्ष्म शरीर द्वारा रात्रि में विचरण करने में बड़ा ही आनन्द अनुभव होता था मुझे। उस अपूर्व आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं, ऊँचे-ऊँचे मकानों और विशालकाय वृक्षों के अलावा नदी-नालों के बीच में से बड़ी सरलता से और बड़ी सहजता से निकल जाता था।_
कोई बाधा नहीं और कोई रुकावट नहीं। निर्बाध गति और स्वच्छन्द विचरण।

*जग का अपार्थिव रूप :*
  उस समय मेरे सामने संसार का दूसरा ही रूप होता था जिसको संसार का अपार्थिव रूप (चिन्मय रूप) कहा जा सकता है। लेकिन सूक्ष्म शरीर द्वारा भ्रमण करने पर संसार का वह घृणित रूप भी सामने आ जाता जिस रूप में लोग दूसरों की नजर बचाकर झूठ, फरेब, धोखा, वासना के खेल खेलते हैं।
  _सूक्ष्म शरीर से कुछ भी छिपा नहीं रहता। ऐसे-ऐसे दृश्य सामने आ जाते जिन्हें देखकर मेरा मन ग्लानि से भर उठता। हर वर्ग का कोई ऐसा परिवार नहीं देखा जहां आंतरिक पाप-कर्म न हो, द्वेष, घृणा, कपट, ईर्ष्या और असत्य भाषण न हो।_
पिता-पुत्र के बीच कपट, माता-पिता के बीच असत्य आचरण, पति-पत्नी के बीच दुराव-छिपाव और भाई-भाई के बीच झूठ और कपट। अपनत्व भरा स्नेह, अपनत्व भरा प्रेम, निश्छल व्यवहार, हर्ष, प्रसन्नता आदि कहीं देखने को नहीं मिली मुझे।

यह सब देखना वास्तव में ऐसा कटु अनुभव था जिसे जानकर किसी भी व्यक्ति का हृदय मानव जाति के प्रति घृणा से भर सकता था और समाप्त हो सकता था संसार के प्रति, समाज के प्रति, परिवार के प्रति और स्वयं अपने आप के प्रति सारा आकर्षण और सारी मोह-माया। एक पल में समाप्त हो सकती थीं सारी भावनाएं संसार के वे वास्तविक रूप देखकर।
एक ही रात में मैंने मानव जाति का जो घृणित और वीभत्स रूप देखा, उसने जहां एक ओर मेरी आत्मा को विचलित ही नहीं किया, वहीं दूसरी ओर परम् वैराग्य से भी भर दिया एकबारगी।

सूक्ष्म शरीरधारी दिव्यात्माओं का दर्शन :
ब्राह्म मुहूर्त का समय हो रहा था। ग्लानि से भरा हुआ वापस अपने स्थान पर लौट रहा था मैं कि सहसा मेरी दृष्टि कुछ विदेही सन्त-महात्माओं पर पड़ी। वे संख्या में बारह थे। कोई पर्व था शायद। वे सभी जब केदार घाट पर गंगा स्नान कर रहे थे।
भले ही स्थूल शरीरधारी जन उन्हें देख सकने में असमर्थ थे लेकिन सूक्ष्म शरीरधारी लोग भली-भाँति उन्हें देख सकने में समर्थ थे। घाट पर लगी स्नानार्थियों की भीड़ को भला क्या मालूम था कि उनके बीच उच्च कोटि के सन्त-महात्मागण भी उन्हीं की तरह स्नान का आनन्द ले रहे थे।
सन्त-महात्माओं की वह मण्डली निश्चय ही किसी उच्च लोक की थी। सभी लम्बी कद-काठी के स्वस्थ और गौर वर्ण के थे। शरीर पर चन्दन का प्रलेप था। सिर पर जटा-जूट था और छाती का स्पर्श करती हुई लम्बी दाढ़ी थी। बड़ी-बड़ी आंखें चमकती हुयीं और तेजोमय मुखमण्डल। सभी अपने आप में लीन थे और थे अपने आप में मग्न।

  मैंने देखा--सन्त-महात्माओं ने स्नान कर सीढियां चढ़कर मन्दिर में प्रवेश कर भगवान केदारेश्वर का दर्शन किया। मन्दिर के भीतर दर्शनार्थियों की भी भीड़ बढ़ चुकी थी अब तक। लेकिन सभी उन अपार्थिव दिव्य आत्माओं के अस्तित्व से अपरिचित थे। यदि कोई परिचित था तो केवल मात्र मैं था।
  _सहसा एक महात्मा की दृष्टि मुझ पर पड़ी। उन्होंने सिर घुमाकर मेरी ओर गहरी दृष्टि से देखा और अपने साथियों को मेरे सम्बन्ध में संकेत करके कुछ बतलाया।_
  सभी ने एक साथ सिर घुमाकर मेरी ओर आश्चर्य और जिज्ञासा के भाव से देखा। धीरे-धीरे चलकर महात्मागण मेरे निकट आये और मेरा परिचय जानना चाहा।
 _अल्प शब्दों में परिचय दे दिया अपना मैंने। महात्मा प्रसन्न हो उठे और अपना-अपना दाहिना हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया मुझे सब ने। फिर मिलने की इच्छा व्यक्त की उन्होंने।_
    अब सभी लोग मन्दिर के प्रांगण से बाहर निकल घाट पर आ गए। मैं भी उनके पीछे-पीछे था। मुझे तो यह देखना था कि सन्त-मण्डली जाती कहाँ है ?

  अब तक अरुणोदय काल हो चुका था। पूरब के आकाश-पटल पर लाल सिन्दूरी रेखा एक ओर से दूसरी ओर तक खिंच-सी गयी थी। शीघ्र ही सूर्योदय होने वाला था।
 _जिस महात्मा को मैंने अपना परिचय दिया था, वे मेरे समीप आये और मन्द स्वर में बोले--मेरा नाम ब्रह्मानन्द है। ये सभी मेरे परम् शिष्य हँ जिनको तुम सन्त-महात्माओं के रूप में देख रहे हो। हम सब लोग कभी भू-मण्डल के ही निवासी थे, लेकिन चौदह सौ वर्ष से भू-मण्डल की सीमा के बाहर स्थित श्रीचक्र मण्डल में निवास कर रहे हैं हम सब लोग और वहां से किसी विशेष पर्व के उपस्थित होने पर गंगा स्नान और केदारेश्वर व विश्वेश्वर के दर्शन के निमित्त काशी आते हैं।_
  थोड़ा रुककर ब्रह्मानन्द बोले--

विकास, आप जैसे साधक से मिलकर भारी प्रसन्नता हुई।
क्या आप सब लोग वापस अपने मण्डल में लौट जाएंगे ?–मैंने पूछा।
हाँ, अभी तो लौट जाना ही होगा क्योंकि पर्वकाल तक ही इस संसार में रहने का आदेश है हम लोगों को।
अब कब आएंगे ?–मैंने थोड़ा व्यग्र होकर पूछा।
आगामी मकर-संक्रान्ति पर मैं स्वयं आऊंगा, शिष्य लोग नहीं।
क्या समय आपका दर्शन प्राप्त हो सकेगा और क्या आपका मूल्यवान और महत्वपूर्ण सान्निध्य उपलब्ध हो सकेगा इस छुद्र आत्मा को ?–थोड़ा विह्वल-सा हो उठा मैं और अन्तिम शब्द के साथ भावावेश के कारण मेरे गालों पर आँसू की बून्दें ढुलक आयीं।
अब तक मण्डली सीढियां उतर चुकी थी। ब्रह्मानन्द भी थोड़ा आगे बढ़े। उस समय उनके तेजस्वी मुखमण्डल पर प्रातः की सिन्दूरी लालिमा की छाया पड़ रही थी जिससे उनका मुखमण्डल और भी अधिक देदीप्यमान हो रहा था।
मेरे गालों पर ढुलक आये अश्रुकणों को अपनी कोमल उंगलियों से पोंछते हुए अति कोमल और मधुर स्वर में बोले–अरे मानव ! इसमें चिन्तित होने की क्या बात है ? अवश्य दर्शन होगा। अवश्य उपलब्ध होगा मेरा सान्निध्य। तुम्हारे ही स्थान पर आऊंगा मैं, प्रतीक्षा करना।
इतना कहकर महात्मा अपनी मण्डली के साथ गंगा की धारा में उतर गए और सभी लोग पानी पर इस तरह चलने लगे जैसे धरती पर चल रहे हों।

अब तक सूर्योदय हो चुका था और उदय होते हुए सूर्य की लालिमा में मैंने देखा–सन्त-महात्माओं की वह मानवेतर मण्डली प्रकाश-पुंज में परिवर्तित हो चुकी थी और धीरे-धीरे दूर क्षितिज में विलीन होती जा रही थी और उसे विलीन होते हुए अपलक देखता रहा मैं।
पूरे चार मास के बाद अखिलेश्वरानंद अपनी अटपटी चाल से झूमते-झामते आये। चेहरे से लगा–काफी थके हुए हैं वह। मेरे कुछ पूछने के पहले ही कहने लगे महाशय–बद्रीनाथ, केदारनाथ के अलावा कैलाश मानसरोवर की यात्रा से लौटा हूँ मैं। अब कुछ समय काशी में रहने का मेरा विचार है।
चलिए अच्छा हुआ। अब आपकी आगे की कथा सुनने को मिलेगी–मैंने हँसते हुए कहा–आप कब लौटे थे ऋषिकेश ?
लगभग पन्द्रह-सोलह वर्ष बाद।
कहाँ ठहरे हैं आप काशी में ?
चंद्रशेखर के यहाँ और कहां ठहरूंगा ?
तब तो आप लक्ष्मी से भी मिले होंगे ?
यह सुनकर वे थोड़ा गम्भीर होकर बोले–सच माना जाय तो उस महान आत्मा से मिलने के लिए ही आया था मैं काशी। देखा तो देखता ही रह गया। महान साधिका माँ ज्योतिर्मयी का लघु संस्करण लक्ष्मी के रूप में मेरे सामने था। वही आकर्षक रूप और लावण्य, वही अपरूप सौंदर्य, वही चम्पई रंग, झील जैसी बड़ी-बड़ी आंखें, स्वभाव में सहज गम्भीरता और चेहरे पर वही तेज। किशोरवय की वह सुन्दर कन्या साक्षात जगदम्बा का साकार रूप लग रही थी।
उसके जन्म के बाद तो चंद्रशेखर और उनके पूरे परिवार का ढांचा ही बदल गया था जैसे। वे बाबा विश्वनाथ के सर्वेसर्वा नियुक्त कर दिए गए थे। किसी भी प्रकार का अभाव नहीं था उन्हें। अभाव होता भी कैसे ? जहाँ स्वयं एक परम सिद्ध आत्मा का निवास हो, वहां किसी भी प्रकार का अभाव कैसे रह सकता है भला।
मैंने विषय को बदलते हुए पूछा–पूरे पन्द्रह वर्ष आपने हिम प्रदेशों की यात्रा की थी। निश्चय ही अनेक साधु-सन्तों का दर्शन-लाभ हुआ होगा आपको।
हाँ ! इसमें क्या सन्देह ?
मानसरोवर के निकट एक महात्मा मिले। लगभग दो सौ वर्ष से निवास कर रहे थे उस दुर्गम हिम प्रदेश में। नाम था–रामसेवक जी महाराज। आकर्षक व्यक्तित्व और तेज से दमकता मुखमण्डल। महाराज का कहना था कि जब वह काशी गए थे, उस समय सन्त तुलसीदास से उनका साक्षात्कार हुआ था। सचमुच सन्त थे तुलसीदास। हर समय राम का ही नाम लिया करते थे वह। क्या कहें तुमसे मैं तुलसीदास की प्रेरणा और भगवन्नाम की कृपा से दीर्घकाल से मेरी आत्मा भक्तिरस के सागर में निमग्न है। रामचरितमानस जैसा काव्य संसार में दूसरा नहीं है।
यह सुनकर मैंने कहा–जीवन को प्रत्येक कोण से सन्त ने सूक्ष्म दृष्टि से देखा है। प्रेम, भक्ति, वात्सल्य और ज्ञान का समन्वय इस महाकाव्य की विशेषता है। रस और भाव की जिस गंगा का अवतरण सन्त ने मानस में किया है, उसका पान कर जीवन धन्य हो जाता है।
यह सुनकर महाराजजी भाव-विह्वल हो गए। उनकी आंखों से आँसू झरने लगे। गदगद हो उठे जैसे वह। मेरा हाथ थामकर वह कुटी के भीतर ले गए। भयंकर शीत में भी कुटी भीतर गर्म थी। कुटी की सामने वाली दीवार पर सन्त तुलसीदास का बड़ा-सा एक तैलचित्र लगा था।
काफी पुराना और दुर्लभ लगा मुझे वह चित्र। चित्र में काशी के गंगातट पर कथावाचक की मुद्रा में तुलसीदास बैठे हुए थे और उनके चारों ओर बैठे भक्तगण कथा-श्रवण कर रहे थे। पीछे पीपल का एक पेड़ है जिसकी एक डाल पर बानर के रूप में हनुमानजी भी कथा का रसपान कर रहे थे। वास्तव में बड़ा ही मर्मस्पर्शी और मनोरम चित्र था वह।
काफी देर तक मुग्धभाव से खड़ा रहा मैं उस अनुपम और सजीव चित्र के सम्मुख। कुटिया में दो-तीन कम्बल, एक पुराना बड़ा-सा लोटा और एक पुरानी थाली के अलावा और कुछ नहीं था। अजीब-सी शान्ति थी कुटिया के भीतर।
आपके भोजन आदि की व्यवस्था कैसे होती है ?–मैंने प्रश्न किया।
यह सुनकर महाराजजी थोड़ा हँसकर बोले–सब राम की कृपा है। जब से मैं यहां रहने लगा हूँ, तभी से एक वृद्धा स्त्री नित्य रात्रि के समय आवश्यकतानुसार भोजन दे जाती है मुझे।
कौन है वह वृद्धा स्त्री ?–कौतूहल हुआ मुझे।
न जाने कौन है बेटा–मैं भी नहीं समझ पाया इस रहस्य को–महाराजजी अपने दोनों हाथ प्रणाम की मुद्रा में सामने करके बोले।
समझते देर न लगी मुझे। अवश्य भगवत कृपा थी उस एकांतवासी तपस्वी पर–इसमें सन्देह नहीं।
पीपल के पेड़ के नीचे एक बड़ा-सा चबूतरा था। उसी पर आकर हम दोनों ( स्वामीअखिलेश्वरानंद और रामसेवक जी महाराज ) बैठ गए।
नीले आकाश में धुनी हुई रुई की तरह बादलों के छोटे-बड़े टुकड़े तैर रहे थे। वातावरण में गहरी निस्तब्धता बिखरी हुई थी। चारों ओर शान्ति का साम्राज्य था।
वे भाव विव्हल होकर कहने लगे–रामचरितमानस में रामकथा सात सोपानों में वर्णित है। पात्रों का आश्रय लेकर सन्त तुलसीदास ने अपनी विलक्षण अनुभूतियों, अलौकिक अनुभवों तथा पाण्डित्य का पूर्ण परिचय दिया है। रामायण का कोई भी पृष्ठ तुम खोलो, किसी भी चौपाई, दोहा, पद को पढ़ो, चिन्तन-मनन की प्रचुर सामग्री मिलेगी तुम्हें। मानस की समाप्ति सप्तम सोपान में होती है तब सन्त तुलसीदास प्रबन्ध-बन्धन से मुक्त होकर मुक्त भाव से अपनी आन्तरिक अनुभूतियों को व्यक्त करते हैं। सम्पूर्ण उत्तर काण्ड रामचरितमानस के साथ-साथ तुलसी चरित्र से भी प्रभावित है।
सप्तम सोपान में रामायण प्रायः समाप्त हो जाती है। उस समय ग्रन्थ-समाप्ति के लिए कुछ ही पदों की आवश्यकता थी परन्तु तुलसीदास को लगा कि कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न छूट रहे हैं जिनके बिना ग्रन्थ अधूरा ही रह जायेगा और यही कारण है कि गरुड़ और काकभुशुण्डि द्वारा वह उन प्रश्नों का उत्तर देते हैं। उन प्रश्नों का जीवन से अभिन्न सम्बन्ध है। इसके महत्व को दृष्टिगत रखते हुए ही तुलसीदास को गरुड़-काकभुशुण्डि-संवाद के रूप में प्रश्नों की समीक्षा करनी पड़ी। उसके अभाव में तुलसीदास को न सुख-शान्ति मिलती और न तो मानस की पूर्णता की अनुभूति ही होती।

सांझ की स्याह कालिमा उत्तुंग हिम-शिखरों पर फैलने लगी थी। रामसेवक्जी महाराज कुछ समय तक मौन रहे फिर उठकर गुफा के भीतर चले गए। बाद में संकेत कर मुझे भी भीतर बुला लिया। बर्फ गिरने लगी थी झिर-झिर कर और उसी के साथ बढ़ने लगी थी शीत भी। अब तक गुफा के भीतर अन्धकार का पूर्ण साम्राज्य हो चुका था।
क्या उसे अन्धकार कहा जायेगा ? नहीं, उस घोर अंधकार में भी प्रकाश का अनुभव हो रहा था मुझे।
आश्चर्यचकित था–उस घोर अंधकार में भी सब कुछ साफ-साफ दिख रहा था। निश्चय ही महाराजजी का का ही कोई योग-कौतुक था वह–इसमें सन्देह नहीं।
उसी पल गुफा के भीतर किसी के आने की आहट लगी। सिर घुमाकर देखा–एक अति वृद्धा स्त्री कमर झुकाए भीतर चली आ रही थी। उसके हाथों में कुछ केले के पत्ते और एक गठरी थी। समझते देर न लगी–वही अनाम, अज्ञात और रहस्यमयी वृद्धा थी जो महाराजजी को नित्य रात्रि को भोजन लेकर आती थी।
उस वृद्धा का शरीर पूर्णरूप से जर-जर हो चुका था। सारे शरीर में झुर्रियां पड़ गयी थीं। बाल सन की तरह सफेद और आपस में उलझे हुए थे, मगर चेहरे पर दिव्य आभा थी। बिना किसी से कुछ बोले मौन भाव से केले के पत्ते पर भोजन परोसा उस वृद्धा ने कांपते हाथों से।
भोजन में कौन-सा पदार्थ था–यह तो बतलाया नहीं जा सकता, लेकिन स्वादिष्ट और रुचिकर अवश्य था वह–इसमें सन्देह नहीं।
कौन थी वह वृद्धा और कहां से आती थी नित्य रात्रि को ?
रहस्य ही रहा यह मेरे लिए। लगभग एक सप्ताह रहा मैं रामसेवक्जी महाराज की गुफा में। फिर एक दिन चल पड़ा मैं गोमुख की यात्रा पर।
लगभग पन्द्रह दिन की लंबी पदयात्रा के बाद पहुँचा मैं गोमुख और तभी याद आये महान योगी–चिन्मयानन्द। जब उनकी गुफा में गया तो देखा–महाशय पूर्व परिचित प्रसन्न मुद्रा में बैठे हुए हैं। इसे संयोग कहिये या मेरा सौभाग्य, उस समय स्वामी योगेश्वरानंद जी भी वहां उपस्थित थे। देखते ही पहचान गए मुझे। हँसकर बोले–बहुत समय बाद आगमन हुआ आपका।
हाँ, महाराज ! आप तो मेरे स्वभाव से परिचित ही हैं। आज यहां तो कल वहां।
इधर कैसे आ गए ?
आपका स्मरण हुआ, कुछ जिज्ञासाएं भी थीं। बस यही कारण समझें आप।
अब कौन-सी जिज्ञासाएं ?

स्मृति और अध्यात्म-मार्ग :
स्मृति के सम्बन्ध में मेरी जिज्ञासा है। काल के प्रवाह में स्मृति का भारी महत्व है। एक जन्म की स्मृति अगले जन्म का कारण बनती है। एक ही जन्म में साधना पूर्ण नहीं होती।
पूर्णता के लिए कई जन्म चाहिए। वर्तमान जन्म में हम अध्यात्म-मार्ग पर पूर्णता की दिशा में तभी आगे बढ़ सकते हैं जब पूर्व जन्मों की साधना-स्मृति हो।
मेरी बात सुनकर स्वामी चिन्मयानंद जी बोले–यह विषय अत्यंत गम्भीर है। इस पर प्रकाश डालना आवश्यक है, लेकिन यह तभी सम्भव है जब स्मृति प्रखर से प्रखरतम हो। आश्चर्य की बात तो यह है कि पिछले सैकड़ों वर्षों में योगी और साधकों का ध्यान इस ओर क्यों नहीं आकृष्ट हुआ ? जबकि यह योग-तन्त्र का मुख्य विषय है।

स्मृति प्रखर करने के चार साधन :
मानव मस्तिष्क में एक अरब चौरासी लाख ऐसी कोशिकाएं हैं जिनमें पिछले एक हज़ार जन्मों की स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं। अब रही बात उन प्रसुप्त कोशिकाओं को कैसे जागृत किया जाय, इसके लिए मुख्य रूप से चार साधन हैं–एकाग्रता, कल्पना-शक्ति की प्रवणता, बुद्धि की सहज स्थिरता और कुछ आवश्यक बातें। इन चारों साधनों से साधक जितना सजग और चैतन्य रहेगा, उतने ही अनुपात में उसकी पिछली स्मृतियां जागृत होंगी। उतनी ही वर्तमान जीवन की स्मृतियों की वृद्धि होगी। स्वामीजी ने कहा–एकाग्रता सबसे महत्वपूर्ण और मुख्य साधन है।
इसके अभाव में अन्य तीनों साधनों की कोई उपयोगिता नहीं है। एकाग्रता साधने के कई उपाय हैं। साधना के मूल में एकाग्रता है। यदि एकाग्रता नहीं है तो सफलता भी नहीं है।

एक समय में एक कार्य :
भौतिक जीवन में ज्ञान के सशक्त साधन एकमात्र पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, किन्तु उनकी अपनी सीमाएं हैं। अपनी सीमा में रहकर ही ये ज्ञानार्जन करती हैं। मन का सम्बन्ध ज्ञानेंद्रियों से है। मन की शक्ति से ही वे संचालित और क्रियाशील होती हैं। वैसे उनकी अपनी कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है।
इसलिए इन्द्रियों तथा मन की प्रत्येक क्रिया में अत्यन्त सजगता आवश्यक होती है। यहां यह बतला देना आवश्यक है कि एक समय में मन एक ही इन्द्रिय से काम लेता है। दो इन्द्रियाँ एक साथ कभी भी काम नहीं करतीं। लेकिन व्यक्ति एक साथ कई इन्द्रियों से काम लेने का प्रयास करता है।
मन को भी किसी एक ही दिशा में प्रवृत्त न कर उसे खुला छोड़ देता है जिसका परिणाम यह होता है कि जिसका ज्ञान होना चाहिए, वह नहीं हो पाता। फलस्वरूप समय और शक्ति का अपव्यय तो होता ही है और परिणाम भी शून्य होता है।
बहुत-से लोग ऐसे भी हैं जो एक ही समय में अनेक कार्य करते हैं और कहते हैं कि इससे समय की बचत हो है। सभी कार्य सम्पन्न भी हो जाते हैं। यह वास्तव में आज के मानव मस्तिष्क की भारी दुर्बलता है और इसी दुर्बलता के कारण मनुष्य किसी भी कार्य में जैसी सफलता मिलनी चाहिए, नहीं मिलती।
एक साथ कई इन्द्रियों से काम लेने के पक्ष में हैं लोग। उनकी शारीरिक और मानसिक शक्ति का ह्रास शीघ्र हो जाता है।
स्थूल दृष्टि से यह विशेष कार्य-क्षमता का द्योतक लगता है पर वास्तविकता यह है कि वह व्यक्ति शीघ्र गति से कार्य करने का अभ्यासी होता है। जिस इन्द्रिय से वह काम ले रहा है, उस समय वह एक ही इन्द्रिय कार्यकारी रखता है, अन्य सभी को गौण, किन्तु कार्य करने वाली की निपुणता से एक दूसरे कार्य के बीच में अल्प व्यवधान को साधारण व्यक्ति पकड़ नहीं पाता।
वह सातत्य को ही देखता है और अनेक कार्य एक साथ किये जा रहे हैं, ऐसे अनुभव होते हैं उसे। किन्तु सूक्ष्मता में एक कार्य के उपरांत ही अन्य कार्य की निष्पत्ति है। जिस व्यक्ति में इतनी अधिक क्षमता होती है यदि वह पढ़ते समय मन की समस्त शक्तियों को उस एक कार्य में ही नियोजित करे तो अध्ययन की निष्पत्ति असाधारण होगी।
अपेक्षा यह है कि कार्यो की बहुलता तथा समय की अल्पता होते हुए भी व्यक्ति एक ही समय में एक ही कार्य करने का प्रयत्न करे।
यहां तक कि एक ही कार्य करने के समय अन्य कार्य को मस्तिष्क में लाये भी नहीं। मन और इन्द्रियों का यह केन्द्रीयकरण एकाग्रता से अत्यन्त सहायक सिद्ध होता है।

विचार-मुक्ति :
संतजी ने विचार-मुक्ति के विषय में कहा–मन और इन्द्रियों के केन्द्रीयकरण के अनन्तर एकाग्रता की दिशा में प्रगति करने के लिए व्यक्ति को एक इन्द्रिय के माध्यम का भी परित्याग करना होगा। जब तक एक इन्द्रिय का भी माध्यम रहेगा, विचारों की परिक्रमा चलती रहेगी।
एकाग्रता में सफलता के लिए विचारों में भी प्रतिरोध आवश्यक होगा। व्यक्ति ऐसी स्थिति में पहुँच जाय कि एक भी विचार जन्म न ले सके और न तो रहने ही पाए। जैसा कि कहा गया है–“न किंचदपि चिन्तयेत।”
अर्थात–पूर्णरूप से विचार-मुक्ति। ऐसी स्थिति में व्यक्ति केवल द्रष्टा रहता है, कर्ता नहीं। अत्यन्त जागरूक रहना चाहिए, किन्तु सक्रिय या निष्क्रिय नहीं। दोनों के बीच की स्थिति होनी चाहिए। बुद्धि द्वारा ग्रहीत मन को वहां से निवृत्त कर देना चाहिए और पूर्णरूप से आत्मस्थ हो जाना है। योग की बहुत ही उच्च स्थिति है यह, लेकिन लोग इधर ध्यान ही नहीं देते।
आत्मस्थ होने पर शरीर में रहते हुए भी व्यक्ति को अपने शरीर से अलग होने का अनुभव तो होता ही है, इसके अतिरिक्त समग्रता की भी होती है अनुभूति। इस स्थिति तक पहुंचने पर आत्मा का चित्त के साथ सम्बन्ध धीरे-धीरे टूटने लगता है और साथ-ही-साथ विचार रहित होने की भूमिका का भी निर्माण होने लगता है।
योग का कहना हैं–कषाय विजय, इन्द्रिय विजय और समत्वयोग–ये तीनों विचारों के प्रवाह को रोकने के निमित्त है। यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो मनुष्य तरह-तरह की महत्वाकांक्षाओं का एक पिण्ड है। वह दूसरों के पराभव पर अपने प्रगति के महल को खड़ा होते देखना चाहता है।
प्रगति सभी के लिए बांछनीय है पर यह प्रगति उसी के लिए घातक है जो दूसरों की अवनति पर खड़ी होती है। कहने की आवश्यकता नहीं–यहां से कषायों की उददीप्ति, इन्द्रियों का स्वैराचार, मन की उच्छ्रंखलता तथा विषमता की विषबेल बढ़ने लगती है। दूसरे शब्दों में यदि कहें तो व्यक्ति प्रकृति के रहस्यों में उलझकर क्षणभंगुर वर्तमान तक ही सीमित हो जाता है और आत्मस्वरूप जिसमें अतीत, अनागत और वर्तमान–तीनों सुरक्षित रहते हैं, भूल जाता है।
इसलिए इस बात की अपेक्षा है कि व्यक्ति सबसे पहले अपने विचारों के आरोह और अवरोह को सम करे। तब उसका पहला चरण विषय वासनाओं की विरक्ति की ओर बढ़ेगा और कषाग्नि को शान्त कर साम्य भावना का विकास करेगा। साम्य अवस्था और साम्य भावना एकाग्रता का उपादान (आधार) बनती है और एकाग्रता साम्य भावना की।
दोनों सम्बद्ध होकर आत्मा को निष्कम्प, निर्विचार और निर्विकार बना देंगे। निष्कम्प, निर्विचार और निर्विकार आत्मा को ही विशुद्ध आत्मा कहते हैं।
वैराग्य और अभ्यास :
चिन्मयानंदज़ी ने कहा–विकाररहित होने के लिए वैराग्य और अभ्यास की अति आवश्यकता है। मनुष्य की सोच और मनुष्य की भावना बहुत ही विचित्र और हास्यास्पद है। व्यक्ति जीवनभर सांसारिक कार्यों में उलझा रहता है–इतनी गहराई से उलझा रहता है वह विभिन्न प्रकार के प्रपंचों में कि अपने लिए भी कुछ सोचने का उसे अवसर नहीं मिल पाता।
ऐसी व्यस्त स्थिति में दस-बीस मिनट ध्यान लगाकर आध्यात्मिक बनने का प्रयास करता है और उस समय भी उसका ध्यान नहीं लगता, ध्यानावस्था में मन एकाग्र नहीं हो पाता। ऐसा ध्यान करना अपने आप को धोखा देना है।
क्या यह सम्भव है कि दस-बीस मिनट के ध्यान से वह वेग उत्पन्न हो जाएगा जिससे 23 घण्टे 50 मिनट तक होने वाली क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से अप्रभावित रह सके ? दोनों ओर समय का सन्तुलन आवश्यक है।
मतलब यह कि ध्यान में नित्य अनवरत दो से तीन घण्टों का समय देना आवश्यक है और वह ध्यान गहरा प्रगाढ़ होना चाहिए तभी वृत्तियों का और वासनाओं का क्षय होगा। यह क्रम जैसे ही आरम्भ होगा, उसी समय से मन स्थिर होने लगेगा और एकाग्रता बढ़ने लगेगी।
व्यग्रता, अधैर्य और असहिष्णुता आदि भी एकाग्रता में प्रबल बाधक हैं। इनको नष्ट करने के लिए तपस्या यानी अभ्यास की आवश्यक है। शास्त्रों का पारायण, स्वाध्याय, माला-जप आदि भी इस दिशा में उपयोगी सिद्ध होते हैं किन्तु इन सबका जो मूल आधार है उसकी ओर सजगता नहीं बरती जाती और वह मूल आधार है–मन की शान्त वृत्ति।
विकार और संस्कार–ये दोनों मन में उभरते हैं। संस्कार स्वाभाविक है। यदि कुसंस्कार है तो उसका क्षय सत्संग से सम्भव है। रही बात विकार की तो इसके लिए एकान्त सेवन आवश्यक है। एकान्त-सेवन और सत्संग दोनों विपरीत होते हुए दोनों आवश्यक भी हैं। अधिक से अधिक एकांतवास और अधिक से अधिक सत्संग धीरे-धीरे विचारों को नष्ट कर देते हैं। मन की वृत्ति को शान्त करने के ये उत्तम साधन हैं।
वे बोले : तत्सम आकृति और नाम का भारी महत्व है। इस प्रसंग को साधक को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। इसके कुछ निर्णायक सिद्धान्त हैं। रूप, अरूप, पदार्थ, आकृति, व्यक्ति और ध्वनि के आंकङों का समय-समय पर स्मृति में संयोजित करना आवश्यक है, कल्पना भी तत्सम(वैसी ही) होनी चाहिए।
उदाहरण के रूप में–जैसे किसी अनजान व्यक्ति से सम्पर्क हुआ है। वह भावी जीवन में अनेक प्रकार से उपयोगी हो सकता है। अतः उसके नाम और आकृति अर्थात रूप को स्मृति में रखना आवश्यक है। आप उसका नाम पूछते हैं और प्रायः भूल जाते हैं। बार-बार नाम पूछना व्यावहारिकता के विरुद्ध है।
ऐसी स्थिति में कठिनाई भी हो सकती है। जब वह व्यक्ति दूसरी बार मिलता है तो आप सोचने लगते हैं कि इस व्यक्ति को देखा है कहीं, क्या नाम है ? यदि प्रथम सम्पर्क के समय ही उस व्यक्ति की आकृति और नाम को कल्पना के धागे से बांध लिया जाता तो यह कठिनता उत्पन्न न होती।
उस समय उस नाम के अपने किसी चिर परिचित व्यक्ति तथा आकृति के साथ कल्पना से बांध लेते तो यह कल्पना शीघ्रता से मस्तिष्क में दौड़ पड़ती और समय पर उसका पुनरावर्तन भी हो जाता। जटिलता से उसी समय छुटकारा पा जाते।
किसी भी नए व्यक्ति से मिलते समय उसके नाम, रूप तथा किसी अन्य विशेषता को चिर परिचित नाम, रूप और आकृति के साथ कल्पना से अवश्य बांध लेना चाहिए ताकि समय पर सब कुछ स्मरण आ जाय और धोखा खाने से बच जाये।

त्सम ध्वनि :
नाम और रूप की तरह विभिन्न भाषाओं की ध्वनियों को भी समय-समय पर स्मृति में रखना आवश्यक होता है। नाम, आकृति की स्मृति फिर भी सहज हो सकती है कुछ, किन्तु ध्वनियों को तत्सम ग्रहण करना तथा लम्बी अवधि तक ज्यों-की-त्यों दुहरा देना अत्यन्त कठिन होता है।
उसका सुगम उपाय है–अनजान भाषा की ध्वनि को जानी-मानी और समझी हुई भाषा की ध्वनि में परिणत कर कल्पना के आधार पर उसमें संयोजन करना।
चिन्मयानंदज़ी ने कहा–इसे मैं एक उदाहरण देकर समझा देता हूँ। जैसे किसी व्यक्ति ने अंग्रेजी भाषा में एक वाक्य कहा–देयर वॉज़ ए बैंकर (There was a banker.) सुनने वाला अंग्रेजी भाषा से अनजान हैं। वह हिन्दीभाषी है। इस स्थिति में वह तत्सम ध्वनि की कल्पना करेगा।
दरवाजा बन्द कर उस अंग्रेजी भाषा के वाक्य का हल्के से उच्चारण करेगा तो वह There was a banker की ध्वनि के लगभग समीप पहुंच जाएगा। ध्वनि में जो थोड़ा-बहुत अन्तर होता है, उसे स्रोता समझ कर अलग कर लेता है और दुहराते समय उसका संयोजन कर लेता है।
इस प्रकार किसी भी कठिन और परिचित भाषा के शब्दों को सुगमता से स्मृति में रखा जा सकता है।

बुद्धि की सहज स्थिरता :
चिन्मयानंदज़ी आगे बोले–अब तक मैंने संक्षेप में जिन विषयों की चर्चा की है, वे सभी साधना के मूलतत्व हैं। उन मूल तत्वों पर लोग थोड़ा भी ध्यान नहीं देते। जब तक उन मूलतत्वों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक किसी भी साधना में स्थिरिता और प्रखरता नहीं आएगी।
‘मन’ के बाद ‘बुद्धि’ है और उसके बाद है–‘अहंकार’। इस प्रसंग में मैं ‘बुद्धि’ पर विचार करूँगा क्योंकि साधना-मार्ग में ‘बुद्धितत्व’ एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
एकाग्रता और कल्पना-शक्ति की प्रखरता के साथ-साथ बुद्धि की सहज स्थिरता भी आवश्यक है। एकाग्रता एक उर्वर भूमि की तरह है और कल्पना-शक्ति की प्रखरता उस बीज की तरह।
बुद्धि की सहज स्थिरता में बीज को अपने में सुरक्षित तथा अंकुर के रूप में प्रस्फोट देने की क्षमता है। सभी एक दूसरे के पूरक हैं, इसलिए सहयोगी भी हैं। एक की भी अपूर्णता कार्य-सिद्धि में विफलता उत्पन्न कर देती है।

  कुछ लोगों की बुद्धि अत्यन्त स्थिर होती है। एक बार में जो कुछ अधिग्रहीत कर लिया, सर्वदा के लिए वह स्थिर हो गया। इसी को योग में 'कोष्ठबुद्धि'अथवा 'स्थितप्रज्ञ' कहते हैं। ऐसे व्यक्ति का किसी भी स्थिति में ज्ञान छलकता नहीं। कुछ लोगों की बुद्धि अस्थिर, चंचल होकर ठस हो जाती है।
   _वे एक बार में कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकते और लम्बे समय तक सुरक्षित भी नहीं रख पाते। उनका कुछ भी जानना-सुनना-समझना फलवान नहीं हो पाता। शक्ति और समय दोनों का अपव्यय होता है, वह अलग।_
  स्थिर बुद्धि वाले के लिए किसी भी प्रकार के प्रयत्न की आवश्यकता नहीं पड़ती। अस्थिर बुद्धि को प्रयत्न विशेष से परिवर्तित किया जाता है। कुछ लोग इसके लिए कई प्रकार की औषधियों का भी प्रयोग करते हैं। किन्तु प्राकृतिक संरचना में औषधियों के सेवन से यौगिक क्रियाएं अधिक प्रभावी होती हैं।
  _औषधियों से तो शारीरिक दृष्टि से आवश्यक तत्वों के अभाव को तो भरा जा सकता है और यौगिक क्रियाओं से प्राकृतिक संरचना में रही किसी अपूर्णता को दूर किया जा सकता है। इसीलिए सर्वप्रथम यह सर्वेक्षण आवश्यक होगा कि बुद्धि की अस्थिरता, जड़ता के निमित्त क्या है--इसका कारण जानने के बाद उसका निवारण सुगमता से हो सकता है।_
  बुद्धि की चंचलता का सम्बन्ध मन की वृत्तियों से अधिक जुड़ा हुआ होता है। मन यदि विक्षिप्त, आक्रांत या मोह-ग्रस्त होता है तो बुद्धि की स्थिरता उपलब्ध नहीं हो पाती है।
  _प्रायः देखा जाता है कि अधिकांश व्यक्तियों के मानस तनाव, दुराव और लगाव से भरे रहते हैं। अतः उनमें स्थिरता नहीं रहती।_

तनाव :
तनाव की स्थिति में व्यक्ति स्वयं अपने प्रति अन्याय करता है। ज्यों ही क्रोध, रोष, हीनता, दीनता, भावुकता, भय, पराभव के विचार मस्तिष्क में उभरते हैं, व्यक्ति अपने शरीर को खींचता चला जाता है। अनेक प्रसंगों में तो वह बोल ही नहीं पाता।
अपनी घुटन को अपने में ही समाये रखता है जिससे अधिकांश अवयवों में सिकुड़न पैदा हो जाती है। वह मांसपेशियों पर दबाव डालती है। उससे रक्त-संचार प्रभावित होता है। इन सारी प्रक्रियाओं में व्यक्ति अपने शरीर में विषाणुओं का निर्माण भी करता चला जाता है। वे विषाक्त अणु मस्तिष्क के सूक्ष्मतम तन्तुओं पर व्यक्त-अव्यक्त रूप से प्रभाव डालते हैं।
तब स्मृति दुर्बल होते-होते अन्त में क्षीण हो जाती है। क्रोधी और मूर्ख में यह अन्तर स्पष्ट दिखलायी देता है। मूर्ख व्यक्ति निश्चिन्त, बहुत खाने वाला तथा आरामतलब होता है। वह अच्छा भोजन करता है, खूब खाता है और आराम से पड़ा रहता है। उसे किसी बात की चिन्ता नहीं रहती।
इसलिए उसका शरीर सुदृढ, फैला हुआ पर बेडौल रहता है। रोगों से भी प्रायः मुक्त रहता है। क्रोध, रोष, हीनता, दीनता, भय, भावुकता आदि जिन कारणों से शरीर में तनाव उत्पन्न होता है, वह उनसे कोसों दूर रहता है। अतः उसके किसी भी अवयव में सिकुड़न पैदा नहीं हो सकती और न विषाक्त अणुओं का वहां निर्माण ही हो सकता है।
क्रोधी व्यक्ति इन सबसे अपने को नहीं बचा पाता है। परिणाम यह होता है कि वह स्मृति से हाथ धो बैठता है। स्मृति-विकास के लिए परम आवश्यक है कि क्रोध, रोष, भय आदि से जहां तक सम्भव हो, दूर रहा जाय ताकि विचारों में किसी भी प्रकार के तनाव की स्थिति न उत्पन्न होने पाये।
कुछ व्यक्तियों की आदत होती है कि निद्रित या जाग्रत शरीर को खींचते ही रहते हैं। उससे उनका शरीर सदैव कृष ही रहता है। अकड़न भी अधिक रहती है। शरीर के सारे अंगों में दर्द भी रहने लगता है। कारण यह है कि मांसपेशियों में कुछ उभार और अशक्तता आ जाती है। खिंचाव से यह सब दब जाता है।
अच्छा भोजन और अच्छा रहन-सहन आदि उसके लिए कुछ उपयोगी नहीं रह जाता। स्वभाव में भी चिड़चिड़ापन आ जाता है। ऐसे लोग दूसरे व्यक्तियों को भी सह नहीं सकते।

तनाव जैसा दुराव भी :
योगियों को तनाव के अलावा दुराव से बचना चाहिए। जो स्थिति तनाव की है, वही स्थिति दुराव की भी है। तनाव स्वयं के द्वारा स्वयं से ही किया जाता है, जबकि दुराव का सम्बन्ध दूसरे व्यक्ति से रहता है। मित्रता या मैत्री दो हृदयों को जोड़ती है, जबकि घृणा, वैमनस्य, प्रतिशोध, प्रतिस्पर्धा, दमन आदि के भाव दो जुड़े हुए हृदयों में दुराव उत्पन्न कर देता है यानी दोनों को अलग कर देता है।
जब हृदय में मैत्री होती है तो सहजता रहती है, इससे अंगों में किसी भी प्रकार की थिरकन नहीं होती। अप्रभावित अंग शक्तियों के विकास में सहयोगी होते हैं और ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन में निमित्त बनते हैं। जब किसी व्यक्ति के मन में किसी के प्रति दुराव की भावना जागृत होती है तो वह सामने वाले से कुढ़ने लगता है।
यह कुढ़न हर प्रकार से कुंठाओं को बढ़ावा देती है। स्मृति से सम्बंधित कोमल शिराएं भी उससे बच नहीं सकती हैं। प्रयत्न ऐसा ही होना चाहिए कि किसी के प्रति दुराव के भाव का जन्म मन में उत्पन्न ही न हो।

लगाव :
दुराव दो हृदयों के बीच दूरी पैदा करता है। दुराव दरार का प्रतीक है और लगाव आसक्ति का प्रतीक है। लगाव परिवार के प्रति भी हो सकता है और मित्रों के प्रति भी, पदार्थों के प्रति या किसी कार्य के प्रति भी। पद और ऐश्वर्य से भी यह बंधा हुआ है। स्वयं को स्थापित करने की व्यग्रता भी उसमें सम्मलित होती है।
शरीर के प्रति भी एक प्रकार से लगाव रहता है। किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति का सामना उसे न करना पड़े–ऐसा प्रयत्न बराबर होता रहता है। व्यक्ति बहिरंग जगत में उलझकर रह जाता है। यह उलझन विचारों में अनेक प्रकार के आरोह-अवरोह उत्पन्न कर देती है और द्वंद्वों को भी बढ़ावा देती है।
बाहरी दृष्टि से लगता है कि आत्मीयता है, किन्तु इस प्रक्रिया में व्याकुलता को ही विशेष बढ़ावा मिलता है। प्रिय जनों का सामीप्य जब तक रहता है, तब तक एक प्रकार से प्रसन्नता का भाव बना रहता है लेकिन जब उसमें अवरोध उत्पन्न हो जाता है तो आकुलता छा जाती है।
आतुरता की नींव पर खड़ी होने वाली प्रसन्नता का प्रासाद कभी भी स्मृति-कोशोँ को सबल नहीं रहने देता। वह उनमें दुर्बलता ही भरता रहता है।

  भारतीय आध्यात्मिक मनीषियों ने इसीलिए बल देते हुए कहा था--फलाकांक्षा से सदैव दूर रहो अर्थात फल की इच्छा से दूर रहकर कार्य करो। आकांक्षा और यशोभावना से बचो। परिवार की ओर मित्रों की आत्मीयता के वृत्त को अधिक गहरा मत होने दो। उसे शैवाल की तरह ऊपर-ही-ऊपर रहने दो।
  _मैत्री की भावना का पूर्ण विकास करो, उसमें आशा-अपेक्षा, और आसक्ति के किसी भाव  का विकास न होने दो। घृणा, दमन, प्रतिशोध, प्रतिस्पर्धा के भाव से भी दूर रहो। क्रोध, रोष, भय, हीनता, दीनता, भावुकता आदि की भी वृत्ति का संचार न होने दो ताकि तनाव को अवसर मिले।_
    ऐसा होने पर स्थितिप्रज्ञता की ओर स्वयं अभियान होने लगेगा।

विगत और वर्तमान का सन्तुलन :
तनाव, दुराव, लगाव के अलावा मनुष्य की एक कमजोरी और है और वह यह कि विगत के अच्छे प्रसंगों का पुनः-पुनः स्मरण और वर्तमान की दीन स्थिति के प्रति सन्ताप। वे विगत के प्रति अत्यधिक आश्वस्त और वर्तमान के प्रति अत्यधिक हीन भावना लिए होते हैं।
जब प्रसंग छिड़ता है तो विगत को खूब बढ़ा-चढ़ा कर कहते हैं और वर्तमान को बराबर कोसते रहते हैं। वे जीते हैं तो वर्तमान में और गीत गाते हैं विगत के। इससे विचारों में असन्तुलन पैदा होता है।
यद्यपि वर्तमान का आधार विगत ही है पर ऐसा नहीं है कि वर्तमान को सदैव नकार ही दिया जाय। विगत तो बीत ही चुका है, उसका स्मरण वर्तमान के लिए कैसे उपयोगी हो सकता है ? वर्तमान के प्रति हीनता के अनुभव से विकास का जो सहज क्रम है, वह रुकेगा और मनुष्य हमेशा अंधेरे से घिर जाएगा।
बुद्धि की सहज स्थिरता के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य वर्तमान के प्रति पूर्ण निश्चिन्त रहे। उसमें किसी भी प्रकार की न्यूनता न आने दे। कुछ व्यक्तियों का स्वभाव ऐसा होता है कि वे अनागत के लिए लालायित रहते हैं। वे भावी कल्पनाओं का ताना-बाना बुनते रहते हैं। वे अत्यधिक योजनाएं बनाते रहते हैं और केवल वैचारिक धरातल पर ही अपनी सफलता के कुलाबे मिलाते रहते हैं, करना-धरना कुछ भी नहीं।
क्रियाशीलता के अभाव में उन्हें सफलता नहीं मिल पाती। विफलता उनके भीतर सन्ताप भर देती है और व्यर्थ ही स्मृति-कोशोँ पर दबाव डालती है। उनका भविष्य भी नहीं बन पाता और वर्तमान भी कोरा ही रह जाता है। विगत की स्मृति और अनागत की कल्पना से मुक्त रहकर जो व्यक्ति केवल वर्तमान के प्रति जागरूक रहता है, चैतन्य रहता है, वह जहां एक ओर अत्यधिक सफल रहता है, वहीं दूसरी ओर वह बुद्धि की सहज स्थिरता में भी निष्णात होता है।
भविष्य का अनुचिंतन करें पर इतना भी नहीं कि वर्तमान उसी में छिप जाये।

चिन्ता-मुक्ति :
प्रायः अधिकतर व्यक्ति सबसे अधिक अपनी ऊर्जा का अपव्यय चिन्ता में करते हैं। किसी भी कार्य में जरा भी विफलता व्यक्ति को चिन्ता में डालती है। प्रियजन का वियोग हुआ कि व्यक्ति दीन-हीन होकर उसकी स्मृति में आकुल होकर अंधा हो जाता है। सहसा उसके मुंह से निकल पड़ता है–अब क्या होगा ?
विफलता और वियोग दो ऐसे शत्रु हैं जो चिन्ता को अपने साथ ही लाते हैं। परिणाम स्पष्ट है कि उससे चिन्तन में बहुत बड़ा अवरोध उत्पन्न होता है। हृदय पर भी गहरा आघात लगता है। चिन्तन का अवरोध और हृदय पर गहरा आघात भावना की कोमलता को कुचल डालता है और फिर बुद्धि में अस्थिरता आ जाती है। मस्तिष्क अस्त-व्यस्त हो जाता है।
बुद्धि का सन्तुलन यदि बिगड़ गया तो पागलपन ही आशंकित है। दिन-रात चिंताओं में डूबे रहने वाले अपने स्वास्थ्य को गंवा देते हैं, फिर तो उनकी बुद्धि का कुंद होना निश्चित ही है।
परिस्थितियों की प्रतिकूलता में भी जो चिंताओं से मुक्त रह सकने में अभ्यासी होते हैं, वे ही वास्तविक साधक होते हैं। हर्ष-विषाद, लाभ-हानि, सुख-दुःख, जीवन-मरण, निन्दा-श्लाघा आदि युग्मों को एक-दूसरे के प्रतिकूल न मानकर पूरक मानते हैं, दोनों को एक ही डोर के दो छोर समझते हैं, वे सदैव आनन्दचित्त रहते हैं।
उनकी प्रज्ञा स्वतः निर्मल, सूक्ष्म और स्थिर रहती है। साधना-पथ पर अग्रसर होने वाले साधकों के लिए ये सब बातें अति आवश्यक हैं–इतना कहकर चिन्मयानन्द जी मौन साध गए।
संयोग ही कहिये कि योगेश्वरानंद जी को भी हमें पहचानने में देर न लगी। उनसे मेरी वार्ता सात शरीरों और सात तत्वों पर हुई थी किन्तु वह प्रसंग एक प्रकार से अधूरा ही रह गया था। उस समय योगेश्वरानंद वहां किसी अन्य लोक से आये थे।
उनके पास समय का अभाव था.
मेरी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए, फिर मिलूंगा : यह बोलकर अदृश्य हो गए.
(चेतना विकास मिशन :

Ramswaroop Mantri

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