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मुलायम के कठोर फैसले :सरकार बनाने के लिए कांशीराम से मिले; कारसेवकों पर फायरिंग कराई

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नई दिल्ली/लखनऊ

मुलायम सिंह यादव खराब सेहत के चलते मुश्किल में हैं। तबीयत बिगड़ी तो रविवार को उन्हें गुरुग्राम के मेदांता हॉसिप्टल के ICU में शिफ्ट किया गया। परिवार और प्रशंसक सेहत में सुधार की दुआ मांग रहे हैं।

55 साल के राजनीतिक करियर में मुलायम लोगों के लिए कभी लीडर बने तो कभी उनकी निगेटिव छवि सामने आई। हम आपको ऐसी ही 5 कहानियां पढ़ा रहे हैं…

कहानी- 1: जब मुलायम पर चली थीं गोलियां, लेकिन वे बच निकले
तारीख 8 मार्च 1984। मुलायम सिंह उस वक्त लोकतांत्रिक मोर्चा के उत्तर-प्रदेश के स्टेट प्रेसिडेंट थे। मुलायम इटावा दौरे पर निकले थे कि अचानक उनकी कार पर दो बाइक सवार हमलावरों ने ताबड़तोड़ गोलियां चला दी। कार पर कुल 9 राउंड की फायरिंग की गई थी। इस हमले में मुलायम के एक सहयोगी की मौत हो गई थी।

राजनीति में एंट्री करने के 20 साल बाद मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

राजनीति में एंट्री करने के 20 साल बाद मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

वापसी कैसे की?
कांग्रेस को पटखनी दी, चंद्रशेखर के सहारे CM बने

1984 के बाद मुलायम तत्कालीन कांग्रेस की सरकार के खिलाफ और अधिक मुखर हो गए। मुलायम ने इसके बाद जिलेवार दौरा शुरू कर दिया। 1989 के चुनाव में राजीव गांधी की सरकार केंद्र से और एनडी तिवारी की सरकार UP से चली गई। इसके बाद नए मुख्यमंत्री के लिए जनता दल के विधायकों की बैठक हुई। मीटिंग में मुलायम के मुकाबले चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह थे, लेकिन चंद्रशेखर के सहयोग से मुलायम मुख्यमंत्री बन गए।

कहानी-2: कारसेवकों पर गोलियां चलवाई, सत्ता से बाहर हुए
1989 में लोकदल से मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 90 का दौर शुरू होते-होते देशभर में मंडल-कमंडल की लड़ाई शुरू हो गई। ऐसे में 1991 में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए कारसेवा की।

कारसेवकों के विवादिच ढांचे के करीब पहुंचने के बाद मुलायम ने सुरक्षाबलों को गोली चलाने का निर्देश दे दिया। सुरक्षाबलों की इस कार्रवाई में 16 कारसेवकों की मौत हो गई, जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए। बाद में मुलायम ने बताया कि सुरक्षाबलों की कार्रवाई में 28 लोग मारे गए थे।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक गोलीकांड में कोठारी बंधु समेत 16 लोग मारे गए थे।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक गोलीकांड में कोठारी बंधु समेत 16 लोग मारे गए थे।

कारसेवकों पर गोली चलवाने के बाद कांग्रेस ने सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला किया। हालांकि, कांग्रेस के ऐलान से पहले ही मुलायम सिंह यादव ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी। इसके बाद विधानसभा के चुनाव हुए और मुलायम सिंह की पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। 419 सीटों पर हुए चुनाव में मुलायम की पार्टी को 92 सीटें ही मिल पाईं। 221 सीटों पर जीत हासिल करने के बाद भाजपा ने सरकार बना ली।

वापसी कैसे की?
कांशीराम को साथ लाने का मास्टर स्ट्रोक, हार गई भाजपा
6 दिसंबर 1992 को बाबरी के विवादित ढांचा कारसेवकों ने गिरा दी, जिसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया। राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया और उसके 6 महीने बाद विधानसभा के चुनाव हुए। इस चुनाव में भाजपा की जीत तय मानी जा रही थी, लेकिन मुलायम ने धुर-विरोधी बसपा के कांशीराम को साथ ले लिया।

राम रथ पर सवार भाजपा मुलायम के दांव से चित्त हो गई और कल्याण सिंह की सरकार नहीं बन पाई।

राम रथ पर सवार भाजपा मुलायम के दांव से चित्त हो गई और कल्याण सिंह की सरकार नहीं बन पाई।

कांशीराम और मुलायम ने गठबंधन कर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। मुलायम के इस मास्टर स्ट्रोक का असर चुनावी रिजल्ट पर भी दिखा। 422 सीटों वाली विधानसभा में सपा-बसपा गठबंधन को 176 सीटें मिली, जबकि भाजपा बहुमत से दूर हो गई। मुलायम ने अन्य छोटे दलों को साथ मिलाकर सत्ता में वापसी कर ली। मुलायम के सत्ता में आने के बाद UP में एक स्लोगन ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ खूब चर्चित हुआ।

कहानी- 3 : गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती ने सपोर्ट वापस लिया
1993 में मुख्यमंत्री बनने के बाद 2 साल तक सरकार में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, लेकिन 2 जून 1995 को लखनऊ में गेस्ट हाउस कांड हो गया। दरअसल, सहयोगी बसपा ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने के लिए गेस्ट हाउस में विधायकों की बैठक बुलाई थी। मीटिंग शुरू होते ही सपा कार्यकर्ताओं ने गेस्ट हाउस में हंगामा कर दिया।

तस्वीर गेस्ट हाउस के बाहर की है। जान बचने के बाद पत्रकारों से मायावती ने बात की थी।

तस्वीर गेस्ट हाउस के बाहर की है। जान बचने के बाद पत्रकारों से मायावती ने बात की थी।

हंगामे ने धीरे-धीरे विद्रोह का रूप ले लिया और मायावती की भी जान खतरे में आई। हाालंकि, वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों की वजह से मायावती बच गईं। मायावती ने आरोप लगाया कि सपा के कार्यकर्ता उन्हें मारने आए थे, जिससे बसपा खत्म हो जाए।

गेस्ट हाउस कांड के बाद मुलायम की सरकार गिर गई। मायावती ने भाजपा के सपोर्ट से उत्तर प्रदेश में सरकार बना ली। इसके बाद गेस्ट हाउस कांड को लेकर सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं पर शिकंजा कसना शुरू हो जाता है। मुलायम और उनके भाई शिवपाल के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया जाता है।

वापसी कैसे की?
केंद्र में किंगमेकर बने, गुजराल-देवगौड़ा सरकार में रक्षामंत्री रहे
UP की सत्ता से रूखसत होने के बाद मुलायम के राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई थी, लेकिन मुलायम ने नया दांव खेल दिया। इस बार मुलायम UP की वजह केंद्र की ओर रुख कर गए। सपा को 1996 लोकसभा चुनाव में 17 सीटें मिली। 13 दिन में अटल की सरकार गिरने के बाद एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने। मुलायम इस सरकार में रक्षा मंत्री बनाए गए। मुलायम के अलावा कैबिनेट में उनके सहयोगी जेनेश्वर मिश्र और बेनी प्रसाद वर्मा को भी शामिल किया गया।

रक्षामंत्री रहते मुलायम ने चीन को लेकर भारत की नीति का खुलकर विरोध किया। तिब्बत को अलग देश के तौर पर मान्यता देने की बात कही।

रक्षामंत्री रहते मुलायम ने चीन को लेकर भारत की नीति का खुलकर विरोध किया। तिब्बत को अलग देश के तौर पर मान्यता देने की बात कही।

कहानी- 4: 2002 में सबसे बड़ी पार्टी के नेता, मगर सरकार बनाने से चूके
2002 के UP विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनी। 403 सीटों पर हुए चुनाव में सपा को 143 सीटें मिलीं, लेकिन भाजपा-मायावती गठबंधन ने सरकार बना ली। मुलायम सत्ता से फिर दूर रह गए। केंद्र की राजनीति से भी बेदखल हो चुके मुलायम के सियासी करियर पर फिर चर्चा शुरू हो गई।

वापसी कैसे की?
मायावती के विधायकों को तोड़कर सरकार बना ली

5 साल से केंद्र और राज्य सत्ता से बाहर चल रहे मुलायम के लिए 2003 में मायावती और भाजपा के बीच आंतरिक कलह ने संजीवनी का काम किया। सरकार में एक साल के भीतर ही आंतरिक कलह शुरू हो गई, जिसके बाद भाजपा ने समर्थन वापस लेने का फैसला कर लिया।

इधर, मायावती भी अपना इस्तीफा लेकर राजभवन पहुंच गईं। मुलायम ने दोनों के झगड़े का फायदा उठाकर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। मुलायम मुख्यमंत्री बनाए गए। CM बनते ही मुलायम ने मायावती के 98 में से 37 विधायकों को तोड़ लिया।

मुलायम सिंह को तीसरी बार CM पद की शपथ दिलाते तत्कालीन गवर्नर विष्णुकांत शास्त्री।

मुलायम सिंह को तीसरी बार CM पद की शपथ दिलाते तत्कालीन गवर्नर विष्णुकांत शास्त्री।

मायावती ने बागी विधायकों की सदस्यता रद्द करने के लिए अध्यक्ष के पास अपील की, लेकिन अध्यक्ष ने इसे खारिज कर दिया, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने 37 विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया, लेकिन तब तक मुलायम की सरकार का कार्यकाल लगभग पूरा हो चुका था।

कहानी- 5: फंड की कमी से जूझ रही थी सपा
2007 के विधानसभा चुनाव में सपा की करारी हार हुई और पार्टी 100 सीटों के भीतर सिमटकर रह गई। चुनावी हार की समीक्षा में संसाधनों की कमी को इसकी बड़ी वजह माना गया।

वापसी कैसे की?
अमर सिंह के सहारे कॉर्पोरेट की एंट्री
अमर सिंह के सहयोग से मुलायम ने पार्टी में उद्योगपतियों का सहयोग लेना शुरू कर दिया। नतीजा ये हुआ कि सपा की बैठकें फाइव स्टार होटल में होने लगीं। इतना ही नहीं, भाजपा और कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा चंदा हासिल करने वाली पार्टियों की लिस्ट में सपा शामिल हो गई।

अब नीचे ग्राफिक्स में पढ़िए मुलायम से जुड़े विवादों के बारे में…

Ramswaroop Mantri

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