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सच्ची कहानी : नफरत

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 सुधा सिंह 

दुनिया में सबसे बुरी चीज़ है नफ़रत।खासकर जो लोग धर्म, जाति, नस्ल के आधार पर नफ़रत करते है वो लोग सच से नाता तोड़ लेते है । ऐसी ही एक नफ़रत का मामला आज से लगभग 112 वर्ष पूर्व दो ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता जेम्स फ़्रान्सिस थोरपे के साथ हुआ था।

      James Francis Thorpe जिन्हें जिम थोरपे भी कहा जाता है अमेरिकन मूल के रेड इंडियन आदिवासी थे जिनका जन्म एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था जिसके मॉ बाप की मृत्यु भी उनके बचपन में ही हो गई थी।

       बेहद कठिन परिस्थितियों में उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखते हुऐ तथा अपनी प्रतिभा के दम पर खेलों में भी एक मुक़ाम हासिल कर लिया था । अपनी पढ़ाई व दूसरी अन्य ज़रूरतें पूरी करने के लिए वह खेल दिखाकर रोज़ाना पॉच डालर कमा लेते थे । 

वर्ष 1912 के स्टॉकहाम ओलंपिक में वह  सबसे कठिन प्रतिस्पर्धा के खिलाड़ी थे। डेकाथलॉन में दस तरह के खेल में भाग लेना पड़ता था और पेंटाथलॉन में पॉच तरह के खेल में।

       इन दोनों प्रतिस्पर्धाओं में थोरपे ने बहुत बड़े अंतर से स्वर्ण पदक हासिल किये थे। प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले उनके जूते तक चोरी हो गये थे और उन्होंने किसी तरह कबाड़ से दो तरह के जूतों का इंतज़ाम किया था जिन्हें किसी तरह पैरों में फँसाकर 1500 मीटर की दौड़ में सबसे आगे निकल गये थे।

      ओलंपिक के दो स्वर्ण पदक जीतने के बाद वह सोच रहे थे कि अब उन्हें कष्टों से मुक्ति मिल जायेगी और वह आराम से ज़िंदगी गुज़ार सकेंगे पर उनका ऐसा नसीब ऐसा नहीं था ।

अमेरिका में उन दिनों नस्लीय आधार पर बहुत ज़्यादा भेदभाव था। वहॉ के मूल नागरिकों यानि अशवेतो व रेड इंडियनस को नागरिकता तक का अधिकार नहीं था और उन्हे श्वेतों यानि यूरोपियनस की नफ़रत का शिकार होना पड़ता था क्योंकि सत्ता पर इन्हीं का क़ब्ज़ा था। 

     अमेरिका के श्वेत समाज को यह हज़म नहीं हो रहा था कि एक आदिवासी रेड इंडियन दो ओलंपिक स्वर्ण पदक कैसे जीत सकता है।

      नस्लीय भावनाओं से सरोबार एक अमेरिकी अख़बार ने खबर छाप दी कि एक पेशेवर खिलाड़ी ओलंपिक में कैसे भाग ले सकता है । चूँकि जिम थोरपे अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए खेल दिखाकर मात्र पॉच डॉलर तक कमा लेते थे तो उन्हें एक पेशेवर खिलाड़ी बताने की सभी अख़बारों में होड़ लग गई और तब कि ओलंपिक कमेटी ने जिम थोरपे के दोनों ओलंपिक स्वर्ण पदक वापस ले लिये।

       जिम थोरपे बहुत रोया, गिड़गिड़ाया पर उसकी एक नहीं सुनी गई क्योंकि तब का अमेरिकी जन मानस घोर नस्लीय नफ़रत का शिकार था। 

बेचारा जिम थोरपे फिर से उसी पुरानी ज़िंदगी पर लौट आया और किसी तरह मेहनत मज़दूरी करते हुऐ अपनी ज़िंदगी जीने लगा। समस्त अमेरिका वासी बेहद ज़लील करते रहते थे और इन्हीं हालात में वर्ष 1953 में उसकी मृत्यु हो गई ।

      इस बीच अमेरिका में नस्लीय व रंग भेद के ख़िलाफ़ काफ़ी आंदोलन हुऐ और अमेरिका वासी भी समझ चुके थे कि नफ़रत के सहारे देश और वह खुद आगे नहीं बढ़ सकते तो अश्वेतो व रेड इंडियनस को भी पूरे अधिकार दे दिये गये।

     जिम थोरपे की मृत्यु के बाद अमेरिका को लगा कि उसके साथ घोर अन्याय हुआ था तो पूरे मामले की पुनः जॉच की गई और ओलंपिक समिति के समक्ष इस मामले को ज़ोरदार तरीक़े से उठाया गया।

     ओलंपिक समिति को मानना पड़ा कि जिम थोरपे से स्वर्ण पदक वापस लेना भारी भूल थी और उनकी मृत्यु के 30 साल बाद उनके जीते हुऐ पदक क्षमा याचना सहित उनके पुत्र को लौटा दिये।

जिस सम्मान के लिये वह पूरी ज़िंदगी संघर्ष करते रहे वह उन्हें जीते जी तो नहीं मिल सका पर मृत्यु के 30 साल बाद ज़रूर मिल गया ।काश यह सम्मान उन्हें अपने जीवन में ही मिल सकता।

    दरअसल नफ़रत चाहे वह किसी भी वजह से हो यह एक मानसिक बीमारी है जो व्यक्ति को न सच देखने देती हैं और न ही उसे स्वीकार करने देती हैं । इस बीमारी से जितना दूर रहा जाये उसी मे कल्याण है।

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