(दु:ख गहरा है, इसलिए कहानी थोड़ी करूणाद्र व लंबी है,पर पढ़ने के लिए वक्त जरूर निकालिएगा)
– वीरेंद्र भदौरिया
यह उन दिनों की बात है, जब भारत के आसमान में एनटीए या ‘नीट’ जैसे उपग्रहों का उदय नहीं हुआ था , और व्यापम जैसे घोटालों को अंजाम देने वाले किरदारों व गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह उग आई आज जैसी कोचिंग की मंहगी दुकानों का कहीं अता-पता न था,इसलिए गांव देहात के हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में पढ़े लिखे प्रतिभाशाली बच्चों के लिए डाक्टर बनने का अपना ख्वाब पूरा करने की पूरी गुंजाइश थी।
मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले के दूरस्थ आदिवासी अंचल के निवासी व सरकारी स्कूल के अध्यापक के मेधावी पुत्र दिनेश गोयल, प्रि मेडिकल टेस्ट (पीएमटी) पास कर अपने बचपन से देखे सपने को हकीकत में बदलने के लिए, गजरा राजा मेडिकल कॉलेज ग्वालियर में प्रवेश पाने में सफल रहे।
एमबीबीएस की डिग्री मिलने के बाद मध्यप्रदेश शासन स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत ‘मेडिकल आफिसर’ के पद पर उनकी तैनाती हो जाती है। चिकित्सा विज्ञान को गहराई से जानने की अतृप्त आकांक्षा उन्हें आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है, तथा कठोर परिश्रम के बूते उन्हें एम.एस.(शल्य चिकित्सा) पाठ्यक्रम हेतु प्रदेश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज इंदौर में में एडमिशन मिल गया।
इंदौर प्रवास के दौरान डा.दिनेश गोयल मेरे संपर्क में आए। मैंने उन्हें खाना पीना भूलकर मेडिकल कॉलेज के सर्जरी विभाग में दिन रात खटते देखा, सीखने का ऐसा दुर्लभ जुनून बहुत कम ही देखने को मिलता है। उनके शिक्षक कहा करते थे कि दिनेश, तुम एक दिन मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर ही नहीं बनोगे, अपितु शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में दूर दूर तक तुम्हारी ख्याति विस्तारित होगी।
उच्च अंकों के साथ एम.एस.सर्जरी की उपाधि लेकर डा.गोयल जिला चिकित्सालय श्योपुर लौट आए, लेकिन अपने शिक्षकों के प्रेरक शब्द उन्हें लगातार बेचैन करते रहे, अब वे शल्यक्रिया के सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र ‘न्यूरो सर्जरी’ की ओर आकृष्ट हुए, कठिन प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से उन्हें न्यूरोसर्जरी में सुपर स्पेशियलिटी कोर्स ‘एमसीएच’ में प्रवेश का अनेक कालेजों से आफर मिला, लेकिन उन्होंने गजरा राजा मेडिकल कॉलेज ग्वालियर के न्यूरोसर्जरी डिपार्टमेंट को चुना। यहां यह उल्लेख करना अप्रांसगिक न होगा कि भारत का पहला न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट गजरा राजा मेडिकल कॉलेज (जीआरएमसी) में उस समय देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित न्यूरो सर्जन डा.धारकर के प्रयासों से स्थापित हुआ था। जीआरएमसी ने एक ऐसा भी स्वर्णिम दौर देखा है,जब पूरे देश से न्यूरोलॉजी से संबंधित पेशेंट्स इलाज के लिए ग्वालियर आया करते थे,पहले वाली बात तो नहीं रही लेकिन आज भी यहां बेहतरीन चिकित्सक अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
डा. दिनेश गोयल न्यूरो सर्जन बनने के लिए फिर छात्र बनते हैं, वेतन बंद हो जाता है, स्टाइपेंड मिलने लगता है। तीन साल तक मनोयोग पूर्वक पढ़ाई व मस्तिष्क संबंधी जटिल शल्यक्रिया का सतत अभ्यास करने के बाद कोर्स पूरा होने के बाद जीआरएमसी द्वारा उन्हें स्वास्थ्य संचालनालय भोपाल के लिए कार्यमुक्त कर दिया गया। वे भोपाल पहुंच कर संचालनालय में विधिवत ज्वाइनिंग देकर अपनी पोस्टिंग आर्डर की प्रतीक्षा करने लगते हैं।
यहीं से कहानी में भांति भांति के ट्विस्ट आने शुरू होते हैं, पहली बार सरकारी तंत्र की भूल-भुलैया से दो चार हुए डा.गोयल, स्वास्थ्य संचालनालय के हाकिमों व बाबुओं से मिल कर किसी भी चिकित्सालय में पदस्थ करने की विनती करते करते थक जाते हैं, लेकिन सात महीनों तक किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती है। इस बीच छोटे कर्मचारियों द्वारा इशारों-इशारों में उन्हें यह समझाइश दी जाती है कि, यहां बिना लिए दिए कुछ न होगा,इसी तरह भटकते रहोगे,लेकिन सीधे सादे डा.गोयल इन इशारों पर यकीन नहीं कर पाते हैं। एक एमबीबीएस,एमएस सर्जरी व एमसीएच (न्यूरोसर्जरी) चिकित्सक सात महीनों तक संचालनालय के गलियारों में भटकता रहा,इसी बीच जीआरएमसी द्वारा सीनियर रेजिडेंट के पद हेतु आवेदन पत्र आमंत्रित किए जाते हैं,डा.गोयल ने भी अपना आवेदन भेज दिया। साक्षात्कार के बाद उन्हें चयनित भी कर लिया गया, लेकिन सरकारी सेवा में होने से उनसे अपने नियोक्ता यानी स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रदत्त अनापत्ति प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने की अपेक्षा की गई।
सात महीनों से वेतन न मिलने से पहले से हारे थके,हताश निराश व टूट चुके डा.गोयल को उम्मीद की नयी किरण नजर आती है, और वे फिर से उत्साह बटोर कर उक्तानुसार वांछित अनापत्ति प्रमाण-पत्र जारी करने के अनुनय विनय के साथ फिर बड़े हाकिमों की ड्योढ़ी पर माथा टेकने लगते हैं, तमाम झिड़कियां व जलालत झेलते हुए एक दिन वे हिम्मत करके तत्कालीन स्वास्थ्य आयुक्त (जो दुर्भाग्यवश स्वयं डाक्टर हैं,नाम का उल्लेख करना ठीक नहीं है) के समक्ष हाजिर होते हैं, पूरी बात सुनने के बाद अचानक चैतन्यावस्था में आए श्रीमान जी द्वारा आवेदित अनापत्ति प्रमाण-पत्र जारी करने के बजाय, आनन फानन में जिला चिकित्सालय श्योपुर में ज्वाइन करने का फरमान थमा दिया जाता है। सरकार बहादुर का हुक्म सर माथे लगाकर डा.गोयल चिकित्सा शास्त्र की भारी भरकम डिग्रियों की गठरी लेकर पुनः जिला चिकित्सालय श्योपुर पहुंच जाते हैं, और चुपचाप अपने काम में लग जाते हैं।
श्योपुर राजस्थान की सीमा से लगा हुआ आदिवासी बहुल जिला है, जहां सहरिया आदिवासियों की बड़ी आबादी निवास करती है, गरीबी, भुखमरी व मातृ-शिशु कुपोषण के मामले में यह मध्यप्रदेश में सबसे अग्रणी है। आर्थिक रूप से संपन्न लोग तो ग्वालियर, भोपाल, इंदौर या दिल्ली-मुंबई में मंहगा इलाज एफोर्ड कर सकते हैं, किंतु ब्रेन ट्यूमर,ब्रेन हैमरेज तथा कैंसर जैसे असाध्य रोगों से पीड़ित गरीब आदिवासियों व निर्धनों के लिए बिना इलाज मौत के मुंह में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है। ऐसे असहाय रोगियों के लिए आज डा.दिनेश गोयल देवदूत बनकर उभरे हैं।
जिला चिकित्सालय श्योपुर में जटिल शल्यक्रिया व उसके लिए जरूरी इक्विपमेंट उपलब्ध नहीं हैं, ऐसी स्थिति में रिटायर्ड शिक्षक पिता से धनराशि मांगकर डा.गोयल ने अपने प्रयासों से कुछ उपकरण जुटाए हैं, और इन्हीं सीमित साधनों से उन्होंने बिना एक पाई लिए,ब्रेन ट्यूमर, ब्रेन हेमरेज व कैंसर से पीड़ित अनेकानेक मरीजों के आपरेशन सफलतापूर्वक संपन्न कर दिए हैं।
श्योपुर जैसी जगह में इक्का-दुक्का गरीब मरीजों को ही डा.गोयल की काबिलियत का लाभ मिल सकता है, लेकिन यदि उन्हें किसी मेडिकल कॉलेज में पदस्थ किया गया होता तो अब तक हजारों मरीजों को जीवनदान मिल जाता,पर यह कल्पना तो हमारे और आप जैसे साधारण लोग कर सकते हैं, यदि स्वास्थ्य विभाग डा. गोयल को श्योपुर में ही बनाए रखने के लिए कृत संकल्पित है तो श्योपुर के जिला चिकित्सालय में न्यूरोसर्जरी के लिए आवश्यक साजो सामान ही मुहैया करा दे।
स्वास्थ्य महकमे की कमान संभालने वाले सीनियर आईएएस अधिकारियों को ऐसी मामूली बातों पर गौर करने की फुर्सत कहां है? वे आपको हमेशा बिजी नजर आते हैं,पर उनकी निगाहें हमेशा आसमान की ओर रहती हैं, उनके पास जमीन की ओर देखने का समय ही नहीं है। अपने राजनैतिक आकाओं की चापलूसी व लगातार चलने वाली अकारथ मीटिंगों से फुर्सत मिले तब कहीं उनका ध्यान जमीनी सच्चाइयों की ओर जाता। न नौ मन तेल होगा और न राधा जी नाचेंगी। यथास्थिति कायम रहेगी। डा.गोयल के ऊपर यदि किसी बड़े नेता का हाथ होता तो क्या स्वास्थ्य आयुक्त एक प्रतिभाशाली चिकित्सक के साथ ऐसा भद्दा मजाक करने का साहस जुटा पाते?
डा.दिनेश गोयल के प्रयासों से प्रदेश के किसी भी जिला चिकित्सालय में सफलता पूर्वक न्यूरोसर्जरी करने की पहली उपलब्धि श्योपुर के खाते में गई है। स्थानीय सामाजिक संगठनों की ओर से सार्वजनिक समारोह आयोजित कर डा.दिनेश गोयल के स्वागत व अभिनंदन का सिलसिला थम नहीं रहा है। आज श्योपुर वासी अपने इस होनहार डाक्टर पर गर्व कर रहे हैं। यह भी विचार कीजिए कि यह सब डा.गोयल ने अपने को खतरे में डालकर किया है, यदि कोई आपरेशन विफल हो जाता तो उनकी तारीफ में ताली बजाने वाले उन्हें जेल भेजने की मांग उठाने में तनिक देर न करते और स्वास्थ्य मोहकमा जिसे सात महीनों तक पोस्टिंग आर्डर निकालने की फुर्सत नहीं मिली, उन्हें निलंबित व बर्खास्त करने में एक मिनट की देरी न करता।
डा.दिनेश गोयल तो चिकित्सक होने का धर्म निभा रहे हैं, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि, मध्यप्रदेश की कथित संवेदनशील सरकार द्वारा कर्तव्यनिष्ठा के बदले उन्हें जो मानसिक प्रताड़ना दी जा रही है, उससे वे कैसे उबर पाएंगे?
डा. गोयल से काफी जूनियर चिकित्सकों को भी प्रथम श्रेणी ग्रेड पर पदोन्नत किया जा चुका है,पर डा.गोयल के मामले में कृपा कहीं अटकी हुई है, संचालनालय में पदस्थ रहने की सात माह की अवधि का वेतन अभी तक नहीं दिया गया है। अध्ययन अवकाश का नियमितीकरण अब तक नहीं किया जा सका। जीआरएमसी द्वारा सीनियर रेजिडेंट के लिए चयनित किए जाने पर भी इस सुपर स्पेशलिस्ट डाक्टर को रिलीव्ह नहीं किया गया है।
एक ओर निर्धारित मानदंडों के अनुरूप फैकल्टी की उपलब्धता न होने से प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों की मान्यता पर खतरा मंडराने की खबरें अक्सर समाचार पत्रों की सुर्खियां बनती रहती हैं, दूसरी ओर मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर बनने की योग्यता धारक सुयोग्य व सुपात्र न्यूरो सर्जन से जुकाम बुखार के आउट डोर पेशेंट देखने का काम लिया जा रहा है।
डा. दिनेश गोयल के प्रति मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य विभाग का रवैया विचलित करने वाला है, सरकारी विभागों के ऐसे ही तकलीफदेह रवैए के कारण प्रतिभाशाली युवा लगातार निजी क्षेत्रों का रूख कर रहे हैं। क्या ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में कोई आदमी अपना काम ठीक से कर सकता है?
मुझे अनेकों ऐसे ,कर्मठ, ईमानदार, जहीन और संवेदनशील आईएएस अफसरों के साथ काम करने का सौभाग्य मिला है, जो हमेशा इतने सजग रहते थे कि, छोटी से छोटी बात भी उनकी नजर से छूट नहीं पाती थी, फैसला लेने में तनिक देर नहीं करते थे,योग्य अधिकारियों व कर्मचारियों को पूरा प्रोत्साहन देते थे, इसी निजी तजुर्बे के आधार पर मैं पूरी जिम्मेदारी से यह कह सकता हूं कि लंबे समय से स्वास्थ्य विभाग की कमान बेहद खराब (समझदार के लिए इतनी उपाधि काफी है) अफसरों को सौंपी जा रही है, एक सुपर स्पेशियलिटी उपाधि धारक डाक्टर संचालनालय में ज्वाइन करने के बाद सात महीनों तक पोस्टिंग आर्डर की प्रतीक्षा करता रहता है और स्वास्थ्य आयुक्त को न भनक लगती है,और न अपनी इस अक्षम्य चूक का तनिक भी मलाल होता है।यह संयोग है या कि प्रयोग, भगवान जगन्नाथ जी जानें।
आप सबसे हाथ जोड़कर विनती है कि इस पोस्ट को अधिकाधिक शेयर करें, कदाचित मौजूदा स्वास्थ्य आयुक्त तक बात पहुंच जाए और उन्हें आईएएस चुने जाते समय पत्र पत्रिकाओं को दिए गए इंटरव्यू में कही गई वह बात शायद याद आ जाए कि ” मैंने देश सेवा के लिए देश की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा में जाने का निर्णय लिया है “। आत्मचिंतन कीजिए कि आप ये कैसी सेवा कर रहे हैं ? सीनियर होने के बाद इंट्री समय देश के सबसे प्रतिभाशाली माने गए लोगों की प्रतिभा को कालांतर में जंग क्यों लग जाता है? फ़ुरसत मिले तो सोचिएगा कभी। अपने अहंकार को सीमा से अधिक बढ़ने से रोकिए श्रीमान!

