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आत्मा को लेकर व्याप्त भ्रांतियों पर दो- शब्द 

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     डॉ. विकास मानव 

आत्मा न मरता, न जलता, कहने का अर्थ आत्मा का अस्तित्व कभी नाश ही नहीं होता है। 

अब ये बात कृष्ण ने भगवत गीता में कही तो लोगों को धोखा हुआ की सत्य ही होगा। मैंने कई बार इस बात को पूरी जिम्मेदारी से कहा है तुम्हें कृष्ण की बात को समझने के लिए कृष्ण ही होना होगा। 

    जहां तुम खड़े हो वहां से भगवत गीता या कृष्ण को समझने का भ्रम न पाल लो। जगत में जो कुछ भी है वो सभी आत्मा का ही प्रकाश है। यही चेतना को निर्मित करती है।

    जितने ज्यादा तुम्हारे पास आत्मा के गुण होंगे उतने ही तुम चेतना सम्पन्न होंगे। लेकिन ये भी देखने की एक दृष्टि मात्र ही है। 

     जगत को भी पूरी सफलता से जिया जा सकता है | जब एक व्यक्ति वैभव पूर्ण जीवन जीता है तो सभी को शिकायतें होती ही हैं। रावण चालीस हजार साल का वैभव पूर्ण जीवन जीकर इस धरती से गया। वो धरती से सीधा ही परमधाम गया। तो इतना भी बुरा नहीं हो सकता है। 

    लोगों को रावण को लेकर एक नजरिया हो सकता है। एक बार एक सत्संग में ब्राह्मण ने मुझसे कहा रावण ने सीता का हरण किया। हमने पूछ लिया, प्रेम का इजहार अपराध नहीं. राम को सुपरणखा अपराधिनी लगी तो, उसे उसके घर वालों को सौंप सकते थे. यदि कोई तुम्हारी बहन का नाक कान काट ले तो तुम उस व्यक्ति का क्या करोगे? समर्थ होकर भी उसने सीता का क़ुछ नहीं काटा. रेप गेंगरेप मर्डर भी कर सकता था. पूरे सम्मान से, महल के बाहर अशोक वाटिका के सात्विक परिवेश में उनको रखा. 

इसलिए हम चाहते हैं की बात को कृष्ण के तरीके से न समझें।बल्कि सत्य को स्वीकारने की ताकत अपने अंदर पैदा करें।आत्मा का जो भी सत्य है उसे हम यहां कहेंगे। तुम्हारे अंदर बहुत सारे झूठे सत्य पड़े हैं जिन पर तुमने कभी विचार ही नहीं किया है। जब कोई बात बार-बार कही जाए तो शंका स्वाभाविक है। 

     जब कोई बात बार-बार कही जाए तो वो गलत ही होती है। जब कोई बात ताकत लगाकर कही जाए तो वो अक्सर गलत होती है। जब कहा गया आत्मा अमर है। ये कहा ही क्यों गया। अगर ये सनातन सत्य है तो अर्जुन को पहले से क्यों पता नहीं था ? 

     जितना कहा गया आत्मा अजर अमर है उससे विचार और गहरा हुआ। जितना कहा गया आत्मा अजर अमर है उतनी ही आत्मा शंका के घेरे में आ गई।

     जब तक आप मन के जगत में हैं तब तक मन अजर अमर है।जैसे ही तुम आत्मा के जगत में कदम रखोगे मन मरना शुरू हो जाएगा। अगर किसी को पता चल जाए उसकी मृत्यु अब सुनिश्चित है | 

तो उसके अंदर भय की क्या स्थिति होती है? 

     इसे तो कोई भी विचार कर सकता है। अगर मन को ये ज्ञात हो जाए उसकी मृत्यु होने वाली है। तो उसकी बेचैनी का अंदाज क्यों नहीं लगाते हो ? 

     तुम्हारे वो सभी कृत्य जिसमें ध्यान, ज्ञान जैसा कुछ करते हो तो ये तो मन की ही हत्या की साजिश है। तो मन आपके ऐसे कामों में क्यों न बाधा डाले। वही मन करता है।

मन के जगत में क्या चलता है ? 

   छल, कपट, व्यभिचार, पाप ऐसा ही कुछ जो गलत है। वास्तव में गलत क्या है जो मन को पुष्ट करे वही मन को अनुकूल होगा। तो जो कुछ भी आत्मा से विपरीत है वो सभी मन के जगत का हिस्सा है। इसे ही आप नकारात्मक कहते हैं। 

     जो कुछ भी मन के विपरीत है वो आत्मा के जगत का हिस्सा होता है। इसे सकारात्मक कहा जाता है। ये जो कुछ भी सकारात्मक है वो चेतना के ही कारण है। अब इसे ऐसे भी कह सकते हैं जो कुछ भी चेतना या आत्मा के जगत से आता है वो ही सकारात्मक है।

     चेतना जैसे-जैसे बढ़ेगी तुम बैराग में जाते ही जाओगे। ये धोखा मत पाल लेना कि हम संत होकर दुकान सजा सकते हैं।और मन के जगत में दाल रोटी चलाने के लिए कुछ तो चालबाजी करनी ही होगी।

      इसीलिए कहा जाता है मन पर नियंत्रण करें। जहां मन पर नियंत्रण शुरू किया खुली जंग शुरू हो जाती है। वास्तव में मन पर नियंत्रण करें ऐसा कह दिया जाता है। पर करना गलत चीजों पर नियंत्रण है। क्यों की इस मन के जगत में जो कुछ भी सही कहे जाने वाला हो रहा है वो भी मन ही कर रहा है।

     प्रेम, आनंद, सुख, शांति, पवित्रता, शक्ति और ज्ञान ये सातों आत्मा के गुण हैं। आत्मा के जगत में चलते हैं। चलना भी चाहिए इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है | 

     जब प्रेम, आनंद, शांति, पवित्रता, शक्ति, ज्ञान को मन के जगत में चलाने की कोशिश करते हैं तो मन को बहुत जलन होती है। ये सभी बहुमूल्य हैं। लेकिन मन को स्वीकार नहीं। अगर इन्हें प्रेम, आनंद, पवित्रता आदि को मन के जगत में चलाना है तो इन्हें पहले मन के अनुकूल बनाना होगा। अन्यथा मन तुम्हें करने नहीं देगा।

     आप मन के जगत में साधना, तपस्या, तंत्र, मंत्र करके देख लीजिए। भक्ति करके देख लीजिए ये मन को स्वीकार ही नहीं होगा और वो करने ही नहीं देगा जब आप किसी ऐसे कार्य का संकल्प लेते हैं तो ये मन से खुली जंग का ऐलान है। 

     तो मन के संसार में रहना है तो मन का होकर रह लीजिए या फिर खुद को समझाइए। अब जबरदस्ती लगे हो ध्यान करने में, इससे और भी अशान्ति मिलेगी।

    आत्मा के जगत की चीजें मन के जगत में आ जाएं तो मन बेचैन हो जाता है। अब तुम उसमें शांति ढूंढते रहो कहां से मिलेगी ? 

    लोग ध्यान, ज्ञान करने में लगे हैं। कोई फायदा नहीं होगा।इसलिए कहा जाता है यदि भक्ति, ज्ञान, ध्यान, तंत्र मंत्र करना ही है तो पहले विश्वास, दृढ़ इच्छा शक्ति को पैदा करो। ये दोनों ही शब्द आते हैं आत्मा के जगत से। जब भी आप ध्यान, भक्ति, ज्ञान, योग या हर वो विधान जो तुम्हें आत्मा के जगत से संपर्क करा सकता है।

     ऐसी हर वस्तु व्यवस्था से मन को दिक्कत होगी ही। आप मन के सभी अनुशासन को मान लीजिए और खूब रहिए मन के जगत में; जीवन व्यवधान रहित होगा। लेकिन जैसे ही तुमने आत्मा जगत का विचार भी किया; बात बिगड़ने लगेगी। तुमने देखा होगा जब तुम देवी देवता पूजा पाठ शुरू करते हो तो काम बनने से ज्यादा बिगड़ना शुरू हो जाते हैं।

     उसका मुख्य कारण यही है मन को सख्त एतराज है। मन के जगत में मन का अनुशासन पालन करिए।

     ठीक इसी प्रकार से जब तुम आत्मा के जगत में होते हो तो आत्मा को मन की हर विषय और वस्तु से सख्त एतराज है। आप मन के जगत का कुछ भी लेकर आत्मा के जगत में नहीं जा सकते हो। मन के जगत में आत्मा के जगत का सब कुछ पाप है और आत्मा के जगत में मन के संसार का सब कुछ पाप है। 

     अगर आत्मा के जगत का कुछ भी मन के जगत को स्वीकार हो गया तो मन को भय है; उसका संसार उजड़ जाएगा। आत्मा के सामने मन की चलती तो नहीं है। तो वो चालबाजियाँ करता है। आत्मा के जगत का सारा काम दिन के प्रकाश का है या यूं कहें होश का, जागे हुए का है और मन का सारा संसार है मूर्छा का, नींद का, अंधेरे का। 

     अब दोनों का अलग ही तरीके का व्यवसाय है। अब यदि मन के जगत में प्रकाश आने लगे तो मन की मृत्यु होना शुरू हो जाती है।

    तो मन के जगत में भी दो स्थान हैं एक जहां अभी तुम खड़े हो। दूसरी ओर जहां मन और आत्मा की सीमा मिलती है। मन आखिर श्वांस तक कोशिश करता है अपने संसार के एक भी अनुयाई को अपने यहाँ से जाने नहीं देगा। मन अपने संसार का महात्मा है। 

     मन अपने संसार का कृष्ण है ।तो मन और आत्मा में जंग बनी ही रहती है। मन के जगत का भय है उसका एक भी संसारी आत्मा के संसार में न चल जाए और आत्मा की कोशिश है मन के संसार से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करना। ये सत्संग, ध्यान, ज्ञान, होश पूर्ण हो जाओ ऐसा बहुत कुछ क्या है ? 

ये है मन के संसार से लोगों को आत्मा के संसार में खींचना।

    आत्मा की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। उसकी सीमा एक तरफ तो मन से लगी है दूसरी तरफ परमात्मा से मिलती है। आत्मा को लगता है वो ज्यादा बड़ा महात्मा है तो वो अपनी संख्या बढ़ाने के लिए मन के जगत के लोगों को कहता ही रहता है। पहले आत्मा के जगत में आओ तब सोना बनाने का रहस्य बताएंगे | अब आत्मा के जगत में पहुँचने के बाद सोने चांदी का करें क्या ? 

   मनुष्य को तो मन के जगत में जहां रह रहा है वहीं धन आदि चाहिए होता है। लेकिन मनुष्य इन आत्मा और मन से भी ज्यादा चालबाज है।वो दोनों को ही खुश करने का ढोंग करता है। वो रहता तो मन के ही जगत में है लेकिन आत्मा के जगत की सारी समृद्धि उसे यहीं चाहिए। शांति, सुख, प्रेम, पवित्रता, शक्ति, सत्यता, परमानंद, ज्ञान, सहन शक्ति ये तो आत्मा के क्षेत्र की चीजें हैं। तो मनुष्य को ये प्रेम, परम आनंद, ये मन के ही जगत में चाहिए। 

    तो मनुष्य दोनों मन और आत्मा के साथ कपट करता रहता है। उसने अपना ही एक जगत कल्पना का जगत बना लिया है। जहां न मन की पहुँच है और न ही आत्मा की पहुँच है। 

     अब मन भी लगा है पहले वर्तमान हो जाओ तब बात करें। आत्मा को है पहले मन के जगत में आओ तबही कुछ किया जा सकता है। मनुष्य जिस कल्पना के जगत में रहता है वहां किसी की कुछ नहीं चलती है। लेकिन मनुष्य इन दोनों से ही परेशान है उसने अपनी ही दुनियां बना रखी है।

      तो मन के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है जो तुम्हें कल्पना के जगत से निकाल कर वर्तमान मन के जगत में ला सके। तो यहाँ काम करती हैं आत्मा के जगत से संपर्क की विधियाँ। 

जैसे कि ध्यान।

ध्यान करिए वर्तमान हो जाइए। जैसे कोई बच्चा कुएं में गिर जाए। किसी ने निकाला तो माता पिता उसे बहुत से धन्यवाद देते हैं। अगर अब वही व्यक्ति ये कहे ये बच्चा मैंने कुएं से निकाला है हमारा है। हम ले जायेंगे।  हो गया विवाद। बस मन और आत्मा के बीच भी यही सब है।

Ramswaroop Mantri

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