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*वैदिक दर्शन : चर एव~ चलते रहो*

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  डॉ. विकास मानव

हम चरैवेति चरैवेति शब्द सुनते रहते हैं। इसका मतलब होता है,चलते रहो चलते रहो।
आज समझने कि कोशिश करते हैं की यह शब्द कहाँ, क्यों,कैसे आया.
नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम |
पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति॥

  • ऐतरेय उपनिषद (अध्याय 3, खण्ड 3)
    (रोहित, श्रान्ताय नाना श्रीः अस्ति इति शुश्रुम, नृषद्वरः जनः पापः, इन्द्रः इत् चरतः सखा (चर एव इति)
    अर्थ – हे रोहित, परिश्रम से थकने वाले व्यक्ति को भांति-भांति की श्री यानी वैभव/संपदा प्राप्त होती हैं ऐसा हमने ज्ञानी जनों से सुना है । एक ही स्थान पर निष्क्रिय बैठे रहने वाले विद्वान व्यक्ति तक को लोग तुच्छ मानते हैं। विचरण में लगे जन का इन्द्र यानी ईश्वर साथी होता है। अतः तुम चलते ही रहो (विचरण ही करते रहो, (चर एव ).

पुष्पिण्यौ चरतो जङ्घे भूष्णुरात्मा फलग्रहिः।
शेरेऽस्य सर्वे पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हतश्चरैवेति॥
~(ऐतरेय 3/3)
(चरतः जङ्घे पुष्पिण्यौ, भूष्णुः आत्मा फलग्रहिः, अस्य श्रमेण प्रपथे हतः सर्वे पाप्मानः शेरे, (चर एव इति)
अर्थ – निरंतर चलने वाले की जंघाएं पुष्पित होती हैं, अर्थात उस वृक्ष की शाखाओं-उपशाखाओं की भांति होती है जिन पर सुगंधित एवं फलीभूत होने वाले फूल लगते हैं, और जिसका शरीर बढ़ते हुए वृक्ष की भांति फलों से पूरित होता है, अर्थात वह भी फलग्रहण करता है। प्रकृष्ट मार्गों पर श्रम के साथ चलते हुए उसके समस्त पाप नष्ट होकर सो जाते हैं, अर्थात निष्प्रभावी हो जाते हैं। अतः तुम चलते ही रहो, विचरण ही करते रहो, (चर एव).

आस्ते भग आसीनस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः।
शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगश्चरैवेति॥
~ (ऐतरेय 3/3)
(आसीनस्य भग आस्ते, तिष्ठतः ऊर्ध्वः तिष्ठति, निपद्यमानस्य शेते, चरतः भगः चराति, (चर एव इति)
अर्थ – जो मनुष्य बैठा रहता है, उसका सौभाग्य (भग) भी रुका रहता है। जो उठ खड़ा होता है उसका सौभाग्य भी उसी प्रकार उठता है। जो पड़ा या लेटा रहता है उसका सौभाग्य भी सो जाता है। और जो विचरण में लगता है उसका सौभाग्य भी चलने लगता है। इसलिए तुम विचरण ही करते रहो (चर एव).

कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः।
उत्तिष्ठस्त्रेता भवति कृतं संपाद्यते चरंश्चरैवेति॥
~ (ऐतरेय 3/3)

(शयानः कलिः भवति, संजिहानः तु द्वापरः, उत्तिष्ठः त्रेता भवति, चरन् कृतं संपाद्यते, चर एव इति।).
अर्थ – शयन की अवस्था कलियुग के समान है, जगकर सचेत होना द्वापर के समान है, उठ खड़ा होना त्रेता सदृश है और उद्यम में संलग्न एवं चलनशील होना कृतयुग (सत्ययुग) के समान है । अतः तुम चलते ही रहो (चर एव).

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्।
सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति॥
~ (ऐतरेय 3/ 3)
(चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुम् उदुम्बरम्, सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यः चरन् न तन्द्रयते चर एव इति).
इतस्ततः भ्रमण करते हुए मनुष्य को मधु (शहद) प्राप्त होता है, उसे उदुम्बर (गूलर?) सरीखे सुस्वादु फल मिलते हैं। सूर्य की श्रेष्ठता को तो देखो जो विचरणरत रहते हुए आलस्य नहीं करता है। उसी प्रकार तुम भी चलते रहो (चर एव)।

Ramswaroop Mantri

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