स्वदेश सिन्हा
डाॅक्टर सलमान अरशद मेरे तीन दशकों से वामपंथी आंदोलन के साथी रहे हैं। 80-90 का दशक छात्र आंदोलनों और जन संघर्षों से भरा हुआ था, उसी दौरान सलमान भी एक वामपंथी छात्र संगठन से जुड़े, जहाँ हम दोनों ने कई आंदोलनों और अभियानों में कंधे से कंधा मिलाकर कर संघर्ष किया।
कुछ विचित्र परिस्थिति में हमें बाद में वह संगठन छोड़ना पड़ा। यह घटनाक्रम वामपंथी आंदोलन की दिशा और दशा को न केवल दिखाता है, बल्कि इसकी असफलता और गतिरोध की ओर भी इशारा करता है।
आज सलमान अरशद किसी वामपंथी संगठन में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हैं, लेकिन उनकी सोच और कर्म अभी भी वामपंथी मूल्यों से जुड़े हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत में वामपंथी आंदोलन के कमज़ोर होने के बावजूद विचारधारा के स्तर पर इसकी जड़ें आज भी गहरी हैं, जो लोग किसी बाहरी या आंतरिक कारणों से संगठनों से अलग हुए,वे शायद ही किसी फासीवादी दल या संगठन में शामिल हुए हैं।
सलमान अरशद पत्र-पत्रिकाओं, न्यूज़ पोर्टलों पर आज भी लगातार आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक विषयों पर लिखते रहते हैं। इन्हीं विषयों पर केन्द्रित वे एक यू-ट्यूब चैनल भी चलाते हैं। उनकी यह किताब ‘जु़ल्मतों के दौर में’ वर्तमान समय की सच्चाइयों का एक दस्तावेज़ है।
आज के दौर में प्रगतिशीलता और जन पक्षधरता की बात करना ही मुश्किल हो गया है, अगर लेखक मुस्लिम समुदाय से हो, तो यह रास्ता और भी कठिन हो जाता है। उसे दोनों ओर के उग्रपंथियों का सामना करना पड़ता है,जो न केवल मानसिक अपितु शारीरिक भी हो सकते हैं।
क़रीब 9 भागों में बँटी इस पुस्तक में उनके 54 लेख संकलित हैं। व्यक्ति, समाज और पहचान, संस्कृति, धर्म और विचारधारा, जाति असमानता और सामाजिक न्याय, राजनीति और सत्ता का विश्लेषण, अल्पसंख्यक और सामाजिक संघर्ष , स्त्री विमर्श और लैंगिक न्याय, अर्थव्यवस्था और पूँजीवाद, मीडिया, संचार और सूचना युद्ध,परिवर्तन, भविष्य और समापन इन अध्यायों में उनके सारे लेख संकलित हैं, जिसमें उन्होंने आधुनिक, प्रगतिशील और जन पक्षधर विचारों को बेबाकी से व्यक्त किया है।
ये लेख भारतीय समाज, राजनीति, धर्म, जातिवाद, स्त्री विमर्श, मीडिया और उपभोक्तावादी संस्कृति जैसे मुद्दों पर तीखी बहस को जन्म देते हैं।
पुस्तक का पहला लेख ‘ कपड़े, पहचान और समाज’ क्या पैमाना वाकई निजी मामला है? बेहद प्रासंगिक और विचारोत्तेजक है। आज के दौर में जहाँ फासीवादी ताक़तें तालिबानियों की तरह ड्रेस कोड लागू करने की कोशिश कर रहे हैं, वहाँ यह लेख हमें सोचने पर मजबूर करता है कि वस्त्रों पर जारी फतवे आख़िर समाज को किस दिशा में ले जा रहे हैं। इसमें हिन्दू-मुस्लिम दोनों धर्मों की कट्टरपंथी ताक़तें शामिल हैं। लेखक इस छोटे से लेख के जरिए फासीवाद के एक महत्वपूर्ण लक्षण की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं।
इसी तरह ‘किसको कहें भारतीय संस्कृति’ लेख भी मुझे बेहद प्रासंगिक लगा। एक भाषा, एक संस्कृति और एक विचारधारा के नाम पर भारत जैसे बहुसांस्कृतिक राष्ट्र की विविधता को नकारकर एक विशेष सांस्कृतिक पहचान को थोपने की कोशिश हो रही है।
लेखक लिखते हैं कि उत्तर भारत, दक्षिण भारत, उत्तर-पूर्व में भले ही हिन्दू बहुसंख्यक हों, लेकिन उनकी भाषा, भोजन, रीति-रिवाज और पहनावा एक-दूसरे से बिलकुल अलग हैं। यह बात मुसलमानों पर भी लागू होती है। दक्षिण भारत के मुसलमानों की जीवन-शैली उत्तर भारतीय मुसलमानों से कहीं अधिक दक्षिण भारतीय हिन्दुओं के समान है।
सैकड़ों साल से उत्तर भारत सत्ता का केन्द्र रहा है, इसलिए यहाँ के लोग यह मानने लगे कि उनकी संस्कृति ही पूरे देश की संस्कृति है और राष्ट्रीयता का आधार धर्म है, लेकिन लेखक इस धारणा को चुनौती देते हैं और एक रूपीकरण की प्रवृत्तियों का विरोध करते हैं।
‘भारतीय मुसलमान दशा और दिशा’ नामक लेख में लेखक बढ़ते बहुसंख्यकवाद और मुसलमानों की वर्तमान मानसिकता पर टिप्पणी करते हैं। लेखक सवाल उठाता है, कि क्या मुस्लिम समाज स्वयं अपने भीतर सुधार लाने को तैयार है या केवल बहुसंख्यकवाद को कोसकर अपनी समस्याओं से मुँह मोड़ रहा है?
एक अन्य लेख ‘सवर्ण हिन्दूवाद: सत्ता की भूख और देश की बरबादी’ में लेखक एक जगह लिखता है- “मुसलमानों के खिलाफ़ हुए तमाम नरसंहारों में अपराधियों की पहचान नहीं होती। हो भी जाए, तो उसे धुंधला कर दिया जाता है, ताकि अपराधियों को बचाया जा सके। कितने मामलों में एफ आई आर तक नहीं हुई।
मुम्बई ब्लास्ट दुनिया में मशहूर हुआ, इसके ज़्यादातर जिम्मेदारान को सज़ा मिली। याकूब मेमन जैसे शख्स को बेहद कमज़ोर साक्ष्य के बावजूद फाँसी हुई, लेकिन जिस क़त्लेआम की प्रतिक्रिया में यह ब्लास्ट हुआ था, उसके जिम्मेदारों में क्या कार्यवाही हुई,पता नहीं। सरकारें जिस मामले को दबाना चाहती हैं,उस पर जाँच आयोग बैठा देती हैं। जहाँ रिपोर्ट आ भी गई, तो दबा दी जाती है।
एक अन्य महत्वपूर्ण लेख ‘स्त्री को अब बाज़ार में’ लेखक लिखते हैं, कि जैसे बाज़ार हमेशा कुछ लोगों को अभावग्रस्त जीवन जीने के लिए विवश करता है ताकि उसके श्रम को कम कीमत पर खरीदा जा सके, उसी तरह कल हो सकता है कि कल शिशुओं का बाज़ार अस्तित्व में आ जाए।
ऐसा बाज़ार जहाँ आपके ज़रूरत की संतान वैसे ही आपको मिल जाएं, जैसे आप कुत्ते-बिल्ली के बच्चे बाज़ार जाकर खरीद लाते हैं। ऐसे बाज़ार में औरतें ऐसी हालत में रखी जाएँगी, जो बाज़ार की डिमांड के अनुसार शिशुओं को जन्म दे सकें और जो स्त्रियाँ जन्म देने की योग्यता खो देंगी, कूड़े की तरह बाहर फेंक दी जाएँगी। यही हाल स्त्री दूध के बाज़ार का होगा। गरीब स्त्रियाँ अपने बच्चों के हिस्से का भी दूध बेचने के लिए बाध्य होंगी। इस तरह एक कुपोषित बच्चों की भी एक सामानांतर दुनिया तैयार होगी।
इसके अलावा पुस्तक में साम्प्रदायिकता, धर्म परिवर्तन, भारतीय धर्म निरपेक्षता, शाकाहार बनाम मांसाहार, स्त्री अधिकार, जाति-व्यवस्था और असमानता जैसे मुद्दों को गम्भीरता से उठाया गया है। एक पुस्तक भारतीय समाज की उन विसंगतियों पर करारा प्रहार करती है,जो वर्षों से हमें बाँधकर रखे हुए हैं। इसमें उठाए गए प्रश्न हर उस समुदाय पर हैं, जिन्हें हाशिए पर धकेला जा रहा है।
मैं सभी सामाजिक सरोकार रखने वाले इतिहासबोध से लैस छात्रों, नौजवानों और बुद्धिजीवियों से अनुरोध करूँगा, कि वे इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें। यह सिर्फ़ एक किताब नहीं, बल्कि एक दौर का दस्तावेज़ है। एक ऐसा दौर जिसमें सच बोलना और लिखना आसान नहीं।
पुस्तक का नाम: जुल्मतोंं के दौर में
लेखक का नाम: डॉ सलमान अरशद
प्रकाशक : न्यू वर्ड पब्लिकेशन, नयी दिल्ली
आई एस बी एन: 978-93-6407-142-09
मूल्य: 399 रुपये

