अखिलेश अखिल
कहने को आप कुछ भी कह सकते हैं और कई नजरिये से विश्लेषण भी कर सकते हैं लेकिन यूपी एसआईआर को लेकर जो जानकारी मिल रही है उससे तो यही लगता है कि लोकतंत्र के नाम पर जो भी होता दिखता है वह मात्र एक छलावा और झूठ है। सच यही है कि लोकतंत्र अब नहीं बचा है और जो हो रहा है वह चुनावी इंजीनियरिंग से ज्यादा कुछ भी नहीं।
उत्तर प्रदेश की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 2.89 करोड़ नामों का हटाया जाना कोई “तकनीकी सफाई” नहीं है। यह उस लोकतंत्र पर पड़ा गहरा कट है, जिसे चुनावी प्रक्रिया कहा जाता है। जब राज्य की लगभग पांचवां हिस्सा मतदाता सूची से गायब हो जाए और सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर तुरंत “अलार्म बेल” बजने लगे, तो सवाल चुनाव आयोग से नहीं, सत्ता से पूछे जाने चाहिए।
ड्राफ्ट लिस्ट जारी होने के कुछ ही घंटों के भीतर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी का यह आदेश कि हर बूथ से 200 वोटर जोड़े जाएं, इस भ्रम को तोड़ देता है कि यह प्रक्रिया प्रशासनिक है। यह खुला राजनीतिक निर्देश है — और वह भी उस दस्तावेज़ पर, जो लोकतंत्र की नींव होता है। क्या इसका कोई जवाब बीजेपी के पास है और क्या सरकार इसे ठीक मानती है? लेकिन ऐसे सवालों का जवाब कौन देगा ?
और जनता की अपनी परेशानी है। रही बात मीडिया कि तो स्वः तो पहले से ही एसआईआर के समर्थन में डंका पीट रहा है और यही कहता है कि चुनावी प्रक्रिया को और बेहतर बनाने के लिए चुनाव आयोग वोटर लिस्ट की सर्जरी कर रहा है। और यह सब चुनाव आयोग निष्पक्ष और पारदर्शी मतदान के लिए कर रहा है। बड़ी बात यह है कि भाषाई अखबार और टीवी मीडिया वही सब लिख और दिखा रहा है जो सरकार और बीजेपी के लोग कहते हैं।
मीडिया की अपनी परेशानी हो सकती है क्योंकि देश के अधिकतर मीडिया संस्थान घाटे में चल रहे हैं और खासकर दो-चार टीवी मीडिया को छोड़ दें तो अधिकतर टीवी मीडिया सरकार के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में सरकार जो चाहती है टीवी वाले वही सब दिखा रहे हैं और जनता उसे ही देखकर भ्रमित हो रही है।
मुद्दे की बात यही है कि भारत के संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि मतदाता सूची में “इतने वोटर जोड़ने” का लक्ष्य किसी पार्टी को तय करने का अधिकार है।200 वोटर प्रति बूथ कोई जागरूकता अभियान नहीं, बल्कि एक संख्यात्मक आदेश है, जो यह बताता है कि सत्ता को वोटर लिस्ट जैसी है वैसी मंज़ूर नहीं।
आप कल्पना कीजिए कि जिस तरह से उत्तर प्रदेश बीजेपी ने फरमान जारी किया है उसके मायने क्या है ? यूपी में लगभग 1.77 लाख बूथ है। अगर हर बूथ 200 वोटर जोड़ने की बात होती है तो इसका मतलब है कि कोई 3.5 करोड़ नाम नए नाम जोड़े जायेंगे। यह आंकड़ा अपने आप में एक स्वीकारोक्ति है कि सत्ता पक्ष ड्राफ्ट लिस्ट को चुनावी दृष्टि से “असंतोषजनक” मान रहा है।
चुनाव आयोग कहता है कि दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया खुली है। लेकिन जब एक सत्तारूढ़ दल अपने पूरे संगठन को वोटर सूची बदलने के मिशन पर लगा देता है, तब आयोग की “निष्पक्षता” सिर्फ कागज़ों तक सिमट जाती है।अगर विपक्ष ऐसा करता, तो क्या यही चुप्पी रहती? लेकिन विपक्ष मौन है और सरकार ऐसा करने पर आमदा है। इस नए वोटर की अगली कहानी क्या होगी यह तो वक्त ही बायेगा लेकिन ऐसा हुआ तो यूपी चुनाव में फिर बड़ा खेला होगा और इसकी काट विपक्ष के पास नहीं होगी।
यह वही चुनाव आयोग है जो प्रेस कॉन्फ्रेंस में निष्पक्षता की दुहाई देता है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर राज्य की सत्ताधारी पार्टी को मतदाता सूची पर खुला खेल खेलने देता है।बीजेपी की रणनीति साफ है —
उन प्रवासी यूपी वासियों को वापस सूची में लाना, जो रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों में हैं। लेकिन सवाल यह नहीं है कि वे कहां वोट डालें। सवाल यह है कि वे वोट डाल पाएंगे भी या नहीं। जब सत्ता जानती है कि ग्रामीण मतदाता शहर में नाम होने पर मतदान के दिन नहीं आ पाएगा, तो यह लोकतांत्रिक चिंता नहीं, बल्कि वोटिंग पैटर्न का ठंडा विश्लेषण है।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर जनता के भीतर जो डर है, वह यूं ही पैदा नहीं हुआ। जब मतदाता सूची बार-बार संशोधन का विषय बनती है, तो संदेश साफ जाता है: आपका वोट सुरक्षित नहीं है। लोकतंत्र में मतदाता का भरोसा टूटना सबसे खतरनाक संकेत होता है — और यूपी में यही हो रहा है।
चुनाव प्रचार, घोषणापत्र, भाषण — ये सब अब दूसरे चरण की चीज़ें हैं। असली लड़ाई मतदान से पहले मतदाता पर कब्ज़े की है। जब सत्ता खुद मान ले कि चुनाव जीतने से पहले वोटर सूची जीतनी ज़रूरी है, तो यह लोकतंत्र की जीत नहीं, उसकी हार होती है। और बड़ा सवाल यही है कि क्या यूपी में होने वाला यह अभ्यास लोकतांत्रिक सुधार है या सत्ता द्वारा वोटर इंजीनियरिंग? और अगर 2.89 करोड़ नाम कटना सामान्य है, तो 3.5 करोड़ जोड़ने का आदेश असामान्य क्यों नहीं माना जाए?
जब मतदाता सूची सत्ता की रणनीति बन जाए, तो चुनाव सिर्फ औपचारिकता रह जाते हैं। लोकतंत्र ऐसे ही खोया जाता है —चुपचाप, फ़ाइलों में, और “प्रक्रिया” के नाम पर।
यह भी बता दें कि उत्तर प्रदेश की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 2.89 करोड़ नामों का हटना कोई मामूली प्रशासनिक घटना नहीं है। यह संख्या राज्य के कुल मतदाताओं का 18.7% है — यानी लगभग हर पांचवां मतदाता। ऐसे में अगर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के भीतर “अलार्म बेल” बज रही है, तो यह पूरी तरह स्वाभाविक है।
चुनाव आयोग भले ही इसे मृत्यु, स्थानांतरण, अनुपस्थिति और डुप्लीकेट एनरोलमेंट का परिणाम बता रहा हो, लेकिन राजनीति में आंकड़े कभी तटस्थ नहीं होते। खासकर तब, जब विधानसभा चुनाव एक साल दूर हों और मतदाता सूची ही चुनावी मैदान की बुनियाद हो।
ड्राफ्ट लिस्ट जारी होने के कुछ ही घंटों के भीतर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और यूपी बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी द्वारा पार्टी नेताओं को हर बूथ पर कम से कम 200 वोटर जोड़ने का लक्ष्य देना, यह साफ करता है कि पार्टी इस स्थिति को सामान्य सुधार प्रक्रिया मानकर नहीं चल रही।
अगर यूपी में 1.77 लाख बूथ हैं, तो 200 वोटर प्रतिबूथ का मतलब है 3.5 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं को जोड़ने की कवायद। यह संख्या अपने आप में बताती है कि बीजेपी मान रही है कि या तो बड़ी संख्या में “योग्य मतदाता” छूट गए हैं — या फिर पार्टी को डर है कि छूटे हुए मतदाता उसका पारंपरिक या संभावित वोट बैंक हो सकते हैं।
चुनाव आयोग ने दावा किया है कि दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया 6 जनवरी से 6 फरवरी तक चलेगी और अंतिम सूची 6 मार्च को प्रकाशित होगी। लेकिन सवाल यह है। जब एक सत्तारूढ़ दल खुले तौर पर अपने कैडर को “इतने वोटर जोड़ने” का लक्ष्य देता है, तो क्या यह प्रक्रिया वास्तव में निष्पक्ष रह पाती है?
यहां एक महीन रेखा है —एक तरफ नागरिकों को मताधिकार दिलाने की वैध कोशिश, और दूसरी तरफ संगठित राजनीतिक मशीनरी द्वारा मतदाता सूची को अपने पक्ष में “सुधारने” की कोशिश। लोकतंत्र इसी रेखा पर फिसलता है।
बीजेपी का आंतरिक अनुमान है कि यूपी में 15.5 करोड़ योग्य मतदाता होने चाहिए। यह अनुमान किस आधार पर है — जनसंख्या वृद्धि, प्रवासन या पिछले चुनावों के आंकड़े — यह साफ नहीं किया गया। लेकिन यह जरूर साफ है कि पार्टी मान रही है कि मौजूदा ड्राफ्ट लिस्ट राजनीतिक रूप से उसके लिए सुरक्षित नहीं है।यही वजह है कि बूथ स्तर पर युद्धस्तर पर काम शुरू करने का आदेश दिया गया है।
ऐसे में कहा जा सकता है कि मतदाता सूची अब एक प्रशासनिक दस्तावेज़ नहीं रही, बल्कि चुनावी रणनीति का पहला मैदान बन चुकी है?





