डॉ. नीलम ज्योति
_जो आहार हम ग्रहण करते हैं, वह हमारे लिए क्यों और कितना जरूरी है? दरअसल, हमें सिर्फ कार्य करने के लिए नहीं, मात्र जीवित रहने के लिए भी ऊर्जा चाहिए। हमारे शरीर को यह ऊर्जा मुख्यतः कार्बोहाइड्रेट, और वसा के चयापचय यानी मेटाबॉलिज़्म से प्राप्त होती है। जरूरत पड़ने पर हमारा शरीर प्रोटीनों से भी ऊर्जा प्राप्त कर सकता हूँ। शरीर को ये सभी पोषाहार हमारे द्वारा प्रतिदिन खाए और पचाए हुए आहार से प्राप्त होते हैं।_
सामान्य अवस्था में हमारे शरीर में उतनी ही ऊर्जा बनती है जिसकी हमारी शरीर को आवश्यकता होती है। फलस्वरूप, हम आहार के माध्यम से यदि आवश्यकता से अधिक कार्बोहाइड्रेट, और वसा प्राप्त करते हैं तो उसका कुछ भाग हमारे शरीर में आरक्षित रहता है।
सत्तर किलोग्राम भार वाले एक स्वस्थ व्यक्ति के यकृत में लगभग 100 ग्राम ग्लाइकोजन, पेशियों में 400 ग्राम ग्लाइकोजन और वसीय ऊतकों में लगभग 12 किलोग्राम वसा आरक्षित रहती है। जब खून में ग्लूकोज का स्तर कम होने लगता है तो सर्वप्रथम यकृत में आरक्षित ग्लाइकोजन ही अपघटित ग्लूकोज में तब्दील होता है और खून में ग्लूकोज के स्तर को बनाए रखता है।
बहरहाल, यदि कोई व्यक्ति किसी निश्चित समयावधि के दौरान भूख महसूस करने के बावजूद जल के अतिरिक्त किसी भी प्रकार की खाद्य वस्तु स्वेच्छा से ग्रहण नहीं करता है तो उसके इस कार्य को उपवास कहा जाता है।
यह तथ्य उल्लेखनीय है कि उपवास रखना तथा आहार उपलब्ध न होने पर भूखा रहना, इन दोनों स्थितियों में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बहुत अधिक भिन्नता है। उपवास रखने वाला व्यक्ति आहार ग्रहण न करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहता है जबकि आहार न मिलने के कारण भूखा रहने वाला व्यक्ति मानसिक दृष्टि से खिन्न और चिंतित रहता है और आहार उपलब्ध होते ही उसे तत्काल ग्रहण करने का प्रयास करता है।
स्वेच्छा से कुछ समयावधि के लिए आहार ग्रहण न करना यानी उपवास रखने का प्रचलन हमारे देश में हजारों वर्षों से है। विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग उपवास को मानसिक और शारीरिक शुद्धि का अचूक उपाय मानते हैं।
अधिकांश चिकित्सा पद्धतियों में कुछ रोगों के उपचार में सदियों से उपवास का उपयोग होता चला आ रहा है। प्राकृतिक चिकित्सा में विश्वास रखने वाले लोग बीमार शरीर को फिर से समस्थिति में लाने के लिए उपवास को अत्यधिक लाभदायक उपाय मानते हैं। पश्चिमी देशों में आज से कई दशक पूर्व मोटापे के उपचार के लिए उपवास का उपयोग बहुत जोरशोर से किया जाने लगा था।
सामान्यता लोग एक दिन से लेकर सात दिन तक का उपवास रखते हैं। कुछ व्यक्ति धार्मिक वजहों से 28 दिन तक उपवास रखते हैं। दीर्घ उपवास रखने वाले कुछ लोग सात दिनों का उपवास रखते हैं। वे इस अवधि के दौरान शुद्ध जल के अलावा कोई भी खाद्य पदार्थ ग्रहण नहीं करते हैं। वास्तव में जैविक दृष्टि से मानव शरीर अपने भीतर आरक्षित ऊर्जा स्रोतों की वजह से लंबी समयावधि के आंशिक अथवा पूर्ण उपवास को बर्दाश्त करने की क्षमता रखता है।
यही कारण है कि प्राचीन काल में एक या दो महीने का उपवास रखना कोई दुष्कर कार्य नहीं समझा जाता था।
(चेतना विकास मिशन)

