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कमलनाथ को तन्खा की चुनौती देने के क्या हैं मायने

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भोपाल। मप्र की सत्ता से कांग्रेस के बाहर होने की अब तक बड़ी वजह जनता के साथ ही कांग्रेसी नेता भी दिग्विजय को मानते रहे हैं, लेकिन अब इस मामले में पार्टी के राज्यसभा सदस्य और देश के जाने माने वकील विवेक तन्खा ने करीब एक साल बाद असमय कमल नाथ को ही सरकार गिरने की बड़ी वजह बताकर पार्टी में नया विवाद खड़ा कर दिया है। इसे अब राजनीतिक विश्लेषक कमलनाथ को तन्खा की चुनौती के रुप में देख रहे हैं, हालांकि अभी इनके मायनों की भी तलाश की जा रही है। दरअसल उनका मानना है कि अगर मुख्यमंत्री रहते कमलनाथ यदि व्यापम, ई-टेंडरिंग, हनीट्रैप जैसे गंभीर और बड़े मामलों में समय रहते तेजी से कार्रवाई करते तो भाजपा की सरकार गिराने की हिम्मत नहीं हो सकती थी। यही नहीं तन्खा ने नाथ की काम करने की शैली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दरअसल पार्टी में तन्खा को कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का बेहद करीबी माना जाता है। यही नहीं वे नाथ को लेकर कितने नाराज है इससे ही समझ सकते हैं कि वे इसके विरोध में गांधी परिवार के नेतृत्व को चुनौती देने वाले असंतुष्ट नेताओं के खेमे जी-23 तक में शामिल हो गए हैं। तन्खा के इस कदम के बाद माना जा रहा है कि अब कभी भी एक बार फिर से प्रदेश कांग्रेस में खदबदा रहा असंतोष बाहर आ सकता है। दरअसल इन दिनों नाथ को बाहर से कम पार्टी के ही अंदर से मिलने वाली चुनौतियों से दो चार होना पड़ रहा है। इसके  पूर्व भी वे गोडसे समर्थक बाबूलाल चौरसिया को पार्टी की सदस्यता देने के मामले में अपनी ही पार्टी के अंदर से विरोध का सामना कर चुके हैं। दरअसल तन्खा का यह बयान ऐसे समय आया है जब भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा ने कुछ समय पहले कहा था कि कांग्रेस सरकार में भाजपा नेताओं पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएंगे। अपनी पीड़ा जाहिर करने के लिए तन्खा ने ट्वीट की बातों को एक वीडियो की शगल दी है। इसमें उन्होंने विस्तार से अपने दर्द को बयां करते हुए कहा है कि यदि वो (कमल नाथ) सही मुकदमों पर कार्रवाई कर लेते तो शायद प्रदेश की कांगे्रस सरकार नहीं गिरती। उनका कहना है कि उन्हें पता है कि व्यापमं, ई-टेंडरिंग और हनीट्रैप जैसे बड़े और गंभीर मामलों में भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि बड़े-बड़े टेंडरों की हेराफेरी में बड़े अधिकारी और लोग शामिल थे। इसके बाद भी कोई भी कार्रवाई नहीं की गई है।  

नाथ की बढ़ रही मुश्किलें
तीन साल पहले पार्टी की प्रदेश में कमान संभालने वाले नाथ को शुरू से ही चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अब सरकार से बाहर होने के बाद उन्हें बाहर से कम पार्टी के अंदर से ही कई तरह की चुनौतियां मिल रही हैं, जो अब धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही हैं। यह बात अलग है कि वर्ष 2018 में प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने पार्टी के तमाम गुटों के नेताओं से एका करते हुए पार्टी की डेढ़ दशक बाद सत्ता में वापसी कराई थी , लेकिन वे सरकार की कार्यशैली की वजह से असमय ही करीब सवा साल में सत्ता से बाहर होने पर मजबूर हो गए। यही वजह रही कि श्रीमंत और उनके समर्थकों ने न केवल कांग्रेस छोड़ दी , बल्कि भाजपा का दामन भी थाम लिया। यही नहीं उनकी कार्यशैली से नाराज अन्य विधायक भी बाद में एक के बाद एक साथ छोड़ते चले गए। इसकी वजह से उनकी प्रदेश के साथ ही देश में पार्टी की बेहद अधिक किरकिरी हुई।

यह भी मानी जा रही है वजह
कमलनाथ प्रदेश में कांग्रेस के ऐसे नेता हैं जो बीते तीन सालों में पार्टी व सरकार के सभी महत्वपूर्ण पद अपने पास ही रखे हुए हैं। सरकार के मुखिया बनने के बाद भी उन्होंने प्रदेश संगठन का अघ्यक्ष पद नहीं छोड़ा। सरकार गिरी तो वे स्वयं ही प्रदेशाध्यक्ष के साथ ही नेता प्रतिपक्ष भी बन गए। इसके चलते पार्टी में इन पदों के दावेदार और उनके समर्थक नेताओं में उनको लेकर असंतोष बढ़ता ही जा रहा है। इसके अलावा प्रदेश में जिस तरह से उनकी मुलाकात का दौर लगातार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ चलता रहता है , वह भी एक कार्यकर्ताओं व नेताओं में नाराजगी की बढ़ी वजह मानी जा रही है। पार्टी में उनके विरोधी तो उन्हें शिवराज का करीबी बताने तक से नहीं चूकते हैं। इसके अलावा मौजूदा समय में विस में पार्टी विधायकों की संख्या को देखते हुए वे उस तरह से अब तक सरकार को घेरने में सफल नहीं दिखे हैं , जैसा कि संख्याबल के हिसाब से माना जा रहा है। यही नहीं कई बार तो वे ऐसे मामलों में भी पूरी तरह से सरकार के साथ खड़े दिखे, जिनका पार्टी द्वारा विरोध किया जाता है।

Ramswaroop Mantri

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